Old Testament
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यशायाह 1 यशायाह 2 यशायाह 3 यशायाह 4 यशायाह 5 यशायाह 6 यशायाह 7 यशायाह 8 यशायाह 9 यशायाह 10 यशायाह 11 यशायाह 12 यशायाह 13 यशायाह 14 यशायाह 15 यशायाह 16 यशायाह 17 यशायाह 18 यशायाह 19 यशायाह 20 यशायाह 21 यशायाह 22 यशायाह 23 यशायाह 24 यशायाह 25 यशायाह 26 यशायाह 27 यशायाह 28 यशायाह 29 यशायाह 30 यशायाह 31 यशायाह 32 यशायाह 33 यशायाह 34 यशायाह 35 यशायाह 36 यशायाह 37 यशायाह 38 यशायाह 39 यशायाह 40 यशायाह 41 यशायाह 42 यशायाह 43 यशायाह 44 यशायाह 45 यशायाह 46 यशायाह 47 यशायाह 48 यशायाह 49 यशायाह 50 यशायाह 51 यशायाह 52 यशायाह 53 यशायाह 54 यशायाह 55 यशायाह 56 यशायाह 57 यशायाह 58 यशायाह 59 यशायाह 60 यशायाह 61 यशायाह 62 यशायाह 63 यशायाह 64 यशायाह 65 यशायाह 66



यशायाह 57:16 पर टिप्पणी
इस पद में परमेश्वर अपने दयालु और किरपा-भरे स्वभाव को स्पष्ट करते हैं—वह न केवल दूसरों के लिए प्रत्यक्ष न्याय के लिए तत्पर रहते हैं, बल्कि लोग अपनी पाप-छवि से जो दूर हो चुके हैं, उनके लिए भी सचेत रहते हैं। संदर्भ में यशायाह भविष्यवाणी के दौरान अंतर-आत्मिक टकराव, शिशु-यत्राण और वैयक्तिक अश्रोताओं के विरुद्ध ईश्वर की स्थिरता उभरती है। पंक्ति एक प्रकार से ईश्वर की अनंत धैर्य और प्रतिरोहण-रहित क्रूरता के विरुद्ध नरमीनिष्ठा को दर्शाती है—यह बताती है कि ईश्वर विरोधाभास नहीं चाहते, बल्कि उद्धार और पुनरुद्धार के लिए तत्पर रहते हैं।
मुख्य अर्थ
यहाँ परमेश्वर अपने आत्म-प्रकृति के अनुरूप बतातe हैं कि वे “सदा मुकद्दमा नहीं लड़ते” और “सदा क्रोधित नहीं रहते”। इसका आशय है कि उनका न्याय कभी पूर्व निर्धारित चिर-क्रोध नहीं है; वे दयालु और क्षमाशील रहते हैं। आत्मा उनके बनाए हैं—यानी उनका प्राणी-रचना और संचालन उनकी पवित्रता और सत्य का परिणाम है—और मनुष्य की अस्थिरता के बीच परमेश्वर का सहानुभूतिपूर्ण ध्यान बना रहता है, यहां तक कि वे जीवों के कारण पाप के कारण आहिस्ता पर सदा के लिए मूर्छित नहीं रहते।
केंद्रीय विषय
संबद्ध अंश और पार संदर्भ
1) यशायाह 54:10 — चाहे पर्वत जीवित रहें या धरती डगमगाएं, ईश्वर की निष्कलंक वचन स्थिर रहते हैं; उनकी दयालुता कभी न समाप्त हो।
2) योहन्ना 3:17 — परमेश्वर उद्धार के लिए आये, न कि संसार को दण्डित करने, बल्कि जगत के लिए जीवन दे।
3) इफिसियों 2:4-5 — ईश्वर की आराधना और करूणा के कारण हम जीवित हो जाते हैं, वह हमारे अंदर से नयी सजीवता लाते हैं।
व्यावहारिक विचार
हमारे जीवन में तनाव और ग़लतियों के समय, परमेश्वर का यह स्वर स्पष्ट रूप से स्मरणीय है: वह प्रत्यक्ष दंड से पहले प्रेम और क्षमा की दिशा कायम रखते हैं। स्वयं के दोषों के कारण निराश होने की बजाय, पुराने तरीकों को छोड़कर उनकी आस्था-प्रेम के मार्ग पर चलना चाहिए। ध्यान दें: आत्मा की प्रेरणा से ही जीवन की विभिन्न कठिनाईयों में शांति मिलती है और पुनर्स्थापना संभव होती है।
संक्षिप्त समापन
यशायाह 57:16 में ईश्वर स्पष्ट करते हैं कि उनका स्वभाव दयालु है और वे बनाये हुए जीवों के साथ सृजन-उद्धार की दिशा में सक्रिय रहते हैं। उनका क्रोध समय-समय पर आता है, पर स्थिर प्रेम और क्षमा उनकी मुख्य प्रकृति है। यह वचन विश्वस्तपना देता है कि परमेश्वर हमारी कमजोरियों के बीच भी हमारे लिए सतत देखभाल और जीवन-संचार प्रदान करते हैं।
कठोर पाठ के लिए: आदि–क्लार्क, मैथ्यू हेनरी और जीन-बार्न्स जैसे सार्वजनिक-डायमेंशन टिप्पणीकारों से संयुक्त प्रेरणा प्राप्त है; उनके विचारों के संक्षिप्त चिंतन सार्वजनिक-डायरेक्ट उद्धरणों के अनुसार मिलते हैं, पर यहाँ इन्हें केवल समन्वित सार के तौर पर प्रस्तुत किया गया है।