Old Testament
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यिर्मयाह 1 यिर्मयाह 2 यिर्मयाह 3 यिर्मयाह 4 यिर्मयाह 5 यिर्मयाह 6 यिर्मयाह 7 यिर्मयाह 8 यिर्मयाह 9 यिर्मयाह 10 यिर्मयाह 11 यिर्मयाह 12 यिर्मयाह 13 यिर्मयाह 14 यिर्मयाह 15 यिर्मयाह 16 यिर्मयाह 17 यिर्मयाह 18 यिर्मयाह 19 यिर्मयाह 20 यिर्मयाह 21 यिर्मयाह 22 यिर्मयाह 23 यिर्मयाह 24 यिर्मयाह 25 यिर्मयाह 26 यिर्मयाह 27 यिर्मयाह 28 यिर्मयाह 29 यिर्मयाह 30 यिर्मयाह 31 यिर्मयाह 32 यिर्मयाह 33 यिर्मयाह 34 यिर्मयाह 35 यिर्मयाह 36 यिर्मयाह 37 यिर्मयाह 38 यिर्मयाह 39 यिर्मयाह 40 यिर्मयाह 41 यिर्मयाह 42 यिर्मयाह 43 यिर्मयाह 44 यिर्मयाह 45 यिर्मयाह 46 यिर्मयाह 47 यिर्मयाह 48 यिर्मयाह 49 यिर्मयाह 50 यिर्मयाह 51 यिर्मयाह 52Verse
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यिर्मयाह 9:23 (HINIRV): संदर्भ-उद्धरण और व्याख्या
आ krantik संदर्भ: यह पद यिर्मयाह के दौर की उन परिस्थितियों को दिखाता है जब परमेश्वर उच्च-नीचे के ढरनों को सार्थक ठहराते हैं—यानी, संसार की करामात, धन-वैभव और शौर्य के आधार पर आत्म-गौरव की प्रवृत्ति को अस्वीकार किया जाता है। यह उद्धारक संदेश—“निर्भरता केवल परमेश्वर में”—युवाओं, राजाओं और समाज के हर वर्ग के लिए है।
ईश्वरीय संदेश का तात्पर्य
यिर्मयाह कहता है कि परमेश्वर बुद्धिमान को घमण्ड, वीर को घमण्ड और धन-धान्य वाले को घमण्ड से रोकता है। यहाँ घमण्ड से तात्पर्य है स्वयं के उच्चतम मान-समझ को मानना कि मैंने सब कुछ अपने बल पर पाया है। परमेश्वर इस प्रकार की मान-मनौवल को नहीं सहन करते। वह इस बात को दिखाते हैं कि वास्तविक बड़प्पन और सुरक्षा ईश्वर की कृपा और उसकी व्यवस्था में है, न कि मनुष्यों की उपलब्धियों में।
शब्दों की व्याख्या
अन्य प्रासंगिक पवित्र ग्रंथ
यिर्मयाह 9:23 से मिलते-जुलते शिक्षात्मक संकेत अन्य प्रकार के उद्धरणों में भी मिलते हैं जो तब भी आत्म-आत्मसुख के विरुद्ध चेतावनी देते हैं—कि हमारा अस्तित्व और सुरक्षा परमेश्वर की कृपा पर निर्भर होनी चाहिए। साथ ही, प्रेरितों के काम में भी ईश्वर-आस्था का केन्द्रता दिखती है, जो धन-वैभव के बजाय दया और धार्मिक मनोभावना पर टिके रहने को कहती है।
प्रायोगिक अनुप्रयोग
आज के विश्वासियों के लिए यह संदेश मध्य में रखता है कि हम अपनी उपलब्धियों पर गर्व न करें, बल्कि अपनी बुद्धिमत्ता, वीरता या धन-सम्पदा को परमेश्वर की सर्वश्रेष्ठ योजना में एक स्रोत मानकर उसका धन्यवाद करें। महानता को परखना है कि क्या यह परमेश्वर की धरोहर के रूप में प्रस्तुत है या आत्म-गौरव के रूप में है।
Cross-references (संक्षेप व्याख्या)
- मत्त 6:19-21: आकाशीय धरोहरों पर ध्यान दें—जहाँ अंतिम सुरक्षा ईश्वर के स्वर्गीय राज्य में है, न कि धरातली संपत्ति में।
- 1 कुरिंथ 1:26-29: परमेश्वर दया से अशक्तों को उच्च स्थान देता है; संसार की बुद्धिमानी का वास्तविक मूल्य ईश्वर की दृष्टि में क्या है यह दिखता है।
- कोलोस 3:12-14: आपसी प्रेम, नम्रता और विनम्रता—घमण्ड के विपरीत एक नए मानव बनना।
उच्चारण और उद्धरण — सार्वजनिक-डोमेन टिप्पणीकारों के विचार
यह पाठ बारम्बार यह दर्शाता है कि आंतरिक मूल्यों की सच्चाई बाहरी शक्ति से ऊपर है। उदाहरण के लिए, मैथ्यू हेनरी, ऐल्बर्ट बार्न्स और एडम क्लार्क के पुराने टिप्पणीकारों के विचारों में यह विचार उपजीविका पाता है कि धार्मिक जीवन में आत्म-गौरव का दबना और ईश्वर की महिमा का केन्द्र बनना चाहिए।
मैथ्यू हेनरी से: “अगर कोई बुद्धि का बड़ा दर्प करता है, तो वह स्वयं को निरंतर परमेश्वर की कृपा के बिना नहीं समझ पाता।” (संक्षेप सार)
एडल्ट बार्न्स से: “धन-धन्य होने पर भी, वास्तविक मूल्य परमेश्वर के सम्मुख विनम्रता और दया है।”
एडम क्लार्क से: “घमण्ड सांसारिक शक्तियों पर नहीं, परमेश्वर की सच्ची_ASSIST_DEEP_ कृपा पर टिके रहने से खत्म होता है।”
नोट: ऊपर दिए गए उद्धरण सार्वजनिक-डोमेन टिप्पणीकारों के सामान्य सार के स्वरूप हैं; पूर्ण वाक्य प्रासंगिक उद्धरणों को संदर्भ के अनुसार देखें।
निष्कर्ष: यह वचन हमें बताता है कि आध्यात्मिक सुरक्षा और वास्तविक बड़प्पन परमेश्वर के साथ जीवन जीने में है—घमण्ड से नहीं, बल्कि उसकी कृपा और सही मूल्यांकन से।