उत्पत्ति 6:15 बाइबल पद का अर्थ और पद-दर-पद टीका

इस ढंग से तू उसको बनाना: जहाज की लम्बाई तीन सौ हाथ, चौड़ाई पचास हाथ, और ऊँचाई तीस हाथ की हो।

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उत्पत्ति 6:15 पद-दर-पद बाइबल टीका

उत्पत्ति 6:15 का एक दृष्‍टांत: एक कल्याणकारी योजना की शुरुआत

पवित्र ग्रंथ में इस अध्याय का आरम्भ मानवता की कठोरता और परमेश्वर की क्रिया-ऊर्जा का सम्मिलन दर्शाता है। इस verses में नूह को परमेश्वर एक विशाल जलप्रलय से पृथ्वी को बचाने के लिए एक विशेष मार्ग बनाकर देता है। यह बताता है कि विश्वास में जीवन-कार्य एक सुविचारित, सुसंगत योजना के साथ जुड़ता है—जहाँ परमेश्वर की निर्देशित आस्था, मानवीय कर्म से मेल खाकर एक उद्धारक उद्देश्य को प्राप्त करती है।

यह पाठ परमेश्वर और विश्वास के बारे में जो बताता है

यह वाक्यकथन सीधे बताता है कि परमेश्वर ने नूह को एक जहाज बनाने के लिए निर्देश दिया, ताकि अजन्मे संकट के समय मनुष्य जाति और पशु-पक्षियों के लिए एक सुरक्षित ठिकाना बने। इसमें ईश्वर की रणनीतिक बुद्धि और विश्वास की प्रतिबद्धता के मिलन को दिखता है—जहाँ परमेश्वर स्पष्ट निर्देश देता है और नूह युक्ति-युक्ति के साथ उन निर्देशों का पालन करता है। यह दर्शाता है कि ईश्वर अपने चेहरों में सच्चे भक्तों के साथ सहज संवाद करता है और उनके विश्वास को अक्षमता में भी बल देता है।

महत्वपूर्ण शब्दों और इमेज का स्पष्टीकरण

  • ढंग से तू उसको बनाना — परमेश्वर स्पष्ट, विशिष्ट निर्देश देता है। यह बताता है कि परमिस्थितिजन्य क्रियाएँ भी ईश्वर की योजना में संगत और उद्देश्यपूर्ण होती हैं।
  • जहाज — एक सुरक्षित, संरक्षित स्थल; नूह और उसके परिवार तथा पशुओं के लिए संभावित उद्धार का माध्यम। यह आश्वस्त करता है कि ईश्वर कर्मों के द्वारा अपनी प्रतिष्ठा और वचनों को पूरा करते हैं।
  • लम्बाई 300 हाथ, चौड़ाई 50 हाथ, ऊँचाई 30 हाथ — मापों के साथ एक सुसंगत, संरचनात्मक होल्डिंग का चित्रण; संयमित आकार जो सुरक्षा और स्थिरता का प्रतीक है।

Related passages (संकेत-प्रस्ताव)

1) यह ईश्वरीय निर्देश और नूह की अटलता के संयोग को पट्टा देता है जो निर्गमन-परिवर्तन के समय भी आता है। इसे देखें: परमेश्वर के निर्देश और विश्वास के पालन के उदाहरण के रूप में अन्य एकरूप क्रिया-उद्धरणों से प्रेरणा मिलती है।

2) नाव-निर्माण के भीतर जीवित प्राणी के पालन-पोषण का विचार: यह दर्शाता है कि ईश्वर अपने प्राणी-समूह के लिए सुरक्षित व्यवस्था बनाता है और विश्वकर्मा से भी जनता के लिए करुणा का संकेत देता है।

3) उद्धार और सुरक्षा के रूप में विश्वास का योग: यह पाठ भविष्य में भी विश्वास की पूरी संरचना को पुष्ट करता है—यानी ईश्वर को मानते हुए जीवन-कार्य की स्पष्टता और धैर्य आवश्यक है।

छोटे संदर्भ (Cross-references) और उनके संक्षेप

• प्रसिद्ध उद्धार-योजना के साथ, भगवान की मार्गदर्शक स्पष्टता का संकेत मिलता है; इसके समान विचार कुछ अन्य संदर्भों में भी मिलते हैं।

• विश्वास के व्यवहारिक पक्ष—यथा योजना बनाना और उसका पालन करना—यह पाठ स्पष्ट करता है कि विश्वास केवल आस्था नहीं, बल्कि क्रिया-प्रणाली है।

• सुरक्षा और उद्धार के लिए एक संरचना की आवश्यकता: परमेश्वर ने एक सुरक्षित स्थान बनाकर भरोसे को मजबूत किया।

आज के जीवन में अनुप्रयोग

– आज भी हम परमेश्वर की स्पष्ट निर्देशों के प्रति ईमानदार रहें। अगर हमें कठिनाई का सामना हो, तो ध्यान दें कि ईश्वर ने तब भी एक ठोस योजना दी थी, जो विश्वास के साथ पूरी हो सकी।

– अपने जीवन-कार्य में सोच-समझकर कदम उठाएँ; जब भी लक्ष्य स्पष्ट हो, संघर्ष के बीच भी धैर्य बनाए रखें, ताकि विश्वास-कार्य परिणाम दे सके।

संक्षेपित सार

उत्पत्ति 6:15 में परमेश्वर की स्पष्ट योजना और नूह की अटलता का संगम है। यह दर्शाता है कि ईश्वर अपने भक्तों के लिए संरक्षित, सुरक्षित और उद्देश्यपूर्ण मार्ग बनाते हैं, और विश्वास के साथ उन मार्गों पर चलना ही उद्धार का माध्यम बनता है।

कमेंटरी स्रोतों के संकेत: 1) Matthew Henry, 2) Albert Barnes, 3) Adam Clarke—इन से जुड़े संक्षिप्त विचार मिलते हैं कि परमेश्वर की योजना और विश्वास की क्रिया एक साथ चलती है; यदि किसी स्रोत का विशिष्ट वाक्य उद्धृत होता तो यहाँ उद्धृत किया गया होता।

*** इस टीका में सार्वजनिक डोमेन में उपलब्ध कुछ प्राचीन और क्लासिक स्रोतों की सामग्री शामिल है। कुछ सामग्री को कृत्रिम बुद्धिमत्ता उपकरणों की सहायता से संसाधित, संक्षिप्त या अनुवादित किया गया हो सकता है। हर व्याख्या को बाइबल के पूरे पाठ और उसके संदर्भ के साथ अवश्य जाँचें। यदि आपको कोई त्रुटि या ऐसा अनुवाद मिले जिसे सुधारने की आवश्यकता हो, तो कृपया हमसे संपर्क करें।

उत्पत्ति 6:15 समानांतर पद और संबंधित वचन

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जो रापाई रह गए थे, उनमें से केवल बाशान का राजा ओग रह गया था, उसकी चारपाई जो लोहे की है वह तो अम्मोनियों के रब्‍बाह नगर में पड़ी है, साधारण पुरुष के हाथ के हिसाब से उसकी लम्बाई नौ हाथ की और चौड़ाई चार हाथ की है।

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