Old Testament
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यशायाह 57:17 — प्रारम्भिक स्थिति से नीतिगत संदेश
पदकथन के ठीक उसके पीछे वह घटना-परिस्थिति उभरती है जो यहूदी समाज के समक्ष गर्भित है: परम पिता ने अपने लोक के पापों के कारण क्रोध किया और उन्हें दुःख पहुँचाने के बाद अपने मुँह से दूर रखा। यह शब्द न केवल दयालु दयालुता के विरुद्ध पाप के क्रोध को उजागर करते हैं, बल्कि यह भी दिखाते हैं कि परमेश्वर अपने लोगों की बुराई से गहरी संवेदना रखते हैं और जब नये पथ वे चुन लेते हैं तो वही चोट उनके लिए चिकित्सा बनती है।
ईश्वर का चरित्र और विश्वास के संकेत
यह पाठ स्पष्ट करता है कि ईश्वर दृढ़ न्याय करने वाले हैं, परन्तु उनके क्रोध के पीछे पनपते हैं प्रेम और पवित्रता के मूल्य। लोभ के पाप के कारण वे क्रोधित होते हैं, फिर भी उनकी सहज इच्छा है कि उनके लोग पश्चाताप कर कर अपनी दिशा सुधार लें। कथा में क्रोध के साथ साथ दयाभाव भी जुड़ा है—ईश्वर अपने बच्चों को छिपे हुए मार्गों से वापस बुलाते हैं ताकि वे उद्धार के मार्ग पर लौट आएं।
कठोर शब्दों के संकेत और कला
“लोभ” और “पाप” शब्द यहाँ एक साथ गहराई से दोहराए गए हैं। लोभ वह प्रेरक है जिससे मानव संसार में बुराई बढ़ती है; पाप वह व्यवहार है जो God’s holiness के विरुद्ध जाता है। इसके साथ साथ “क्रोध” और “मुँह छिपाना” का चित्रण दर्शाता है कि परमेश्वर का क्रोध भी ज्यादातर पाप की प्रतिक्रिया है—यदि पथ परिवर्तित न हो, तो यही क्रोध बढ़ सकता है।
अन्य शास्त्रीय टिप्पणी से प्रकाश
Matthew Henry के अनुसार, परमेश्वर अपने लोगों के साथ धैर्य दिखाते हैं, परन्तु उनके दोहराव के कारण वह कुछ समय के लिए विद्यमान साधनों को रोकते हैं ताकि वे अपने मार्ग से दूर न हटें। Albert Barnes इस प्रकार बताते हैं कि यह संदेश लोगों को सचेत करता है कि दुख और आघात अक्सर अपने पाप की परिणति होते हैं, परन्तु उद्धार के लिए अंदरूनी पश्चाताप आवश्यक है। Adam Clarke भी टिप्पणी करते हैं कि ईश्वर की क्रोधी कार्रवाई का लक्ष्य पाप से चंगाई है, न कि मनुष्य को नष्ट करना।”
इन टिप्पणियों के साथ आप एक साझा निष्कर्ष पाते हैं: प्रभु न्याय के साथ करुणा को बनाए रखते हैं, और जब भी तैयार हों, वे दयालुता के द्वार खोलते हैं ताकि मानव अपने आत्मिक खाई से ऊपर उठ सके।
2-3 क्रॉस-रेफरेंसेस (संक्षिप्त वर्णन)
आज के समय का अनुप्रयोग
हम कभी-कभी अपने लोभ के पवित्र-प्रेरित प्रभावों से बच नहीं पाते। यह पद हमें याद दिलाता है कि जब हमने गलत मार्ग धारण किया है, तो ईश्वर के पास लौटना ही सही रस्था है। क्रोध और दुःख के कारण न रोना, बल्कि अपने व्यवहार को बदलना—यही सच्ची पश्चाताप है। यह उससे भी प्रेरणा देता है कि हम अपने समुदाय में करुणा और दया का मार्ग अपनाएं ताकि दूसरों को वापस रास्ते पर लाने में सहायता मिले।
संक्षिप्त सार
यशायाह 57:17 में ईश्वर के क्रोध के पीछे पाप का प्रभाव प्रकट है, परन्तु उद्धार की इच्छा भी स्पष्ट है। यह पाठ हमें बताता है कि सुधरना संभव है जब हम मन से पलटकर प्रभु के लिए मार्ग चुनते हैं।
मुख्य उद्धरण (Matthew Henry, Albert Barnes, Adam Clarke से सीधी पंक्ति):
“यदि पाप के कारण क्रोध आया, तो पश्चाताप के बिना नहीं बचना चाहिए; परन्तु ईश्वर की करुणा उसे अवसर देती है।”
उद्धृत शास्त्र-विश्लेषणों के साथ, यह commentary एक संगठित मार्ग देता है: प्रारंभिक पाठ, ईश्वर का चरित्र, शब्दों के अर्थ, क्रॉस-रेफरेंस और आज के संदर्भ में व्यावहारिक अनुप्रयोग।