Old Testament
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यशायाह 1 यशायाह 2 यशायाह 3 यशायाह 4 यशायाह 5 यशायाह 6 यशायाह 7 यशायाह 8 यशायाह 9 यशायाह 10 यशायाह 11 यशायाह 12 यशायाह 13 यशायाह 14 यशायाह 15 यशायाह 16 यशायाह 17 यशायाह 18 यशायाह 19 यशायाह 20 यशायाह 21 यशायाह 22 यशायाह 23 यशायाह 24 यशायाह 25 यशायाह 26 यशायाह 27 यशायाह 28 यशायाह 29 यशायाह 30 यशायाह 31 यशायाह 32 यशायाह 33 यशायाह 34 यशायाह 35 यशायाह 36 यशायाह 37 यशायाह 38 यशायाह 39 यशायाह 40 यशायाह 41 यशायाह 42 यशायाह 43 यशायाह 44 यशायाह 45 यशायाह 46 यशायाह 47 यशायाह 48 यशायाह 49 यशायाह 50 यशायाह 51 यशायाह 52 यशायाह 53 यशायाह 54 यशायाह 55 यशायाह 56 यशायाह 57 यशायाह 58 यशायाह 59 यशायाह 60 यशायाह 61 यशायाह 62 यशायाह 63 यशायाह 64 यशायाह 65 यशायाह 66



यशायाह 57:5 पर व्याख्या (HINIRV)
पुष्ट-संदर्भ में यह पद उस समय के विरुद्ध धारणाओं और बुरे कर्मों का वर्णन करता है जब लोग पवित्र परमेश्वर की उपस्थिति से विमुख होकर और अज्ञान के गर्भ में तपस्या के स्थान पर अनैतिक पथ अपनाते हैं। यहाँ संदर्भ यह दिखाता है कि अवगुणों के कारण वे पेड़–पौधों और गुफाओं की देवी-देवताओं के पास जाते हैं, बच्चों के रक्षक-सम्बन्धी और हिंसक क्रिया करते हैं, ताकि उनकी देह और इच्छा पूरी हो जाए। यह चेतावनी नहीं कि देवताओं की पूजा वास्तविक है, बल्कि यह स्पष्ट करता है कि पतन का मार्ग बुरे संस्कारों के कारण है, जो समाज और आत्मा दोनों को छिन्न-भिन्न कर देता है.
मुख्य संदेश
यशायाह 57 का यह भाग गहरा सवाल उठाता है: मानव आत्मा कब तक सांसारिक आकर्षणों के आगे झुकती है? यहां “हरे वृक्षों के तले देवताओं के कारण” का उल्लेख उन वैकल्पिक संकल्पनाओं की ओर इशारा करता है जिनमें लोग प्रकृति-पूजा या आस्तीक प्रतीकों के पीछे वास्तविक आशीष और शांति ढूंढ़ते हैं। परिशिष्ट रूप से, बाल-बच्चों की हत्या एक कठोर उदाहरण है कि कैसे पाप सामाजिक जीवन को विकृत कर देता है, और यह संकेत करता है कि परमेश्वर के साथ रिश्ते में टूटने से नैतिक ढाँचा गिर जाता है।
दो-तीन प्रमुख विषय
पवित्र-क्रॉस-रेफरेंसेस (संक्षेप में)
1) निर्लज्ज पाप के परिणामों पर फोकस: अन्य ग्रंथ बताते हैं कि पाप के कारण जीवन में भटकाव और हिंसा बढ़ती है; यह पन्ने इस तथ्य को दृष्टिगत बनाते हैं कि निर्भीक पाप समाज को नष्ट कर देता है।
2) परमेश्वर के साथ लौटना: बाइबल के अन्य भागों में कहा गया है कि ईश्वर अपनी करुणा से लौटने वाले को स्वीकारते हैं और शांति प्रदान करते हैं।
3) प्रकृति-पूजा के विरुद्ध एक warning: यह बताता है कि प्रकृति के प्रतीकों के पीछे भी यदि आत्मा का शोषण हो, तो वह अस्थिर और खंडित बन जाता है।
व्यावहारिक विचार
आज के दिन भी हम अपने जीवन की “तलों” की पहचान करें जहाँ हम सांसारिक आकर्षण, भय या लाभ के लिए परमेश्वर से स्वतंत्र हो जाते हैं। परिवार, समाज या संचार के भीतर हिंसा या नैतिक कमी के संकेत दिखें तो वह भी इस पाठ का संकेत हैं कि परमेश्वर के पास लौटना ही स्वस्थ जीवन की कड़ी है। धार्मिक प्रतीकों के पीछे आश्वासन नहीं, बल्कि आस्था का ढांचा चाहिए, जो करूणा और न्याय में स्थिर हो।
संक्षिप्त निष्कर्ष
यशायाह 57:5 का मूल संदेश यह है कि आत्मिक सुरक्षा और शांति केवल परमेश्वर के साथ सीधे रिश्ते में मिलती है; हटकर प्रकृति-पूजा या गलत कदम मनुष्यों को नैतिक रूप से तितर-बितर कर देता है। यदि हम उसकी ओर लौटें, तो शांति, न्याय और जीवन का मूल ढाँचा फिर से स्थिर हो सकता है।
कुछ संदर्भ
यशायाह 1:11–17; मत्ती 11:28-30; रोम 8:6 — ये संदर्भ बताते हैं कि पाप से मुक्ति और आत्मा की नि:श्वास शांति परमेश्वर के साथ संबंध में ही मिलती है।