Old Testament
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होशे 2:11 बाइबल पद का अर्थ और पद-दर-पद टीका
और मैं उसके पर्व, नये चाँद और विश्रामदिन आदि सब नियत समयों के उत्सवों का अन्त कर दूँगा।
होशे 2:11 पद-दर-पद बाइबल टीका
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होशे 2:11 समानांतर पद और संबंधित वचन
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यशायाह 1:13 (HINIRV) »
व्यर्थ अन्नबलि फिर मत लाओ; धूप से मुझे घृणा है। नये चाँद और विश्रामदिन का मानना, और सभाओं का प्रचार करना, यह मुझे बुरा लगता है। महासभा के साथ ही साथ अनर्थ काम करना मुझसे सहा नहीं जाता।

आमोस 5:21 (HINIRV) »
“मैं तुम्हारे पर्वों से बैर रखता, और उन्हें निकम्मा जानता हूँ, और तुम्हारी महासभाओं से मैं प्रसन्न नहीं।

यिर्मयाह 7:34 (HINIRV) »
उस समय मैं ऐसा करूँगा कि यहूदा के नगरों और यरूशलेम की सड़कों में न तो हर्ष और आनन्द का शब्द सुन पड़ेगा, और न दुल्हे और न दुल्हिन का; क्योंकि देश उजाड़ ही उजाड़ हो जाएगा। (होशे 2:11, यिर्म. 16:9)
होशे 2:11 का अर्थ
यह पद संदेश देता है कि ईश्वर अपने लोगो पर वे धार्मिक उत्सव और चिह्न शुद्ध कर देंगे जिन्हें वे अपने मनमाने ढंग से मानते रहे हैं। नये चाँद, पर्व और विश्रामदिन जैसे शेड्यूल और उत्सवों का औचित्य अब समेटा जाएगा, क्योंकि अशुद्ध व्यवहार और धर्मिक दिखावे के कारण असली भक्ति का अभाव दिख रहा था।
सं contextual पृष्ठभूमि
होशे के समय इस्राएल का लोक धार्मिक रूप से दिखावा कर रहा था—उत्सव, शपथ, चिह्न और मंदिर-आर्कषण पर जोर, परन्तु उनकी जिंदगी में नैतिकता और विश्वास का ढाँचा खो गया था। परमेश्वर ने होशे के माध्यम से चेतावनी दी कि धार्मिक पहचान पर्याप्त नहीं है जब जीवन व्यवहार बनावट का है। यह उद्धार के आह्वान से पहले के कठोर सच को दर्शाता है: भक्ति का असली केंद्र भीतर की परिवर्तनशीलता है, न कि बाहरी रीति-रिवाज।
मुख्य interpretive observations
छोटा थीमैटिक लिस्ट
सम्बन्धित पद और संकेत
होशे 4:6— ज्ञान की कमी से त्रस्त होकर लोग गिरते हैं; मत्ती 6:33— पहले परमेश्वर का राज्य और उसकी righteousness; यह संकेत करते हैं कि बाहरी धार्मिकता के पीछे आंतरिक निष्ठा और ईमानदारी आवश्यक है।
व्यावहारिक निष्कर्ष
हम स्वयं अपने जीवन की भक्ति को परखें: क्या हमारी zealousness बाहरी दिखावट तक सीमित है, या क्या हमारा आचरण क्रमशः प्रेम, न्याय और वफादारी से परिपूर्ण है? यदि भीतर परिवर्तन नहीं, तो उत्सवों के समय-सारिणी और प्रतीक भी खाली महसूस होते हैं। आस्थावान जीवन में परमेश्वर के साथ सत्य-समर्पण सर्वोपरि हो।
कुछ पुराने टिप्पणीकारों से संक्षिप्त दृष्टी
मैथ्यू हेनरी, ಅंग्लिक टिप्पणीकार, बतलाते हैं कि धार्मिक प्रतिमा के पीछे वास्तविक भक्ति की कमी ने परमेश्वर के प्रियतम के साथ संबंध को कमजोर किया।
अलबर्ट बार्न्स और एडम क्लार्क के विचारों के अनुसार, पूजा-स्वरूपों की सीमा तब तक महत्वपूर्ण है जब तक वे आंतरिक जीवन के साथ संगत रहते हैं; अन्यथा वे खाली अभिवादन बन जाते हैं।
स्वीकृत उद्धरण-नोट
उद्धरण केवल आवश्यक संज्ञात्मक रूप में—“धर्मी गतिविधियाँ तभी अर्थ रखती हैं जब हृदय से सम्बद्ध हों।”