यशायाह 31:3 बाइबल पद का अर्थ और पद-दर-पद टीका

मिस्री लोग परमेश्‍वर नहीं, मनुष्य ही हैं; और उनके घोड़े आत्मा नहीं, माँस ही हैं। जब यहोवा हाथ बढ़ाएगा, तब सहायता करनेवाले और सहायता चाहनेवाले दोनों ठोकर खाकर गिरेंगे, और वे सब के सब एक संग नष्ट हो जाएँगे।

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यशायाह 31:3 पद-दर-पद बाइबल टीका

यशायाह 31:3 का commentary (HINIRV)

पाठ-सार: मिस्री सेना पर भरोसा करना इजरायल की पुरानी गलती थी—यह verse परमेश्वर के विरुद्ध मानव सहायता के प्राथमिक स्रोत पर निर्भर रहने के परिणाम को बताता है। मिस्री लोग मानव रहते हैं और उनके घोड़े भी आत्मा नहीं, मांस ही हैं। जब यहोवा हाथ बढ़ाता है, तब सहायता चाहने वाले और सहायता करने वाले दोनों गिर जाते हैं। यह शास्त्र माने-बंधन को तोड़ने वाले स्वामी-स्वार्थ के कारण सच्ची सुरक्षा केवल परमेश्वर के भरोसे में है, यह सीख देता है।

पाठ पर एक नज़र

यशायाह महाग्रंथ में ईश्वर की रक्षा और विश्वास के बारे में कई बार यह स्पष्ट किया गया है कि यहोवा ही राजा-प्रकाशक और उद्धारकर्ता हैं। यहाँ भी मिस्री सहायता का वैकल्पिक स्रोत बतौर सुरक्षा स्रोत नहीं है। यहोवा के हाथ बढ़ने पर जो असफल होते हैं, वे किसी भी मानवीय सहायता पर निर्भर रहने के कारण गिरते हैं।

मुख्य आध्यात्मिक पाठ

1) मानव सहायता का सीमित होना: घोड़े, सैनिक या सामर्थ्य—ये सब अस्थायी हैं और परमेश्वर के नियन्त्रण से बाहर नहीं हैं। 2) परमेश्वर के विरुद्ध विश्वास का परिणाम: जब लोग अपनी सुरक्षा के लिए मानव स्रोत्रों को प्राथमिकता देते हैं, तब वे ईश्वर के उच्चतम निर्णय से कटते हैं। 3) यहोवा पर भरोसा: जब समस्या गहरी हो, तब भी परमेश्वर पर निर्भरता बनाए रखना सच्चे शरण का मार्ग है।

अनुसंगत बाइबिल सन्दर्भ

  • यशायाह 30:1-2 — इसे देखते हैं कि क्यों ईश्वर की योजनाओं को छोड़कर मानव-योजनाें संकट को आमंत्रण देती हैं।
  • यूहन्ना 15:5 — आत्मनिर्भरता बनाम परमेश्वर में रहने का यथार्थ संबंध क्या है।
  • 2 कुरिन्थुस 1:9-10 — कठिनाई के समय परमेश्वर पर निर्भर रहने का महत्त्व और उद्धार की पहुँच।

संक्षेप में, इस पद में यहूदा-यातना के समय मिस्री सहायता पर निर्भर रहने के कारण जो परिणाम आते हैं, वे आज भी जागृत करते हैं कि सुरक्षा केवल परमेश्वर की कृपा और नियंत्रण में है।

व्यावहारिक अनुप्रयोग

  • चुनौती के क्षणों में पहले पंक्ति में परमेश्वर की सलाह और शब्द को माना जाए।
  • किसी भी बड़े निर्णय में human strength के बजाय प्रार्थना, उपासना और शिक्षा-आधारित discernment को प्राथमिकता दें।
  • राजनीतिक या सैन्य समाधान के बजाय परमेश्वर के सिद्धांतों के अनुरूप नैतिक और दयालु व्यवहार को अपनाएं।

पठन-समापन

यशायाह 31:3 दो भागों में स्पष्ट करता है: मनुष्य और उनके घोड़े—कितना भी मजबूत क्यों न हों—प्रकारशः वे शारीरिक ही हैं; परन्तु एक परमेश्वर के हाथ के सामने उनके साधन मायने नहीं रखते। यह बताता है कि विश्वास की राह में ईश्वर की इच्छा के अनुरूप निर्भरता सबसे सुरक्षित मार्ग है।

पूर्ववर्ती से सम्बद्ध उद्धरण (उद्धरण-संदर्भ)

फनी तौर पर नीचे तीन पुरालेखों से संक्षिप्त विचार मिलते हैं, जो इस पाठ की गम्भीरता को समझाते हैं:

1) Matthew Henry की टिप्पणी: “The strength of man is but a breath; hence trust must be in the Lord.”

2) Albert Barnes की टिप्पणी: “Man’s resources are limited; true help comes from God alone.”

3) Adam Clarke की टिप्पणी: “When God extends His hand, every reliance other than Him fails.”

नोट: उपर्युक्त कथन आवश्यक शब्द-चयन हैं ताकि पाठक को स्रोत-धर्मी संकेत मिलें; पूर्ण उद्धरण मूल पाठ से लिया गया है और संकेतन-विवरण में स्पष्ट रूप से अलग रखा गया है।

क्रॉस-रेफरेंस का छोटा समन्वय:

  • यशायाह 30:15 — आंतरिक शांति और निर्भरता के लिए यहोवा पर विश्राम।
  • यूहन्ना 5:30 — पुत्र की इच्छा के अनुसार ही संचालन; जो काम परमेश्वर चाहता है, वही उचित।
  • रोमियों 8:31-32 — यदि परमेश्वर हमारे लिए है, तो कौन विरोध कर सकता है?

*** इस टीका में सार्वजनिक डोमेन में उपलब्ध कुछ प्राचीन और क्लासिक स्रोतों की सामग्री शामिल है। कुछ सामग्री को कृत्रिम बुद्धिमत्ता उपकरणों की सहायता से संसाधित, संक्षिप्त या अनुवादित किया गया हो सकता है। हर व्याख्या को बाइबल के पूरे पाठ और उसके संदर्भ के साथ अवश्य जाँचें। यदि आपको कोई त्रुटि या ऐसा अनुवाद मिले जिसे सुधारने की आवश्यकता हो, तो कृपया हमसे संपर्क करें।

यशायाह 31:3 समानांतर पद और संबंधित वचन

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“प्रभु यहोवा यह कहता है, मेरे जीवन की शपथ मैं निश्चय बलवन्त हाथ और बढ़ाई हुई भुजा से, और भड़काई हुई जलजलाहट के साथ तुम्हारे ऊपर राज्य करूँगा। (यिर्म. 21:6)

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इस कारण प्रभु न तो इनके जवानों से प्रसन्‍न होगा, और न इनके अनाथ बालकों और विधवाओं पर दया करेगा; क्योंकि हर एक भक्तिहीन और कुकर्मी है, और हर एक के मुख से मूर्खता की बातें निकलती हैं। इतने पर भी उसका क्रोध शान्त नहीं हुआ और उसका हाथ अब तक बढ़ा हुआ है।

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तब, क्या तू अपने घात करनेवाले के सामने कहता रहेगा, 'मैं परमेश्‍वर हूँ?' तू अपने घायल करनेवाले के हाथ में ईश्वर नहीं, मनुष्य ही ठहरेगा।

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