Old Testament
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उत्पत्ति 6:6 का परिचय और संदर्भ
पानी-समुद्र के पहले संसार में एक गम्भीर परिवर्तन का चित्रण यह है कि परमेश्वर ने पृथ्वी पर मानव जाति की पापों के कारण परम शांति नहीं पाई। इस आयत में कहा गया है कि यहोवा पृथ्वी पर मनुष्य को बनाने से पछताया, और वह मन में अति खेदित हुआ। यह वाक्य संसार के इतिहास में ईश्वर की नैतिक भीतरी संवेदना को दर्शाता है कि पाप ने परमेश्वर के दिल को कैसे भारी कर दिया। उत्पत्ति 6–9 के अध्याय न्याय, दया और कल्याण के परिप्रेक्ष्य में एक नई योजना को प्रस्तुत करते हैं—नौहे के माध्यम से एक नया आरम्भ।
केन्द्रीय अर्थ
यह वाक्य परमेश्वर की गहरे मनोभाव को बताता है: परमेश्वर ने जो निर्मिति की, उसे पाप से बिगड़ते देखा और उसका दिल क्रुद्ध नहीं, बल्कि खेद से भर गया। यह खेद नकारात्मक क्षण नहीं, बल्कि एक चेतावनी-प्रेरक प्रकाशन है जो यह बताता है कि emi-रचना में नैतिकता का মূল্য कितना ऊँचा है। इसे जोड़कर समझना है कि परमेश्वर की सच्ची करुणा कब और कैसे पाप के परिणामों को रोकने के लिए कार्रवाई में बदलती है।
मुख्य विषय
संबद्ध पदार्थ (Cross-references)
व्यावहारिक विचार
हम कैसे इस वाक्य से सीख लेते हैं? पहले, अपने आचरण की जाँच करें कि क्या हमारा जीवन परमेश्वर के मान्य मानकों के अनुरूप है; दूसरे, खेद को नकारने की जगह उसे परिवर्तन के अवसर के रूप में देखें—पाप के कारण जो क्षति होती है, उसे रोके और ईश्वर की राह पर लौटें; तीसरे, समुदाय के प्रति दया और न्याय आवश्यक है ताकि सृष्टि में ईश्वर की योजनाएं सुरक्षित रहें।
संक्षिप्त समापन
उत्पत्ति 6:6 संसार के अस्थिर दौर में भी ईश्वर की नैतिक चिंता का प्रमाण देता है—खेद एक संकेत है कि वह पाप से उबरने के उपाय ढूंढ़ रहा है। यह हमें स्मरण कराता है कि नवीन आरम्भ की योजना परमेश्वर की दया से ही संभव है, और विश्वास के साथ उसकी राह पर चलना ही जीवन का मार्ग है।
छोटा संदर्भ-उद्धरण (public-domain commentaries से संकलित सार)
मार्था हेनरी, अल्बर्ट बार्न्स, और एडम क्लार्क के पारंपरिक व्याख्यात्मक प्रविष्टियों के संकेत यहाँ संक्षेप में सम्मिलित रहते हैं—जिनमें परमेश्वर की नैतिक संवेदना और खेद की गहराई का उल्लेख मिलता है, ताकि पाठक के लिए यह स्पष्ट हो कि खेद का भाव मात्र एक नाटक नहीं, बल्कि उद्धार की योजना की पूर्व-आवेग है।