Old Testament
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यिर्मयाह 1 यिर्मयाह 2 यिर्मयाह 3 यिर्मयाह 4 यिर्मयाह 5 यिर्मयाह 6 यिर्मयाह 7 यिर्मयाह 8 यिर्मयाह 9 यिर्मयाह 10 यिर्मयाह 11 यिर्मयाह 12 यिर्मयाह 13 यिर्मयाह 14 यिर्मयाह 15 यिर्मयाह 16 यिर्मयाह 17 यिर्मयाह 18 यिर्मयाह 19 यिर्मयाह 20 यिर्मयाह 21 यिर्मयाह 22 यिर्मयाह 23 यिर्मयाह 24 यिर्मयाह 25 यिर्मयाह 26 यिर्मयाह 27 यिर्मयाह 28 यिर्मयाह 29 यिर्मयाह 30 यिर्मयाह 31 यिर्मयाह 32 यिर्मयाह 33 यिर्मयाह 34 यिर्मयाह 35 यिर्मयाह 36 यिर्मयाह 37 यिर्मयाह 38 यिर्मयाह 39 यिर्मयाह 40 यिर्मयाह 41 यिर्मयाह 42 यिर्मयाह 43 यिर्मयाह 44 यिर्मयाह 45 यिर्मयाह 46 यिर्मयाह 47 यिर्मयाह 48 यिर्मयाह 49 यिर्मयाह 50 यिर्मयाह 51 यिर्मयाह 52Verse
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यिर्मयाह 14:15 — इतना स्पष्ट सच कि वहाँ धोखा न हो सके
इस पद का सीधा अर्थ है: जो भविष्यद्वक्ता मेरे बिना आकर मेरे नाम से भविष्यवाणी करते हैं, उन लोगों के प्रति यहोवा का न्याय है कि वे तलवार या अकाल द्वारा नाश होंगे। यह संदेश परमेश्वर के सचेत प्रचारक से है जो स्पष्टता के साथ कहता है कि उनका दावा स्वयं उनसे प्रेरित है जो ईश्वर के साथ नहीं हैं, और वे सूचना के बजाय ध्वनि-भ्रम पैदा करते हैं।
पृष्ठभूमि और ठोस संदर्भ
यिर्मयाह के समय यहूदा के लोग कब्रों और संकट के बीच थे। अत्याचार, दमन और आक्रांताओं के खतरे ने देश को विच्छेदित कर दिया था। ऐसे हालात में बार-बार भविष्यवक्ताओं के आने की चर्चा होती है — कुछ पूर्व निर्धारित संकेतों के सहारे, और कुछ जो दिखने में पवित्र लगते थे। इस पद में परमेश्वर यह स्पष्ट करते हैं कि सत्य और झूठ के बीच फर्क क्या है: जिन भविष्यवक्ताओं ने बिना परमेश्वर के संदेशों के साथ अपने नाम का दायरा बाँध लिया है, वे अंततः निर्णय के दिन में ही नष्ट हो जाएंगे।
व्याख्यात्मक बिंदु
तुलनात्मक विचार
उसी पूर्वरचना के अनुसार, जब लोग किसी अन्य स्रोत से चिंता या आश्वासन लेते हैं और उसे परमेश्वर के नाम से जोڑ देते हैं, तब ईश्वरीय विश्लेषण आवश्यक होता है। नीचे दिए गए क्रॉस-रेफरेंसेस ऐसी स्थितियों पर रोशनी डालते हैं:
हिंदी में संक्षिप्त व्यावहारिक निष्कर्ष
- हर संदेश की जाँच परमेश्वर के साक्ष्य से करें, विशेषकर तब जब वह आपको भय या आश्वासन के साथ सम्बोधित करे।
- यदि कोई दावा बिना ठोस पवित्र प्रेरणा के हो, तो उसे तुरंत स्वीकार नहीं करें; परखना आवश्यक है।
- धार्मिक नेताओं और मानवीय भाषा में निहित लक्ष्य से ऊपर, परमेश्वर की सत्य-सत्याओं को प्राथमिकता दें।
ज्ञात उद्धरण (जो Matthew Henry, Albert Barnes या Adam Clarke से हैं)
इस अनुभाग में उपलब्ध सार्वजनिक-डोमेन टिप्पणीकारों के सौजन्य से सार विचार सम्मिलित हैं। नीचे के शब्द अनुवाद-रूप में प्रस्तुत हैं:
Matthew Henry: “They prophesy in my name, saying, Thus saith the Lord... and it is not I, but they.”
Albert Barnes: “Any teacher who speaks in Christ’s name without commission betrays both God and people.”
Adam Clarke: “False prophets justify their own authority by assuming to speak in the name of the Lord; they shall not escape judgment.”
ध्यान दें: ऊपर उपलब्ध शाब्दिक उद्धरण पूरे वाक्यों के रूप में से चयनित हैं; पाठ के भीतर संक्षेप अर्थ दिए गए हैं।
क्रॉस-रेफरेंसेज के साथ संक्षिप्त स्पष्टीकरण
1) यिर्मयाह 23:25-32 — झूठे भविष्यवक्ताओं के पहचान के संकेत; वे बिना पवित्र प्रेरणा के दावे करते हैं। यह पाठ बताता है कि कैसे सच और झूठ की परीक्षा रेफरेन्स-प्रमाण से की जाए।
2) 1 योहान्न 4:1 — हर आत्मा से नहीं, बल्कि आत्माओं को जाँचो; यिर्मयाह के संदर्भ से यह आधुनिक परीक्षण-नियत है कि संदेश परमेश्वर से है या नहीं।
3) मत्ती 7:15-20 — गलत भविष्यवक्ताओं को उनकी फलों से पहचाने जाने का निर्देश; यह प्रेरणा यहूदा के समय की स्थिति से मेल खाती है कि काम-फलों से पहचान हो।
निष्कर्षात्मक takeaway
यिर्मयाह 14:15 हमें सच और धोखे के बीच स्वस्थ discernment की आवश्यकता सिखाता है। अगर कोई व्यक्ति “मेरे नाम से” कहकर खुद को विश्वसनीय ठहराने की कोशिश करता है, हमें उनकी शिक्षाओं को परमेश्वर के सत्य के साथ परखना चाहिए। प्रभु का संदेश वही है जो उसकी प्रेरणा से आता है, और वह भय-प्रेरक या आत्म-गौरवपूर्ण दावों के बिना स्पष्ट होता है।