Old Testament
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पसलोह का पाठ: मत्ती 21:42
येसु ने यह उद्धारक चेतावनी तब दी जब उसने धार्मिक नेता-समूह के साथ बातचीत में प्रतिष्ठित पथर के बारे में चमत्कारिक ढंग से संकेत किया। वे लोग पवित्र शास्त्र का पठन-पाठन करते थे, पर उनकी दृष्टि हृदय के परिवर्तन के स्थान पर भूमिका-निर्भरता और सत्ता-लाभ में थी। इस पद में यीशु पवित्रशास्त्र के एक उद्धरण को याद दिलाते हैं—एक ऐसी बात जो पुराने नियम के उद्धारकर्ता पंथ के लिए भी निर्णायक थी—कि जो पत्थर राजमिस्त्रियों ने बेकार समझे, वही कोने के सिरे का पत्थर बन गया। यह प्रभु की तरफ से हुआ और हमारे देखने में अद्भुत है।
पठ का पाठ-सम्बन्ध और संदर्भ
यह वाक्य पद 42 में मत्ती के gospel के अध्याय 21 के भीतर आता है, जहाँ यीशु ने Jerusalem के लिए अपनी सवारी के साथ-ही साथ धार्मिक नेताओं के विरोध के बीच अपनी पहचान और संदेश स्पष्ट किया। इस संदर्भ में पत्थर-उद्धरण पुरानी कथाओं से लिया गया है जो ईश्वर की योजना की आश्चर्यजनक प्रकृति को उजागर करता है: वह पत्थर जो मानव दृष्टि से बेकार था, उसने divine योजना के अनुसार एक प्रिय और निर्णायक भूमिका ग्रहण की।
मुख्य आध्यात्मिक पाठ
अनुशंसा-प्रकाशन: समानार्थी विचार
यह पाठ पुराने नियम के संदर्भों के साथ संगत है जहाँ पत्थर की भूमिका अचानक पथ-निर्माण में बदल जाती है। अन्य बाइबल भागों से यह सिद्ध होता है कि ईश्वर सत्ता-युक्त रूप से कमजोर-कर दिया गया हिस्सा भी महान उद्देश्य के लिए चुन लेता है (उदा., दाऊद का छोटा-सा पुत्र, नयी प्रत्यक्ष योजना के लिए चुना जाना)।
व्यावहारिक अनुप्रयोग
क्रॉस-रेफरेंसेस (संदर्भ-सरal)
1) मरकुस 12:10-11 — यीशु के उपदेश के साथ वही पत्थर-वाक्य एक नवीन प्रकाश देता है कि जो नेता दहलीज़ पर खड़े रहते हैं वे खुद बन जाते हैं विरोधी नहीं—परन्तु ईश्वर की योजना के अनुसार प्रमुख भागीदार होते हैं।
2) प्रेषित-1 4:11 — विरुद्ध-प्रेरणा के साथ यह दर्शाता है कि प्रभु के सिद्धांत दूसरों से अलग विचार नहीं रखते; वे जो अक्सर कम समझे जाते हैं, वे उद्धार का उद्देश्य बनते हैं।
संक्षेप
मत्ती 21:42 में यीशु धार्मिक नेताओं की अपेक्षा-भंग को पुख्ता करते हैं: वह पत्थर जो बेकार माना गया, वही कोने के पत्थर बना—ईश्वर की योजना की अकल्पनीय और अद्भुत प्रकृति का प्रमाण। यह संदेश हमें यह सिखाता है कि परमेश्वर के प्रयोजन के प्रति हमारी श्रद्धा, और मानव-आकलन के विरुद्ध, स्थिर रहे।
याद रहे: इस पद के लिए हिनिर्व अनुवाद के भावार्थ में शब्दों का संयोजन, परंतु धारा-चेतावनी वही है—ईश्वर की योजना कभी हमारी सोच से बड़ा होता है और उसी की राह पर चलना हमारा जीवन बनता है।
संदर्भ-नोट: Matthew Henry, Albert Barnes, Adam Clarke के उद्धरणों के छोटे-छोटे वाक्यस्थिति नीचे उद्धृत किए जा सकते हैं यदि आवश्यक हों।