यिर्मयाह 38:16 बाइबल पद का अर्थ और पद-दर-पद टीका

तब सिदकिय्याह राजा ने अकेले में यिर्मयाह से शपथ खाई, “यहोवा जिसने हमारा यह जीव रचा है, उसके जीवन की सौगन्ध न मैं तो तुझे मरवा डालूँगा, और न उन मनुष्यों के वश में कर दूँगा जो तेरे प्राण के खोजी हैं।”

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यिर्मयाह 38:16 पद-दर-पद बाइबल टीका

यिर्मयाह 38:16 — सिदकिय्याह की एकांत शपथ

परिदृश्य का आरम्भ: यह वाक्य लाक्षाग्रह-काल के भीतर एक कठिन समय को दर्शाता है जब यिर्मयाह निष्कासित रूप से नगर से बाहर खदेड़ा गया था और उसने राजा सिदकिय्यह के सम्मुख संवाद किया। राजा ने एकांत में, अपने दायित्व और भय के बीच, यिर्मयाह से शपथ ग्रहण किया, जिसमें वह कहता है कि उसने न तो यिर्मयाह को मरवाने का और न उन लोगों के हाथ में आने का जोखिम उठाने की योजना बनाई है जो उसकी जान के पीछे पड़े हैं। यह शपथ सत्ता-सम्बन्धित दबावों और भय के समय में एक निर्भीक विश्वस्तता की माँग को दर्शाती है।

ईश्वर और आस्था पर टेक

यह वाक्य ईश्वर के नये-पुराने संबंध के बीच सुरक्षा की कसौटी प्रस्तुत करता है। राजा का कथन है कि Yahweh जिसने हमारा जीवन रचा है, उसकी शपथ पर यह निश्चितता है कि वह किसी भी बाहरी प्रतिद्वंद्विता के कारण राजा या जनता को हानि पहुँचाने की योजना नहीं बनाएगा। यहाँ आस्था का अर्थ यह है कि संघर्ष के समय भी भरोसा बने रहता है कि परमेश्वर हमारे जीवन के स्रोत और सुरक्षा-धारा से जुड़ा है।

शब्दों और चित्रों की स्पष्टता

“जीव-रचना” का इशारा सृजनकर्ता की सुरक्षा-चक्र से है। “शपथ” भावनात्मक और कानूनी दोनों रूपों में एक प्रतिज्ञा है, जिसका पालन अनिवार्य माना गया है। यह दृश्य यह स्पष्ट करता है कि सत्ता के दबाव में भी सत्यनिष्ठा और दृढ़ विश्वास कायम रह सकता है।

समान विचार के अन्य छल्ले

निम्न संदर्भ इस दृश्य के साथ संगत हैं:

  • यिर्मयाह 26:15 — नबी का संरक्षण और ईश्वर-वरदान का भरोसा, भले ही शासक उसे नहीं समझे।
  • यिर्मयाह 39:15-18 — हर विपत्ति के समय परमेश्वर की सुरक्षा पर विश्वास रखने की प्रेरणा।
  • यशायाह 41:10 — भय छोड़कर ईश्वर के साथ निर्भय रहने की चेतावनी और आश्वासन।

इन पारितोष्यों में यह स्पष्ट है कि परमेश्वर अपने प्रचार-कार्य के युगों में सत्य और सुरक्षा प्रदान करता है, भले ही तत्काल परिस्थितियाँ असहाय-सी लगें।

आज के संदर्भ में उपयोगिता

आज का पाठ यह सिखाता है कि दबाव के समय भी नैतिकता और दायित्व के सामने हम सच बोलें और ईश्वर की सुरक्षा पर भरोसा रखें। यह प्रेरणा देता है कि नीतिगत निर्णयों के बीच भी हमारे निजी आस्थागत संकल्प अप्रभावित रहें, ताकि दूसरों के लिए भी एक सम्वेदनशील-आत्मिक उदाहरण बनें।

प्रमुख विचार

• संकट की स्थिति में भी ईश्वर-आस्था को दृढ़ रखना।

• शपथ और सत्यनिष्ठा की महत्ता—निःस्वार्थता और धार्मिक निष्ठा का संगम।

• जीवन की सुरक्षा के लिए भरोसा केवल मानवीय आश्रयों पर नहीं, बल्कि परमेश्वर की योजना पर रखना।

Cross-references (संक्षेप में)

• यिर्मयाह 26:15: नबी की सुरक्षा और ईश्वर पर निर्भर विश्वास की पुष्टि।

• यिर्मयाह 39:15-18: संकट के बीच परमेश्वर का संरक्षण और उद्धार की गारंटी।

• यशायाह 41:10: भय से मुक्त होकर ईश्वर के साथ निर्भय रहने का आह्वान।

निष्कर्ष: इस क्षण में राजा के कथन से स्पष्ट होता है कि ईश्वर के जीवन-नियामक हाथों में ही हमारा वास्तविक जीवन-सुरक्षा है, और हमारा विश्वास उस सुरक्षा की पुष्टि करता है।

*** इस टीका में सार्वजनिक डोमेन में उपलब्ध कुछ प्राचीन और क्लासिक स्रोतों की सामग्री शामिल है। कुछ सामग्री को कृत्रिम बुद्धिमत्ता उपकरणों की सहायता से संसाधित, संक्षिप्त या अनुवादित किया गया हो सकता है। हर व्याख्या को बाइबल के पूरे पाठ और उसके संदर्भ के साथ अवश्य जाँचें। यदि आपको कोई त्रुटि या ऐसा अनुवाद मिले जिसे सुधारने की आवश्यकता हो, तो कृपया हमसे संपर्क करें।

यिर्मयाह 38:16 समानांतर पद और संबंधित वचन

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उसके बहुत दिन बीतने पर सिदकिय्याह राजा ने उसको बुलवा भेजा, और अपने भवन में उससे छिपकर यह प्रश्न किया, “क्या यहोवा की ओर से कोई वचन पहुँचा है?” यिर्मयाह ने कहा, “हाँ, पहुँचा है। वह यह है, कि तू बाबेल के राजा के वश में कर दिया जाएगा।”

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फिर जो वचन यिर्मयाह सब लोगों से कहता था, उनको मत्तान के पुत्र शपत्याह, पशहूर के पुत्र गदल्याह, शेलेम्याह के पुत्र यूकल और मल्किय्याह के पुत्र पशहूर ने सुना,

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मैं सदा मुकद्दमा न लड़ता रहूँगा, न सर्वदा क्रोधित रहूँगा; क्योंकि आत्मा मेरे बनाए हुए हैं और जीव मेरे सामने मूर्छित हो जाते हैं।

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