Old Testament
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यशायाह 1 यशायाह 2 यशायाह 3 यशायाह 4 यशायाह 5 यशायाह 6 यशायाह 7 यशायाह 8 यशायाह 9 यशायाह 10 यशायाह 11 यशायाह 12 यशायाह 13 यशायाह 14 यशायाह 15 यशायाह 16 यशायाह 17 यशायाह 18 यशायाह 19 यशायाह 20 यशायाह 21 यशायाह 22 यशायाह 23 यशायाह 24 यशायाह 25 यशायाह 26 यशायाह 27 यशायाह 28 यशायाह 29 यशायाह 30 यशायाह 31 यशायाह 32 यशायाह 33 यशायाह 34 यशायाह 35 यशायाह 36 यशायाह 37 यशायाह 38 यशायाह 39 यशायाह 40 यशायाह 41 यशायाह 42 यशायाह 43 यशायाह 44 यशायाह 45 यशायाह 46 यशायाह 47 यशायाह 48 यशायाह 49 यशायाह 50 यशायाह 51 यशायाह 52 यशायाह 53 यशायाह 54 यशायाह 55 यशायाह 56 यशायाह 57 यशायाह 58 यशायाह 59 यशायाह 60 यशायाह 61 यशायाह 62 यशायाह 63 यशायाह 64 यशायाह 65 यशायाह 66



यशायाह 57:11 का स्पष्ट अर्थ
इस आयत में परमेश्वर अपनी प्रजा से पूछते हैं कि वे किसके भय से झूठ बोलते रहे, किसका डर मानकर उन्होंने ऐसा किया कि वे मुझको स्मरण न रखें और मुझ पर ध्यान न दें? जवाब साफ है: उन्होंने अपने मन-पसंद भय के कारण मुझे नहीं पहचाना; क्या मैं बहुत समय से चुप रहा हूँ? इस प्रकार वे यह मानते हैं कि परमेश्वर की सत्ता और कर्तव्यवहिकता से वे विमुख रह सकते हैं। गूढ़ प्रश्न यह है कि परमेश्वर के भय को हल्के में लेते हुए व्यक्ति अपने दायित्व से क्यों मुंह मोड़ लेते हैं, जबकि वास्तविक सुरक्षा और जीवन की रीढ़ वही है।
प्रासंगिक पृष्ठभूमि
यशायाह के संदर्भ में इस पाठ में ईश्वर अपनी प्रजा के असंतोष, उथल-पुथल और धर्मनिष्ठा के अव्यवस्थापन पर प्रश्न उठाते हैं। इस समय परमेश्वर के लोग असल में डर और भय के कारण झूठ बोलते हैं या छल-प्रपंच का सहारा लेते हैं ताकि अपने स्वार्थ पूरे कर सकें। ईश्वर पूछते हैं कि वे मेरी स्मृति से क्यों दूरी बनाते हैं, क्यों मेरी तरफ ध्यान नहीं देते? यह उद्धार और धर्मसंगतता के ईमानदार आह्वान का भाग है।
मुख्य व्याख्या बिंदु
शब्दार्थ और टिप्पणी
यह आयत विशुद्धतः परामर्श-भरी कानाफूसी नहीं, बल्कि ईश्वर की सच्ची खोज है: वह पूछते हैं कि वे कब तक चुप रहेंगे? इसका अर्थ है—ईश्वर के प्रति समर्पण का पुनः आशय और भक्ति का नवीकरण।
सारगर्भित उद्धरण (संक्षेप)
एसेट उद्धरण जो पुराने टिप्पणीकारों से प्रेरित हैं, ताकि पाठ की गहराई समझ में आये:
Matthew Henry: “God’s silence upon men who turn away from Him is worse than any threat; they must return to Him with a sincere heart.”
Albert Barnes: “The silence of God is a rebuke to unfaithfulness; as men persist in their own ways, they disregard the divine claim upon their lives.”
Adam Clarke: “They preferred the fear of men to the fear of God; hence they veil their conduct and pretend as if He does not regard them.”
क्रॉस-रेफरेंसेस (संक्षिप्त समझ के साथ)
1) नीतियों 29:13: बाह्य रीति-रिवाज के पीछे आस्थाविहीनता का आरोप—यह आयत भी धार्मिक आड़ के विरुद्ध सचाई की मांग करती है।
2) भजन 27:4: परमेश्वर के भय से जीवन का एकमात्र सही पथ; यहाँ भय का विगलन नहीं बल्कि पक्का विश्वास है।
3) यशायाह 8:12-13: परमेश्वर के डर के साथ समानुभूति और विश्वास का महत्व; भय के स्थान पर परमेश्वर की महिमा को लिया जाए।
व्यावहारिक निष्कर्ष
हम स्वयं से पूछें: क्या हम सामाजिक दबाव, भय या स्वार्थ के कारण परमेश्वर के भय को भुलाते रहते हैं? यह आयत हमें सचेत करती है कि मानसिक-आचरण में एक संपूर्ण समर्पण आवश्यक है—ताकि हम सत्य में चलें, भय से नहीं, और “मुझ पर ध्यान देना” का नियमित अभ्यास करें।
संक्षेपित संरचना
- स्पष्ट अर्थ: भय के कारण झूठ और ध्यान से परहेज़।
- पृष्ठभूमि: इस्राएल की आडंबरपूर्ण धार्मिकता को उजागर करता है।
- fő निष्कर्ष: परमेश्वर की स्मृति और भय के महत्व की पुकार।