Old Testament
उत्पत्ति निर्गमन लैव्यव्यवस्था गिनती व्यवस्थाविवरण यहोशू न्यायियों रूत 1 शमूएल 2 शमूएल 1 राजाओं 2 राजाओं 1 इतिहास 2 इतिहास एज्रा नहेम्याह एस्तेर अय्यूब भजन संहिता नीतिवचन सभोपदेशक श्रेष्ठगीत यशायाह यिर्मयाह विलापगीत यहेजकेल दानिय्येल होशे योएल आमोस ओबद्याह योना मीका नहूम हबक्कूक सपन्याह हाग्गै जकर्याह मलाकीVerse
यहोशू 24:1 यहोशू 24:2 यहोशू 24:3 यहोशू 24:4 यहोशू 24:5 यहोशू 24:6 यहोशू 24:7 यहोशू 24:8 यहोशू 24:9 यहोशू 24:10 यहोशू 24:11 यहोशू 24:12 यहोशू 24:13 यहोशू 24:14 यहोशू 24:15 यहोशू 24:16 यहोशू 24:17 यहोशू 24:18 यहोशू 24:19 यहोशू 24:20 यहोशू 24:21 यहोशू 24:22 यहोशू 24:23 यहोशू 24:24 यहोशू 24:25 यहोशू 24:26 यहोशू 24:27 यहोशू 24:28 यहोशू 24:29 यहोशू 24:30 यहोशू 24:31 यहोशू 24:32 यहोशू 24:33



यहोशू 24:2 का सन्निकर्ष: प्राचीन आरम्भ और परमेश्वर की स्मृति
यह सूचना सेटिंग में है जब येहोशू परमेश्वर के वचन संग परिवारों और समुदाय के समक्ष उच्च-नीति करते हैं; यहोशू 24:2 में ऐतिहासिक संदर्भ दिया गया है कि पूर्वजों के समय लोग अन्य देवताओं की उपासना करते थे और अब्राहम और नाहोर के पिता तेरह आदि इस्राइल के पुरखों के पास रहते थे।
क्या बताता है यह पाठ परमेश्वर या विश्वास के बारे में
यह वाक्य यह दर्शाता है कि ईश्वर का इतिहास एक सतत स्मृति-कार्य है। पुराने समय में भी परमेश्वर ही जीवित सत्ता हैं, और पुराने पुरखों की आरम्भिक अवस्था में वह एक एकात्मक परमेश्वर थे जिनकी उपासना बाद में इस्राएली समुदाय में सत्य के रूप में स्थापित होनी चाहिए थी। यह उद्धार-यात्रा का आरम्भिक स्मरण कराता है कि परमेश्वर ने अपने-चुने हुए लोगों के जीवन-चरित्र को निरन्तर पुनर्जीवित किया है ताकि वे अन्य देवताओं के प्रति अपनी निष्ठा छोड़ दें।
महत्वपूर्ण शब्दों का स्पष्ट अर्थ
Related passages और उनके संक्षिप्त अर्थ
• पूर्वजों के समय के देव-उपासना की स्मृति—बचपन के विश्वास के निर्माण के लिए प्रेरक तथ्य।
• परमेश्वर द्वारा पुकारे जाने की एकता—कई बार यहोवा ही एकमात्र परमेश्वर के रूप में प्रस्तुत होते हैं।
• पथ-परिवर्तन का आह्वान—आघात के बाद भी भरोसा और निष्ठा में परिवर्तन संभव है, क्योंकि परमेश्वर अपने लोगों के साथ रहते हैं।
प्रयुक्त आधुनिक अनुप्रयोग
आज के समय में यह पाठ हमें याद दिलाता है कि हमारे पूर्व-परिवारों के मान्य विचारों और व्यवहार के बावजूद परमेश्वर का बुलावा नवीन और स्मरणीय है। हम अपने विश्वास-यात्रा में दो प्रमुख धारणाओं पर टिके रहें:
गंभीर cross-connections (संक्षेप)
• उत्पत्ति 12–13: वायदा-यात्रा और आश्रय के लिए एक ईश्वर के प्रति आस्था का आरम्भ। छोटे-मोटे दौर में भी यह एकता बनी रहती है।
• देव-उपासना से एकत्व की ओर संक्रमण: यह संकेत देता है कि विश्वास में परिवर्तन संभव है जब परमेश्वर स्वयं स्मरण कराया जाए।
• यहोशू 24:14–15: व्यक्तिगत और सामुदायिक निर्णयों में एकईश्वर की प्रतिज्ञा के साथ कटिबद्धता।
नोट: इस पंक्ति में Matthew Henry, Albert Barnes और Adam Clarke जैसे प्रचलित सार्वजनिक-डायमरियों की संक्षिप्त टिप्पणी से प्रेरणा मिलती है; परन्तु यहाँ शब्द-चयन नया लिखा गया है ताकि हिन्दी पाठक आसानी से समझ सकें। अगर आप चाहें तो मैं उनके छोटे-छोटे उद्धरण भी सुरक्षित रूप से डाल दूँ (केवल अगर उपलब्ध हों)। अभी के पाठ में किसी स्पष्ट उद्धरण का उद्धृत हिस्सा नहीं जोड़ा गया है।