Old Testament
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मत्ती 13:13 का पाठ और उसका अर्थ
पद में यीशु यह बतला रहे हैं कि वे दृष्टान्तों के माध्यम से क्यों बोलते हैं: “मैं उनसे दृष्टान्तों में इसलिए बातें करता हूँ, कि वे देखते हुए नहीं देखते; और सुनते हुए नहीं सुनते; और नहीं समझते।” यह संदेश उनके श्रोताओं के आध्यात्मिक अवरोधों से जुड़ा है और यह दिखाता है कि प्रभु की शिक्षाओं का कुछ भाग उन लोगों के लिए नहीं खोला जाएगा जो ईश्वर के काम को स्थिर अवलोकन से नहीं देखते।
पदार्थ की ईमानदार व्याख्या
यहाँ तीन प्रमुख बातों पर ध्यान है: दृष्टान्त के माध्यम से सीखना, और लोगों का आंतरिक अवरोध। यीशु यह स्पष्ट करते हैं कि उनका उद्देश्य हर किसी को खोल कर बताना नहीं है, बल्कि उन लोगों के लिए जो ईश्वर के सत्य को स्वीकार करते हैं उनके लिए ही इसका प्रकाशन होता है। यह बताता है कि परमेश्वर के राज्य का ज्ञान कभी-कभी उन लोगों तक नहीं पहुँच पाता जो नज़र से देखते हैं पर आंतरिक रूप से जानते नहीं हैं, या कान से सुनते हैं पर हृदय से ग्रहण नहीं करते।
शब्दों और छवियों की स्पष्टता
— दृष्टान्त: कथा-चित्र जो परमेश्वर के सत्य को एक सरल कहानी में प्रस्तुत करके भीतर के प्रकाश को जगाती या बाधित करती है।
— देखते हुए नहीं देखते / सुनते हुए नहीं सुनते: external सुनवाई-आक्रामकता नहीं बल्कि आंतरिक ग्रहण की कमी का संकेत। यह एक चेतावनी है कि आध्यात्मिक दृष्टी और संवेदना ईश्वर पर निर्भर है।
अन्य बाइबिल संदर्भ
• यशायाह 6:9–10: ईश्वरीय सन्देश के प्रति ढीलापन, जिससे लोग कानों से सुनते और आँखों से देखते हैं पर हृदय से नहीं मानते।
• मत्ती 11:25–26: पिता परमेश्वर के द्वारा ज्ञान का प्रकाश उन बच्चों को मिलना—जो छोटे हैं, उनके लिए यह खुलता है; बुद्धिमान और ज्ञानी के लिए नहीं।
• लूका 8:10: यीशु ने शिष्यों से कहा कि उनकी व्यक्तिगत समझ के लिए यह संकेत है कि परमेश्वर का राज उन तक पहुँचता है जो उसे अनुमति देते हैं।
पवित्रशास्त्री विचार
— चार प्रसिद्ध मुक्ति-टीकाकारों के संक्षिप्त विचार
Matthew Henry (संशोधन): वे यह दिखाते हैं कि दृष्टान्तों में कहना एक प्रकार का न्याय और दया है—जो प्रभु जानबूझकर करते हैं ताकि जो उत्तर नहीं पाते, वे भी न्याय के कारण परिणाम भुगतें।
Albert Barnes: दृष्टान्तों के पीछे का उद्देश्य यह है कि सत्य उन तक पहुँचे जिनमें@end-जीवन के लिए इच्छा हो; जो न चाहें, उनके लिए clarification कठिन रहता है।
Adam Clarke: यह कर्म-आधीश से है कि परमेश्वर का राज उनके लिए छुपा रहता है जो उसे योग्य नहीं मानते; पर जो दयालु होकर प्रयत्न करते हैं, वे समझ पाते हैं।
संक्षिप्त निष्कर्ष: आज के लिए लागू
1) प्रभु के शब्दों के प्रति अपने हृदय की openness जाँचें: क्या आप सच में ईश्वर के प्रकाश को स्वीकारने का जोखिम उठा रहे हैं?
2) अध्ययन में मात्र शब्दावलि की स्मरणशक्ति नहीं, बल्कि दिल की ग्रहणशीलता चाहिए।
3)_cross-reference: यशायाह 42:19–20; मत्ती 13:10–11; लूका 24:45 — ये संदिग्ध नहीं, बल्कि पुष्टि करते हैं कि ईश्वर जो बोलते हैं वही वही समझ में आता है जब हम धार्मिक-चेतना खोलते हैं।