Old Testament
उत्पत्ति निर्गमन लैव्यव्यवस्था गिनती व्यवस्थाविवरण यहोशू न्यायियों रूत 1 शमूएल 2 शमूएल 1 राजाओं 2 राजाओं 1 इतिहास 2 इतिहास एज्रा नहेम्याह एस्तेर अय्यूब भजन संहिता नीतिवचन सभोपदेशक श्रेष्ठगीत यशायाह यिर्मयाह विलापगीत यहेजकेल दानिय्येल होशे योएल आमोस ओबद्याह योना मीका नहूम हबक्कूक सपन्याह हाग्गै जकर्याह मलाकीChapter
यशायाह 1 यशायाह 2 यशायाह 3 यशायाह 4 यशायाह 5 यशायाह 6 यशायाह 7 यशायाह 8 यशायाह 9 यशायाह 10 यशायाह 11 यशायाह 12 यशायाह 13 यशायाह 14 यशायाह 15 यशायाह 16 यशायाह 17 यशायाह 18 यशायाह 19 यशायाह 20 यशायाह 21 यशायाह 22 यशायाह 23 यशायाह 24 यशायाह 25 यशायाह 26 यशायाह 27 यशायाह 28 यशायाह 29 यशायाह 30 यशायाह 31 यशायाह 32 यशायाह 33 यशायाह 34 यशायाह 35 यशायाह 36 यशायाह 37 यशायाह 38 यशायाह 39 यशायाह 40 यशायाह 41 यशायाह 42 यशायाह 43 यशायाह 44 यशायाह 45 यशायाह 46 यशायाह 47 यशायाह 48 यशायाह 49 यशायाह 50 यशायाह 51 यशायाह 52 यशायाह 53 यशायाह 54 यशायाह 55 यशायाह 56 यशायाह 57 यशायाह 58 यशायाह 59 यशायाह 60 यशायाह 61 यशायाह 62 यशायाह 63 यशायाह 64 यशायाह 65 यशायाह 66Verse
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यशायाह 45:14 — एक दासी भक्ति और ईश्वर-केवलता की पुष्टि
इस पद का संदर्भ यद्धार्ष epoch में है जब यहोवा यह कहता है कि मिस्र, कुश वंश के व्यापार-लाभ और समृद्धि के ढांचे भी अंततः सार्वभौमिक निर्भरता के संकेत बनेंगे। इस संदेश का केन्द्र ईश्वर की एकतान्वेषी सत्ता है: “हाँ, तेरे पीछे-पीछे वे आयेंगे, वे तेरे सामने दण्डवत् कर विनती करेंगे, क्योंकि परमेश्वर तेरे साथ है।”
पाठ का तात्पर्य: परमेश्वर की एकाग्र सत्ता और राष्ट्र-इतिहास की दिशा
यह संदेश स्पष्ट करता है कि सांसारिक सम्पन्नता और साम्राज्यों के व्यापार-सम्बंध उनके प्रभु के नियन्त्रण से मुक्त नहीं रहते। वे एक दिन उस परमेश्वर के सामने विनय करते नहीं थकेंगे जिसकी साथीयता और सत्ता का उद्घाटन इस्राइल के लिए प्रमाणित है। साथ ही, यहूदी-युग के बाहर के राष्ट्रों की खोज-परिचय भी इस संदेश में दिखती है, जो यह दर्शाती है कि सलामती और मान्यता की राह बहुधर्मी न होकर एक ईश्वर की स्तुति से जुड़ती है।
महत्त्वपूर्ण शब्द और चित्र
अन्य प्रत्यक्ष संदर्भ और सम्बन्ध
कई बार इसी विषय पर पवित्र ग्रंथ यहूदियों के बाहर के राष्ट्रों के साथ परमेश्वर की उदारता को दर्शाते हैं:
Matthew Henry, Albert Barnes, Adam Clarke से संक्षेपित संकेत
यह भाग उन टिप्पणीकारों के अनुसार, परमेश्वर की विश्व-विकास यात्रा में इस्राइल-जाति के साथ बाहरी राष्ट्रों की विनय और सेवा का क्रम दिखाता है—इसे उनकी एकात्मता और ईश्वर की महिमा के रूप में पढ़ना चाहिए।
Marginal नोट्स: Henry का तर्क है कि यह संदेश यहूदियों के लिए आश्वासन है कि उनकी मित्रता परमेश्वर के साथ स्थिर है; Barnes इसे यह दर्शाते हैं कि व्यापार-समृद्धि भी ईश्वर के मंचन का भाग है, जो उसे ही सम्मानित करे। Clarke इस बात पर बल देते हैं कि यहउद्धार-योजना में बहुधर्मी राष्ट्र भी अंततः परमेश्वर के उद्देश्यों के सहभागी बनेंगे।
आज के लिए अनुप्रयोग
- हमारी पहचान आर्थिक सफलता से अधिक ईश्वर की उपस्थिति में है। जब भी राज्य-शक्ति, धन-संपदा या संपन्नता बढ़ती दिखे, तो दिल यह याद रखे कि सच की सुरक्षा और स्थिरता केवल परमेश्वर की साथ ही है।
- अन्य राष्ट्र, संस्थान या पथ के प्रतीक कैसे भी दिखें, अंत में पूजा और विनय की मुद्रा परमेश्वर के विरुद्ध नहीं, बल्कि उसके साथ एकत्व के संकेत होनी चाहिए।
संक्षिप्त संदर्भ-निर्देश
यशायाह 45:14 के साथ पास के पद—जक 8:22-23 और प्रका 3:9—इस बात का मजबूत स्मरण देते हैं कि परमेश्वर की एकता और उसकी महिमा क्या-क्या परिस्थितियों में भी प्रभावी रहते हैं।
नोट: नीचे दिया गया पाठ्य भाग: “यहोवा यह कहता है…”: यह स्पष्ट करता है कि क्योंकि परमेश्वर ही एकमात्र सत्य परमेश्वर हैं, इसलिए अन्य दावों पर विनयपूर्वक विचार करना चाहिए।