Old Testament
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होशे 2:21 बाइबल पद का अर्थ और पद-दर-पद टीका
“यहोवा की यह वाणी है कि उस समय मैं आकाश की सुनकर उसको उत्तर दूँगा, और वह पृथ्वी की सुनकर उसे उत्तर देगा;
होशे 2:21 पद-दर-पद बाइबल टीका
*** इस टीका में सार्वजनिक डोमेन में उपलब्ध कुछ प्राचीन और क्लासिक स्रोतों की सामग्री शामिल है। कुछ सामग्री को कृत्रिम बुद्धिमत्ता उपकरणों की सहायता से संसाधित, संक्षिप्त या अनुवादित किया गया हो सकता है। हर व्याख्या को बाइबल के पूरे पाठ और उसके संदर्भ के साथ अवश्य जाँचें। यदि आपको कोई त्रुटि या ऐसा अनुवाद मिले जिसे सुधारने की आवश्यकता हो, तो कृपया हमसे संपर्क करें।
होशे 2:21 समानांतर पद और संबंधित वचन
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जकर्याह 8:12 (HINIRV) »
क्योंकि अब शान्ति के समय की उपज अर्थात् दाखलता फला करेगी, पृथ्वी अपनी उपज उपजाया करेगी, और आकाश से ओस गिरा करेगी; क्योंकि मैं अपनी इस प्रजा के बचे हुओं को इन सब का अधिकारी कर दूँगा।

यशायाह 55:10 (HINIRV) »
“जिस प्रकार से वर्षा और हिम आकाश से गिरते हैं और वहाँ ऐसे ही लौट नहीं जाते, वरन् भूमि पर पड़कर उपज उपजाते हैं जिससे बोलनेवाले को बीज और खानेवाले को रोटी मिलती है, (2 कुरि. 9:10)

मत्ती 6:33 (HINIRV) »
इसलिए पहले तुम परमेश्वर के राज्य और धार्मिकता की खोज करो तो ये सब वस्तुएँ तुम्हें मिल जाएँगी। (लूका 12:31)
होशे 2:21 का संक्षिप्त व्याख्यान (HINIRV)
पद का संदर्भ होशे की किताब में प्रेम-चेतावनी और सम्बन्ध-नवीकरण के दृश्यों से जुड़ा है। यहाँ प्रभु यह कह रहे हैं कि समय के अनुसार वह आकाश की आवाज़ को सुनेंगे और आकाश भी उसकी पुकार का उत्तर देगा; उसी प्रकार पृथ्वी भी उसी प्रकार प्रतिक्रिया करेगी। यह उद्धार तथा वैवाहिक संबंध के नवीकरण के सौहार्दपूर्ण चिह्न हैं, जिसमें निर्भय विश्वास से यह संकेत मिलता है कि परमेश्वर और उसकी प्रतिज्ञा-प्राप्ति के बीच संवाद जीवित और क्रियाशील है।
मुख्य अर्थ
यह वाणी परमेश्वर के दयालु आश्वासन की एक उद्घोषणा है। आकाश की सुनवाई का अर्थ है प्रभु की परम-स्वीकृति और आशीष की बारम्बारता; पृथ्वी की सुनवाई से यह स्पष्ट होता है कि सृष्टि उसकी योजना के अनुरूप प्रतिक्रियाशील है। यह समस्त सृष्टि-भर के साथ परमेश्वर के पवित्र विवेक और विवाह-सी प्रेम-गाथा की पुष्टि करता है: वह अपने चुने हुए लोगों के साथ नया संबंध स्थापित कर रहा है।
दो-तीन प्रमुख विषय
सम्बद्ध पाठ्य संदर्भ
• यह वाक्यांश पुराने-नया नियम के बीच संवाद की निरंतरता दिखाता है — जैसे यशायाह/यिर्मयाह में भी परमेश्वर के सुनने-सुनाने की भूमिका है।
• अन्य संदर्भ जहाँ परमेश्वर की आवाज़ और जवाब दोनों का दायित्व स्पष्ट है, वे हैं यिर्मयाह 33:3 और होशे 6:3। इन स्थानों में भी संकेत मिलता है कि परमेश्वर और उसकी प्रतिज्ञाओं के बीच स्थाई संवाद है।
व्यावहारिक विचार
हमारी जीवन-यात्रा में यह वचन स्मरण देता है कि परमेश्वर अपने बच्चों की पुकार सुनते हैं, और हमारे पक्ष से भी उत्तरदायित्व की अपेक्षा रखते हैं। कठिन समय में भी ईश्वर के साथ संवाद बनाए रखना—प्रार्थना, बाइबल पठन और भरोसे के साथ—हमारे रिश्ते को और गहरा करते हैं।
संक्षिप्त समापन
होशे 2:21 यह दिखाता है कि परमेश्वर अपनी योजना के लिए आकाश और पृथ्वी दोनों को साक्षी बनाकर अपने प्रेम-बंधन को पुनर्स्थापित कर रहे हैं। यह हमारे लिए एक संकेत है कि ईश्वर की आवाज़ और हमारी प्रतिक्रिया—दोनों मिलकर एक नई, पवित्र रिश्तेदारी की दिशा तय कर सकते हैं।
मूल विचारधारा के उद्धरण (public-domain स्रोतों से)
यह टिप्पणी Matthew Henry, Albert Barnes और Adam Clarke की सामान्य, सार्वजनिक-डोमेन विचारधाराओं के आधार पर संकलित है। आवश्यक संक्षिप्त उद्धरण नीचे दिए गए हैं:
• “यहोवा की यह वाणी है कि उस समय मैं आकाश की सुनकर उसको उत्तर दूँगा, और वह पृथ्वी की सुनकर उसे उत्तर देगा।” — प्रत्यक्ष उद्धरण नहीं, बल्कि समेकित पंक्ति-शैली के सार से बना सार।
• Matthew Henry से संगत समझ: परमेश्वर के वचन की संक्रामक शक्ति—आकाश-ध्वनि और पृथ्वी-आवाज़ के मिलन से, नये-कथन की स्थापना।
• Albert Barnes और Adam Clarke के समग्र टिप्पणी-स्वर से: प्रेम-बंध पश्चात एक नये रिश्ते की पुष्टि, जिसमें ईश्वर-जीवन का नियंत्रण रहता है।