Old Testament
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यिर्मयाह 13:1 यिर्मयाह 13:2 यिर्मयाह 13:3 यिर्मयाह 13:4 यिर्मयाह 13:5 यिर्मयाह 13:6 यिर्मयाह 13:7 यिर्मयाह 13:8 यिर्मयाह 13:9 यिर्मयाह 13:10 यिर्मयाह 13:11 यिर्मयाह 13:12 यिर्मयाह 13:13 यिर्मयाह 13:14 यिर्मयाह 13:15 यिर्मयाह 13:16 यिर्मयाह 13:17 यिर्मयाह 13:18 यिर्मयाह 13:19 यिर्मयाह 13:20 यिर्मयाह 13:21 यिर्मयाह 13:22 यिर्मयाह 13:23 यिर्मयाह 13:24 यिर्मयाह 13:25 यिर्मयाह 13:26 यिर्मयाह 13:27



यिर्मयाह 13:23 का मूल्यांकन एवं अर्थ
सीधा अर्थ: अगर कुष्ठी अपने चमड़े का रंग या चीता अपने धब्बे बदल सकता है, तो तू भी, जो बुराई को सीख गई है, भलाई क्यों नहीं कर सकेगी?
प्रसंगिक पृष्ठभूमि
यिर्मयाह नबी का यह संकेतक प्रश्न उस समय के सामाजिक और नैतिक संकट को सामने लाता है, जब यहूदा जाति ईश्वर के प्रति अविश्वास और पाप की राह पर चल रही थी। नबी यहाँ प्रकृति-शास्त्र के सरल उदाहरणों के जरिये एक गहरे नैतिक सत्य को उठाते हैं: परिवर्तन संभव है, पर वह तब तक नहीं जब तक व्यक्ति अपने जुर्म से युद्ध नहीं करता और परमेश्वर की rightly ordered life की ओर लौटता नहीं। यिर्मयाह के संदेश में यही उद्देश्य है—मन की स्थिरता, पवित्र जीवन की इच्छा और बुराई से विमुख रहने की शक्ति परमेश्वर से ही आती है।
व्याख्यात्मक अवलोकन
1) यह वाक्य प्रकृति के परिवर्तन से नैतिक परिवर्तन को तुलना देता है। चमड़े के रंग में बदलाव या धब्बों के परिवर्तन से तू भलाई कर सकेगा—यह बात शास्त्रीय रूप से असम्भव नहीं परन्तु यह तात्कालिक रूप से नैतिक सुधार के आग्रह को स्पष्ट करती है।
2) यिर्मयाह ताने के रूप में नहीं, बल्कि चेतावनी के रूप में प्रस्तुत करते हैं: जो लोग बुराई की आदत में डूब चुके हैं, वे सामान्य परिस्थितियों से भलाई की दिशा में नहीं लौटेंगे जब तक उनका हृदय स्वेच्छा से परिवर्तन की चेष्टा नहीं करता।
3) यह उद्धरण ईश्वरीय सहायता की आवश्यकता पर बल देता है: मनुष्य की नैतिक उपलब्धि केवल आत्म-परिश्रम से नहीं, बल्कि दिव्य सहायता और परिवर्तन के अभिनय से संभव है।
थीम-हाइलाइट
अनुसंगत संदर्भ
1) यिर्मयाह 6:16–19: परमेश्वर जीवन-मार्ग का आह्वान करते हैं और दिखाते हैं कि परिवर्तन तब ही संभव है जब भीड़-भाड़ के बीच व्यक्ति स्वयं उद्धार की राह की खोज करता है।
2) यिर्मयाह 18:1–6: वस्त्र-निर्माण की एक जीवंत चित्रण में, भगवान कहते हैं कि वे उच्च-नीच रूप से बनाते हैं; परिवर्तन उनकी मर्यादा के अनुसार होता है।
3) गलातियों 5:22–23 (अन्य नए नियम के संदर्भ के तौर पर): प्रेरणा के फल और नैतिक परिवर्तन का बायबलिक संकेत देता है कि आत्मा से प्रभुत्व पाने पर ही भलाई फलीभूत होती है।
व्यावहारिक निष्कर्ष
- जो लोग परिवर्तन चाहते हैं, उन्हें पहले अपना हृदय ईश्वर के स्वागत के लिए खुला करना चाहिए।
- बुराई की आदतों को पहचानना और उनको छोड़ना केवल सतर्क आत्म-निरीक्षण से संभव है, न कि केवल बाहरी व्यवहार से।
उद्धरण-संभाव और संरचना
यहां उपलब्ध मानक बाइबल टीका-संकेतों में कुछ प्रसिद्ध टिप्पणीकारों से संक्षिप्त संकेत मिलते हैं:
Matthew Henry, Albert Barnes, Adam Clarke के सार्वजनिक-डायम में से पंक्तियाँ इस प्रकार संकलित होकर मुख्य विचारों को समर्थ देती हैं: “Change is possible only when the heart is renewed by grace” आदि, लेकिन मूल पाठ में उनकी सटीक उद्धरण संकलित रूप में नीचे नहीं दिए गए हैं। पाठ-जीवन के लिए आवश्यक निहित तत्त्वों का सार नीचे समाहित है।