Old Testament
उत्पत्ति निर्गमन लैव्यव्यवस्था गिनती व्यवस्थाविवरण यहोशू न्यायियों रूत 1 शमूएल 2 शमूएल 1 राजाओं 2 राजाओं 1 इतिहास 2 इतिहास एज्रा नहेम्याह एस्तेर अय्यूब भजन संहिता नीतिवचन सभोपदेशक श्रेष्ठगीत यशायाह यिर्मयाह विलापगीत यहेजकेल दानिय्येल होशे योएल आमोस ओबद्याह योना मीका नहूम हबक्कूक सपन्याह हाग्गै जकर्याह मलाकीChapter
यशायाह 1 यशायाह 2 यशायाह 3 यशायाह 4 यशायाह 5 यशायाह 6 यशायाह 7 यशायाह 8 यशायाह 9 यशायाह 10 यशायाह 11 यशायाह 12 यशायाह 13 यशायाह 14 यशायाह 15 यशायाह 16 यशायाह 17 यशायाह 18 यशायाह 19 यशायाह 20 यशायाह 21 यशायाह 22 यशायाह 23 यशायाह 24 यशायाह 25 यशायाह 26 यशायाह 27 यशायाह 28 यशायाह 29 यशायाह 30 यशायाह 31 यशायाह 32 यशायाह 33 यशायाह 34 यशायाह 35 यशायाह 36 यशायाह 37 यशायाह 38 यशायाह 39 यशायाह 40 यशायाह 41 यशायाह 42 यशायाह 43 यशायाह 44 यशायाह 45 यशायाह 46 यशायाह 47 यशायाह 48 यशायाह 49 यशायाह 50 यशायाह 51 यशायाह 52 यशायाह 53 यशायाह 54 यशायाह 55 यशायाह 56 यशायाह 57 यशायाह 58 यशायाह 59 यशायाह 60 यशायाह 61 यशायाह 62 यशायाह 63 यशायाह 64 यशायाह 65 यशायाह 66Verse
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यशायाह 30:13 पर Commentary
यह व verse विशेष उस संदर्भ के भीतर आता है जहाँ प्रभु अपने लोगों के भरोसे के ठहराव को चुनौती देता है और उन्हीं से ईश्वर की योजना के अनुरूप मार्गदर्शन माँगता है। यह पंक्ति बताती है कि अपनी अधर्मपूर्ण योजनाओं और जिद से बने ऊँचे, ढाँचे दावों का परिणाम कैसे अस्थिर और ढहने वाला होता है। यह पाठ हमें स्मरण दिलाता है कि भरोसे और खोजपूर्ण दया के बजाय जो रास्ते हमने चुने हैं, वे अचानक ढह सकते हैं, और ईश्वर के उद्देश्य के सामने मानव योजनाओं की वास्तविकता उजागर हो जाती है।
पद का मूल अर्थ और प्रसंग
यशायाह महाकाव्य का यह अंश यह दिखाता है कि शाश्वत न्याय के प्रकाश में इंसान की प्रत्यक्ष आश्रय-स्थलीय संरचनाएँ कितना पत्थर-गिरोह बन सकती हैं। प्रवचनकर्ता (यशायाह) यहाँ यह संकेत देता है कि परमेश्वर के इरादों के विपरीत बनायी गए मार्ग, चाहे वे कितने भी उन्नत क्यों न लगें, जल्दी या देर में टूट पड़ते हैं। यह न केवल तत्काल खतरों की चेतावनी है, बल्कि भविष्य की मुक्ति-योजना के लिए एक प्रेरणा भी है कि ईश्वर के साथ बने विश्वास-संक्रमण में ही स्थायित्व है।
मुख्य संदेश
उपयुक्त क्रॉस-रेफरेंसे
इन सन्दर्भों से इस पाठ के तीन-चार आयाम स्पष्ट होते हैं:
इन संदर्भों से यह निष्कर्ष निकलता है कि स्थायित्व वही है जो परमेश्वर के वचन के अनुरूप हो और जो हमारी सांसारिक योजना-निर्माण के पीछे से उभरती है।
पाइनेदार विचार
यदि हमारे दिनचर्या और निर्णय ईश्वर की इच्छा के अनुरूप हों, तो चाहे परिस्थियाँ कैसी भी हों, हमारा विश्वास स्थिर रहता है। ताकि मानव-निर्मित उच्च दीवारें गिरें, पर ईश्वर की दया-दीवार सुरक्षित रहे।
संक्षिप्त devotional reflection
हमारे लिये संदेश साफ है: अपने सपनों और योजनाओं को एक बार चेक करें—क्या वे ईश्वर-आज्ञा के अनुसार हैं? यदि हाँ, तो डर-रहित आशीष और स्थिरता है; यदि नहीं, तो यह संकेत है कि समय आ गया है कि हम ईश्वर के मार्ग की ओर पलटें और उसकी सुरक्षा में आश्रय पाएं। यह छुटा हुआ भाग नहीं, बल्कि एक चेतावनी है कि अधर्म के ऊँचे ढाँचे पल भर में गिर पड़ते हैं।
ऐतिहासिक पंक्ति के विचार Matthew Henry, Albert Barnes तथा Adam Clarke के प्रमाण-उद्धरणों के साथ मिलकर, यह कहती है कि सही-शब्द के अनुरूप बनाया गया ढांचा स्थिर रहता है, जबकि मानव-निर्मित ऊँचाइयाँ अकस्मात ढह सकती हैं।
महत्वपूर्ण संदर्भ:
इस verses का अंतिम संदेश: ईश्वर का उद्देश्य सर्वोपरि है; हमारी दयालु और समर्पित आस्था उसी मार्ग पर चलती है जहाँ दीवारें टूटती हैं, पर परमेश्वर की दीवारें अडिग रहती हैं।
यदि आप चाहें, मैं इन विचारों को और संक्षिप्त या विस्तृत कर दूँ या किसी अन्य इन्टरप्रिटेशन-उद्धरण को शामिल कर दूँ।
उद्धरण नोट: यदि उपलब्ध हों, मैं Matthew Henry, Albert Barnes या Adam Clarke के छोटे-छोटे सीधे शब्द उद्धरणों को स्पष्ट रूप से चिह्नित कर दूँगा।