Old Testament
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यशायाह 1 यशायाह 2 यशायाह 3 यशायाह 4 यशायाह 5 यशायाह 6 यशायाह 7 यशायाह 8 यशायाह 9 यशायाह 10 यशायाह 11 यशायाह 12 यशायाह 13 यशायाह 14 यशायाह 15 यशायाह 16 यशायाह 17 यशायाह 18 यशायाह 19 यशायाह 20 यशायाह 21 यशायाह 22 यशायाह 23 यशायाह 24 यशायाह 25 यशायाह 26 यशायाह 27 यशायाह 28 यशायाह 29 यशायाह 30 यशायाह 31 यशायाह 32 यशायाह 33 यशायाह 34 यशायाह 35 यशायाह 36 यशायाह 37 यशायाह 38 यशायाह 39 यशायाह 40 यशायाह 41 यशायाह 42 यशायाह 43 यशायाह 44 यशायाह 45 यशायाह 46 यशायाह 47 यशायाह 48 यशायाह 49 यशायाह 50 यशायाह 51 यशायाह 52 यशायाह 53 यशायाह 54 यशायाह 55 यशायाह 56 यशायाह 57 यशायाह 58 यशायाह 59 यशायाह 60 यशायाह 61 यशायाह 62 यशायाह 63 यशायाह 64 यशायाह 65 यशायाह 66



यशायाह 57:13 पर नज़र: उद्धार कहाँ है?
यह पद यीशायाह विभाग के उच्च और गहरे प्रसंग में आता है, जहाँ ईश्वर अपने संरक्षण, भय और शांति की वास्तविकता को उजागर करते हैं। वह मूर्तियों के भरोसे को छोड़ने की चेतावनी देते हैं और उन लोगों के लिए आश्वासन देते हैं जो परमेश्वर की शरण लेते हैं। शरण लेने का व्यवहार, निर्भरता और आस्था का नवीनीकरण है जो जीवन में राज्य-स्तर तक प्रभाव डालता है।
पद का परिचय: अध्याय के भीतर यह संदेश
57 अध्याय में ईश्वर के विरुद्ध अन्य आराधनाओं के दिखावे के विरुद्ध निंदा और उद्धार की योजना बनती है। verse 13 में कहा गया है कि जब तू दुहाई दे, तब जिन मूर्तियों को तूने जमा किया है वे ही तुझे छुड़ाएँ! वे सब हवा की तरह उड़ जाएँगी; परन्तु जो मेरी शरण लेगा, वह देश का अधिकारी होगा, और मेरे पवित्र पर्वत का अधिकारी होगा।
मुख्य आध्यात्मिक पाठ: मुख्य सीख
समकक्ष पाठ: अन्य बाइबल-जिन्हें देखें
1) यशायाह 46:7 — मूर्तियों पर निर्भरता का गहरा ठेस: मूर्तियाँ वक्तव्य देती हैं, पर वे चिरस्थाई सुरक्षा नहीं दे पातीं। यह verse 57:13 के विरुद्ध एक समान चेतावनी है कि मनुष्य को केवल परमेश्वर के भरोसे पर टिकना चाहिए।
2) यिर्मयाह 17:7-8 — धन-सम्पत्ति पर निर्भर रहने की नहीं, बल्कि परमेश्वर पर निर्भर रहने की आशीष: वृक्ष भूमंडल पर पानी से लहलहाते हैं, पर जो परमेश्वर पर नहीं टिकता वह क्षणभंगुर है—यही संदेश यहाँ भी है।
3) भजन 46:1-3 — परमेश्वर हमारा सहारा और बल है, संकट के समय वह शांति देता है; यह प्रेरणा 57:13 के शरण-भाव से मेल खाती है कि शरण लेने वाले को देश-का अधिकारी बनना है।
व्यवहारिक अनुप्रयोग
- जब चिंता बढ़े, तो सीधे परमेश्वर के सामने खड़े रहें और अपनी बाधाओं को उनके चरणों में डाल दें।
- अपने भरोसे की जड़ें मूर्तियों की जगह प्रार्थना, पवित्रशास्त्र के अध्ययन और समुदायिक समर्थन में लगाएं।
- जीवन के हर क्षेत्र में शांति को प्राथमिकता दें—आत्मिक, मनोवैज्ञानिक और सामाजिक—क्योंकि शरण लेना वास्तविक चंगाई कीकड़ी है।
सूक्ष्म क्रॉस-रेफरेंसेस और अर्थ-सहयोग
- “जो मेरी शरण लेगा वह देश का अधिकारी होगा” के विचार से ईश्वर का सम्मानित नेतृत्व और सुरक्षा स्थापित होती है। यह बात मैथ्यू हेनरी (Matthew Henry) में भी देखी जा सकती है कि परमेश्वर के भरोसे से ही जीवन-स्थिति में परिवर्तन आता है।
- परमेश्वर-आश्रय से जुड़े हुए उद्धरणों में Barnes और Clarke के विचारों के अनुसार, मूर्तिपूजा के दिखावे में वास्तविक शांति नहीं मिलती; केवल परमेश्वर का सहारा ही स्थाई है।
छोटा सार: संक्षिप्त निष्कर्ष
57:13 बताता है कि संकट के समय मूर्तियों पर दुहाई करने से राहत नहीं मिलती; जो परमेश्वर की शरण लेता है, वही शांति और अधिकार पाता है। यह संदेश आज भी प्रासंगिक है: वास्तविक सुरक्षा भीतर से आती है—आस्था, समर्पण और परमेश्वर के साथ संगति।