Old Testament
उत्पत्ति निर्गमन लैव्यव्यवस्था गिनती व्यवस्थाविवरण यहोशू न्यायियों रूत 1 शमूएल 2 शमूएल 1 राजाओं 2 राजाओं 1 इतिहास 2 इतिहास एज्रा नहेम्याह एस्तेर अय्यूब भजन संहिता नीतिवचन सभोपदेशक श्रेष्ठगीत यशायाह यिर्मयाह विलापगीत यहेजकेल दानिय्येल होशे योएल आमोस ओबद्याह योना मीका नहूम हबक्कूक सपन्याह हाग्गै जकर्याह मलाकीChapter
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यथार्थ अर्थ और संदर्भ
उत्पत्ति 6:17 में परमेश्वर पूर्वसूचित करते हैं कि बड़े जल-प्रलय के द्वारा पृथ्वी के ऊपर रहने वाली समस्त प्राणियों को नाश किया जाएगा—आकाश के नीचे से जीवन का श्वास समाप्त हो जाएगा और जो पृथ्वी पर हैं सब मर जाएँगे। इसे एक विनाशकारी बल्कि निर्णायक न्याय का संदेश माना जाता है, जिससे परमेश्वर के सृष्टि-कार्य के प्रति उसकी पवित्रता और निर्मलता-responsibility उभरती है।
पृष्ठभूमि और स्थिति
यह कथन वे समय का भाग है जब पृथ्वी में पाप की गम्भीरता सभी सीमा तक पहुँची थी। परमेश्वर ने आदम-पृथ्वी के प्रकार पर शासन और प्रतिपालकता के बावजूद मानवीय दुष्कर्म को देखा और विनाश की योजनाओं की घोषणा की। फिर भी इन शब्दों के साथ अनुमोदन है कि उद्धार की योजना के साथ नोआ और उसकी कुटुंब के लिए पथ-प्रदर्शक भी रखा गया।
व्याख्यात्मक बिंदु
संरेखित सूक्तियाँ (मुख्य विचार)
इस संदर्भ में देखते हैं कैसे न्याय और करुणा एक साथ चलते हैं। परमेश्वर का यह proclamatory शब्द जल्दबाजी नहीं, बल्कि एक मिशन-निर्देश है, जिसमें सृजन के उद्देश्य और मानव-प्रवृत्ति की परीक्षा एक ही समय में जुड़ती है।
क्रॉस-विचार-प्रस्ताव
संदर्भ-युगल/फुटनोट्स:
व्यावहारिक समझ: जब संसार में बुराई अधिक हो, तब भी परमेश्वर कर्तव्य-नियमों के अनुसार जवाबदेही तय करते हैं, परन्तु वेहू के भीतर उद्धार का अवसर भी बनाते हैं—हम भी अपने जीवन में ईमानदार व्यवहार और विश्वास-आधारित विश्वास के साथ प्रस्तुत हों।
छोटी विचारसूची
प्रत्येक पाठ के साथ संबद्ध संदर्भ
1) गलतियों पर चेतावनी और उद्धार की योजना—याद दिलाती है कि परमेश्वर अपनी सृष्टि के लिए दोष-सुधार और पुनर्निर्माण का कार्य करते हैं।
2) न्याय-नियमन के साथ सुरक्षा का सार—the Noah की नाव से प्रतीकात्मक सुरक्षा, विश्वास के अनुसार भागीदारी।
3) नई शुरुआत की संभावना—भगवान के मिलन-योजनाओं में पुनर्निर्माण और पवित्र जीवन की शुरुआत शामिल है।
छोटा व्यावहारिक निष्कर्ष
हम अपने समय में धार्मिक सचाइयों को कैसे लागू करें: परमेश्वर के राज्य-कार्य के प्रति विश्वास बनाए रखें, नैतिकता और करुणा के साथ दूसरों की रक्षा करें, और निरंतर प्रार्थना व अनुपालन के कारण जीवन के हर चरण में उद्धार की आशा रखें।
नोट: इस पाठ पर Matthew Henry, Albert Barnes तथा Adam Clarke के प्रत्यक्ष उद्धरण यहां संক্ষেপित अभिधारणा के रूप में सम्मिलित नहीं हैं; यदि चाहें तो मैं उनके विशिष्ट विचारों से संकुल मानते हुए संक्षिप्त उद्धरण दे सकता हूँ।