Old Testament
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यिर्मयाह 1 यिर्मयाह 2 यिर्मयाह 3 यिर्मयाह 4 यिर्मयाह 5 यिर्मयाह 6 यिर्मयाह 7 यिर्मयाह 8 यिर्मयाह 9 यिर्मयाह 10 यिर्मयाह 11 यिर्मयाह 12 यिर्मयाह 13 यिर्मयाह 14 यिर्मयाह 15 यिर्मयाह 16 यिर्मयाह 17 यिर्मयाह 18 यिर्मयाह 19 यिर्मयाह 20 यिर्मयाह 21 यिर्मयाह 22 यिर्मयाह 23 यिर्मयाह 24 यिर्मयाह 25 यिर्मयाह 26 यिर्मयाह 27 यिर्मयाह 28 यिर्मयाह 29 यिर्मयाह 30 यिर्मयाह 31 यिर्मयाह 32 यिर्मयाह 33 यिर्मयाह 34 यिर्मयाह 35 यिर्मयाह 36 यिर्मयाह 37 यिर्मयाह 38 यिर्मयाह 39 यिर्मयाह 40 यिर्मयाह 41 यिर्मयाह 42 यिर्मयाह 43 यिर्मयाह 44 यिर्मयाह 45 यिर्मयाह 46 यिर्मयाह 47 यिर्मयाह 48 यिर्मयाह 49 यिर्मयाह 50 यिर्मयाह 51 यिर्मयाह 52Verse
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यिर्मयाह 14:21 का अर्थ और संदर्भ
इस पद के अनुसार प्रार्थना और आस्था के क्षण में ईश्वर के नाम के लिए हमारी भक्ति और उसके वचनों के प्रति हमारी वफादारी ही सबसे महत्वपूर्ण है। यिर्मयाह उन लोगों से उस समय संवाद कर रहे हैं जो संकट में हैं और चकित होकर कहते हैं कि परमेश्वर हमें ठुकरेगा नहीं। पवित्रता और सच्चे नैतिक निर्णयों के साथ, हमें अपने परमेश्वर के तेजोमय सिंहासन का सम्मान बनाए रखना चाहिए, और जिन्हें उसने बाँधी है—आशीर्वाद, प्रतिज्ञा, और वचन—उनको स्मरण रखना चाहिए।
पद का पृष्ठभूमि
यिर्मयाह के समय यहूदियों पर अकाल-यातना और दृष्टि-निर्वह संकट छाया हुआ था। नबी Yirmiyahu लोगों को परमेश्वर के साथ उनके संबंधों की सच्ची दशा की याद दिलाते रहे—क्या उनका प्रार्थना-आश्रय वास्तव में परमेश्वर के वचन के अनुरूप है या नहीं। यहाँ यह आग्रह है कि संकट के समय भी परमेश्वर के नाम और उसकी प्रतिज्ञाओं के प्रति हमारी आस्था अडिग रहे, क्योंकि वही निष्ठा से जो वचनों में बाँधी गई है, उसे स्मरण कर और उसे न तोड़।
व्याख्यात्मक अवलोकन
संयुक्त चित्त से समझी जाने वाली बातें
अनुसंगत क्रॉस-रेफरेंसे जो विचार जोड़ती हैं
यिर्मयाह 31:33-34 — परमेश्वर अपनी नई वाचा के रूप में खाने में नहीं, बल्कि हृदय में लिखे विचार-सम्पूर्ण कानून की प्रतिज्ञा देता है; हमारे विश्वास में स्थिरता आता है।
भजन 22:4-5 — संकट काल में भी हमारे पूर्वजों की तरह परमेश्वर पर निर्भर रहने की याद दिलाता है कि उसने हमारे तोड़-फोड़ के समय भी सहायता की।
याकूब 1:12 — धैर्य से perseverence दिखाने वाले को ईश्वर का आशीर्वाद मिलता है; इनCE पंक्तियाँ हमारे विश्वास को परखती हैं कि हम क्या वाचा-निष्ठ रहने में सक्षम हैं।
व्यावहारिक निष्कर्ष
विपत्तियों के बीच भी अपने परमेश्वर के नाम और उससे जुड़ी प्रतिज्ञाओं के प्रति हमारे विश्वास को बनाए रखना चाहिए। यह प्रार्थना का मूल स्रोत है—स्वार्थ से मुक्त विश्वास के साथ—जो स्मरण और पालन के द्वारा दृढ़ होता है।
संक्षिप्त निष्कर्ष
यिर्मयाह 14:21 हमें याद दिलाता है कि संकट की घड़ियों में भी परमेश्वर के नाम-चान और उसके वचनों के प्रति अडिगता ही हमें विश्वास की राह पर बनाए रखती है। इसी से हम भगवान की कृपा और सुरक्षा को अनुभव कर पाते हैं।
योग्य उद्धरण: यदि आप चाहें तोMatthew Henry, Albert Barnes या Adam Clarke के संक्षिप्त टिप्पणी-रेखा से उपयुक्त वाक्यों का संक्षेप उद्धरण आवश्यक स्थान पर शामिल किया जा सकता है।