Old Testament
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यिर्मयाह 1 यिर्मयाह 2 यिर्मयाह 3 यिर्मयाह 4 यिर्मयाह 5 यिर्मयाह 6 यिर्मयाह 7 यिर्मयाह 8 यिर्मयाह 9 यिर्मयाह 10 यिर्मयाह 11 यिर्मयाह 12 यिर्मयाह 13 यिर्मयाह 14 यिर्मयाह 15 यिर्मयाह 16 यिर्मयाह 17 यिर्मयाह 18 यिर्मयाह 19 यिर्मयाह 20 यिर्मयाह 21 यिर्मयाह 22 यिर्मयाह 23 यिर्मयाह 24 यिर्मयाह 25 यिर्मयाह 26 यिर्मयाह 27 यिर्मयाह 28 यिर्मयाह 29 यिर्मयाह 30 यिर्मयाह 31 यिर्मयाह 32 यिर्मयाह 33 यिर्मयाह 34 यिर्मयाह 35 यिर्मयाह 36 यिर्मयाह 37 यिर्मयाह 38 यिर्मयाह 39 यिर्मयाह 40 यिर्मयाह 41 यिर्मयाह 42 यिर्मयाह 43 यिर्मयाह 44 यिर्मयाह 45 यिर्मयाह 46 यिर्मयाह 47 यिर्मयाह 48 यिर्मयाह 49 यिर्मयाह 50 यिर्मयाह 51 यिर्मयाह 52Verse
यिर्मयाह 13:1 यिर्मयाह 13:2 यिर्मयाह 13:3 यिर्मयाह 13:4 यिर्मयाह 13:5 यिर्मयाह 13:6 यिर्मयाह 13:7 यिर्मयाह 13:8 यिर्मयाह 13:9 यिर्मयाह 13:10 यिर्मयाह 13:11 यिर्मयाह 13:12 यिर्मयाह 13:13 यिर्मयाह 13:14 यिर्मयाह 13:15 यिर्मयाह 13:16 यिर्मयाह 13:17 यिर्मयाह 13:18 यिर्मयाह 13:19 यिर्मयाह 13:20 यिर्मयाह 13:21 यिर्मयाह 13:22 यिर्मयाह 13:23 यिर्मयाह 13:24 यिर्मयाह 13:25 यिर्मयाह 13:26 यिर्मयाह 13:27



यिर्मयाह 13:25 पर दृष्टिकोण: अपना हिस्सा खो देना
मुख्य interpretive point: यह वाक्य यहोवा की सांसारिक-आध्यात्मिक बातें एक चेतावनी के रूप में देता है—तूने अपना भाग ठहराया है, पर वह भाग मुझसे भुलकर झूठ पर टिके रहने के कारण तेरा भाग बन गया है। जब लोग अपने भरोसे को परमेश्वर के स्थान पर झूठे उपायों या तात्कालिक सुखों में डालते हैं, तो परिणामस्वरूप उनकी स्थिति स्पष्ट रूप से खो जाती है। यिर्मयाह के संदर्भ में यह उन लोगों के प्रति है जो ईश्वर के निज सेवा से पलायन कर झूठे निःसार मार्गों को अपनाते हैं। यहोवा कहता है कि उनका हिस्सा वही है जो उन्होंने अपनी आपसी भागीदारी में चुना है—खुद की योजनाओं, पATRों या झूठे भरोसों के कारण।
साहित्यिक संदर्भ और अंगीकरण
यिर्मयाह 13 में संदर्भित घटना में ईश्वर अपने लोगों से चिंता व्यक्त करते हैं कि उन्होंने बंधनों के मानक को तोड़कर पिडितता और भ्रष्टाचार की राह अपनाई है। यह वाणी “तेरा हिस्सा” शब्द से स्पष्ट करती है कि भाग्य या चयनों का निर्णय मानव के हाथ में होता है, न कि केवल ईश्वर के निर्देशों के अनुरूप। इतिहासिक तौर पर यह चेतावनी तब प्रासंगिक होती है जब याकूब-वंश के लोग पवन-परंपराओं से दूर हटते हैं, और धार्मिक अनुग्रह से भटककर झूठे विश्वासों पर टिकते हैं।
theological significance
यह वचन दो प्रमुख theological theme जाहिर करता है: पहला, पाप के कारण विभ्रम—हम अपना भाग स्वयं तय कर लेते हैं और परमेश्वर के वचन के अनुरूप नहीं चलते; दूसरा, divine justice—झूठ पर टिके रहने से परिणाम स्पष्ट होते हैं और भाग वही बनता है जो हमने चुना होता है। Isa. 2:22 और होशिया 4:6 जैसे संदर्भों के साथ यह जोड़ा जा सकता है कि परमेश्वर के मार्ग से चूकना आत्म-नाश की ओर ले जाता है जब मानव अपनी चाल चलता है।
Cross-references और उनके संक्षेप वर्णन
इन संदर्भों से स्पष्ट होता है कि ईश्वर सचेत करते हैं कि गलत भरोसा कैसे आत्म-हानि का कारण बन सकता है और सच्चे हिस्से को खो देता है।
विचार-योग्य प्रश्न (Reflection)
संक्षिप्त निष्कर्ष
यिर्मयाह 13:25 हमें याद दिलाता है कि हमारा हिस्सा—अंततः वही रूप लेता है जिसे हमने चुना है। झूठे भरोसे और अपने-अपने स्वार्थों के कारण हम ईश्वर के साथ अपने रिश्ता और भाग को खो देते हैं। परमेश्वर की ओर लौटना ही जीवन का सुरक्षित मार्ग है, ताकि हमारा हिस्सा फिर से उसी ग़ैर-परिवर्तनीय विश्वास में स्थापित हो सके जो Him पर आधारित है।
नोट्स (Quoted text from classic commentators)
यदि आप चाहें, तो Matthew Henry, Albert Barnes या Adam Clarke के सार्वजनिक-डोमेन टिप्पणियों से संक्षिप्त उद्धरण जोड़े जा सकते हैं। इस पेज में प्रयुक्त विचारों के लिए नीचे से उद्धरण की पहचान दी जा सकती है:
कहीं-कहीं उन लेखकों के छोटे-छोटे वाक्यांश जो पाठ के साथ सीधे मेल खाते हैं, वे “यिर्मयाह 2:13” या “झूठ पर भरोसा” के बिंदुओं पर संदर्भित हो सकते हैं।