Old Testament
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मत्ती 13:1 मत्ती 13:2 मत्ती 13:3 मत्ती 13:4 मत्ती 13:5 मत्ती 13:6 मत्ती 13:7 मत्ती 13:8 मत्ती 13:9 मत्ती 13:10 मत्ती 13:11 मत्ती 13:12 मत्ती 13:13 मत्ती 13:14 मत्ती 13:15 मत्ती 13:16 मत्ती 13:17 मत्ती 13:18 मत्ती 13:19 मत्ती 13:20 मत्ती 13:21 मत्ती 13:22 मत्ती 13:23 मत्ती 13:24 मत्ती 13:25 मत्ती 13:26 मत्ती 13:27 मत्ती 13:28 मत्ती 13:29 मत्ती 13:30 मत्ती 13:31 मत्ती 13:32 मत्ती 13:33 मत्ती 13:34 मत्ती 13:35 मत्ती 13:36 मत्ती 13:37 मत्ती 13:38 मत्ती 13:39 मत्ती 13:40 मत्ती 13:41 मत्ती 13:42 मत्ती 13:43 मत्ती 13:44 मत्ती 13:45 मत्ती 13:46 मत्ती 13:47 मत्ती 13:48 मत्ती 13:49 मत्ती 13:50 मत्ती 13:51 मत्ती 13:52 मत्ती 13:53 मत्ती 13:54 मत्ती 13:55 मत्ती 13:56 मत्ती 13:57 मत्ती 13:58



वचन का सार और पाठ का संदर्भ
मत्ती 13:28 में यीशु ने दुष्ट लोगों के साथ होने वाले दुष्कर्म के बारे में खुलकर बातें कीं। खेत में बोया गया अच्छी तरह से उगता हुआ गेहूं है, और शत्रु द्वारा बिखरे गए दानों के पीछे धार्मिक-धर्मनिष्ठ भाषा भी छिपी हो सकती है। इस पद में दासों ने मालिक से पूछा कि क्या वे आक्रमणकारी को रोकने हेतु काम कर सकते हैं। मालिक ने स्पष्ट उत्तर दिया: यह शत्रु का काम है।
पाठ का अध्याय-परिदृश्य
मत्ती 13 अध्याय में येसु यीशु खेत में उगते गेहूं और खेत के जहर-नष्ट आदि रूपकों के साथ अनेक दृष्टांत सुनाते हैं। यह दैवी राज्य की प्रकृति, उसकी पहचान और उसकी प्रतीकात्मक गति को दिखाता है। इस वाक्य में दासों के प्रश्न से स्पष्ट होता है कि संसार में ईमानदार और दुष्ट दोनों एक साथ रहते हैं; द्वंद्व बनता है कि कैसे संत लोग संसार के भीतर रहते हुए नुकसान से बचें, और कब कठिन निर्णय लेने हों।
मुख्य आध्यात्मिक पाठ
इस verse का प्रमुख संदेश यह है कि जब बुराई क्रमबद्ध तरीके से फैलती है, तो इसे रोके जाने की जिम्मेदारी हमारे ऊपर नहीं केवल बाहरी उपायों पर है, बल्कि परिणामस्वरूप परमेश्वर की योजना और समय का पालन भी आवश्यक है। मालिक का उत्तर यह निर्देश देता है कि जब सिक्के संगीन हों, तब भी नियंत्रण के साथ धर्म-न्याय को बनाए रखना चाहिए—समय आने पर ही निर्णय करना उचित है। इसका आशय यह है कि परमेश्वर के राज्य में हमेशा विश्वसनीय धारणा और धैर्य आवश्यक है, ताकि अत्याचार का अंत ठीक-ठीक ढंग से हो सके।
विधर्मी तुलना और सहारा
यहाँ अन्य प्रेषित आशीर्वादों और उपदेशों से प्रेरणा मिलती है। उदाहरण स्वरूप महात्मा यीशु के दूसरे दृष्टांतों में खेत, बीज और दुष्टों के साथ सह-अस्तित्व की वास्तविकता पर बल दिया गया है। पवित्र शास्त्र के अन्य अनुभाग—खेतों में गेहूँ और जहर आदि—यह दिखाते हैं कि संसार और परमेश्वर का राज्य एक साथ रहते हैं, परन्तु अंत में परमेश्वर के न्याय से दोनों का विभाजन होता है। नीचे तीन क्रॉस-रेफरेंसेज हैं जिन्हें समझने में मदद मिलती हैंः - मत्ती 13:24-30: गेहूं-खेत में ईमानदार और दुष्ट दोनों एक साथ रहते हैं। - मत्ती 13:36-43: परसों के दिग्दर्शन में बोध होता है कि अंत में परमेश्वर का राज्य पृथक और स्थापित होगा। - मरकुस 4:26-29: परमेश्वर के राज्य की वृद्धि अपनी गति से होती है, पर परिणाम समय के अनुसार होता है।
व्यावहारिक अनुप्रयोग
सार और निष्कर्ष
यह पद हमें याद दिलाता है कि संसार और परमेश्वर के राज्य के बीच की वास्तविकता कभी-कभी एक साथ चलती है। दासों के द्वारा किए गए प्रश्न से यह स्पष्ट होता है कि दबाव और दखलअंदाजी से नहीं, बल्कि परमेश्वर की योजना के अनुसार समय पर निर्णय लेने से वास्तविक न्याय और सुरक्षा मिलती है। इस दृष्टि से हम अपने जीवन को ईमानदारी, धैर्य, और परमेश्वर के सामर्थ्य पर भरोसे के साथ आगे बढ़ाते हैं।
प्रत्यक्ष उद्धरण (एलबर्ट बर्न्स, मैथ्यू हेनरी, एडम क्लार्क से)
यदि उपलब्ध हो, नीचे उनके सम्मत विचारों से संक्षेप उद्धरण दिए जा सकते हैं:
“यह किसी शत्रु का काम है”— मालिक का यह कथन स्पष्ट करता है कि बुराई की वास्तविकता बाहरी कार्रवाई के रूप में है, न कि आंतरिक कमजोरी के कारण।
इन टिप्पणीकारों के विचार पाठ के अर्थ को गहराई से समझाते हैं, परन्तु मूल पाठ के अनुरूप ही प्रस्तुत हैं।