मत्ती 13:15 बाइबल पद का अर्थ और पद-दर-पद टीका

क्योंकि इन लोगों के मन सुस्त हो गए है, और वे कानों से ऊँचा सुनते हैं और उन्होंने अपनी आँखें मूंद लीं हैं; कहीं ऐसा न हो कि वे आँखों से देखें, और कानों से सुनें और मन से समझें, और फिर जाएँ, और मैं उन्हें चंगा करूँ।’

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मत्ती 13:15 पद-दर-पद बाइबल टीका

मत्थि 13:15 पर आधारित संस्तृत व्याख्या

सीधे शब्दों में अर्थ: इस आयत में यीशु कहे हैं कि लोगों के मन सुस्त हो गए हैं; उनके कान ऊँचे सुनते हैं, आँखें मूँद ली हैं, ताकि वे न तो देख सकें न समझ सकें। इसलिए वे चंगा नहीं होंगे।

प्रसंग का परिचय

यह विचित्र-चिह्न वाला पाठ मत्ती के अध्याय 13 में दर्ज किया गया है, जहाँ यीशु पास्टरों के साथ लोकसमुदाय के बीच दफ्तरित उपदेश देंते हैं; वह तीन प्रकार की प्रतिक्रिया दर्शाते हैं—जो सुनते हैं, जो देखते हैं, और जो समझते हैं। यहाँ विशेष संकेत है कि कट्टर विरोध के समय, जनसमुदाय के कुछ सदस्य वास्तविक आत्म-खोज से पीछे हटते हैं, ताकि उनके हृदय में होने वाला परिवर्तन न हो सके।

व्याख्यात्मक अवलोकन

  • कान ऊँचे सुनना:众 लोग आवश्यक संदेश को केवल बहस-संबंधी या दिखावे के रूप में लेते हैं; वे यह नहीं मानते कि परमेश्वर का संदेशन उनके जीवन के ढांचे को चुनौती देता है।
  • आँखें मूँद लेना: दृष्टि और विवेक का अवरोध, ताकि धार्मिक पाठ से प्रेरणा न मिले। यह आत्म-स्वार्थ और नियंत्रण की प्रवृत्ति दर्शाता है।
  • मन का संकल्पना से समझना: इच्छित परिणाम यह है कि लोग वास्तव में भिन्न मार्ग अपनाने के लिए तैयार हों, परन्तु उनके भीतर के निर्णय की स्थिरता नहीं है।
  • चंगा न होना: वास्तव में यह बीमारी आत्मिक अवांछितता या कदाचार के कारण नहीं, बल्कि प्रतिकार-स्वरूप की अविचारशीलता के कारण है।

संकेतित थीम

  1. मानसिक बनावट बनाम आत्मिक परिवर्तन
  2. ईश्वरीय प्रकाश को स्वीकृति बनाम अस्वीकार
  3. न्याय और दया की दृष्टि से सुनना और देखना

अन्य सन्दर्भ (संक्षेप)

य symposium के अन्य संदर्भ जो परिपाटी में समान विचार देते हैं:

  • यूहन्ना 9:39—धार्मिक नेताओं के भीतर अंधकार बनाम दिव्यता की रोशनी का संघर्ष; यहाँ स्पष्ट किया गया है कि सच समझना और निष्कर्ष निकालना एक प्रयत्न है, जिसे लोग स्वयं रोक लेते हैं।
  • मरकूस 4:12—परमेश्वर के वचन के अस्पष्ट होने के बारे में; कुछ लोग इसे “कथा” की तरह लेते हैं, परन्तु यह उनके आत्मिक पथ को रोके रहता है।
  • यशायाह 6:9-10—एक प्राचीन समानता जो यह बताती है कि रीति-रिवाजों से अधिक हृदय की स्थितियाँ मायने रखती हैं; परमेश्वर को केवल बाहरी आडंबर नहीं भाता।

मिश्रित उद्धरण (जहाँ प्रचलित प्रमुख टिप्पणीकारों के सारांश दिखते हैं)

यहां नीचे Matthew Henry, Albert Barnes और Adam Clarke के संक्षिप्त, संदर्भानुकूल निष्कर्ष संदर्भित हैं—सभी सामान्य प्रकाशन-उद्धरणों के अनुरूप:

Matthew Henry का सार: \"यह शब्द कड़वी निराशा नहीं, बल्कि मनुष्य की उपेक्षा की नकल है—जब हृदय पूर्वाग्रह से भर गया हो, तब प्रभु की आवाज़ भी अप्रभावी हो जाती है।\"

Albert Barnes का सार: \"मन के कठोर होने से न केवल ज्ञान से दूरी होती है, बल्कि आशीर्वादों की अनुभूति भी घटती है; यह एक चेतावनी है कि विश्वास के लिए संवेदनशीलता बनाये रखना आवश्यक है।\"

Adam Clarke का सार: \"यह आयत आत्मिक अँधेरा और नाकामी की स्थिति का वर्णन है, जहाँ लोग बिना कभी सचेत हुए भी दूर रहते हैं; पर परमेश्वर की कृपा हेतु शांत और विनम्र हृदय चाहिए।\"

कुंजी क्रॉस-रेफरेंसे

1) यशायाह 6:9-10 — पवित्र संदेशन की अस्पष्टता का कारण; दिल को खोलना जरूरी है।

2) मत्ती 11:25-26 — प्रभु ईश्वरीय ज्योति को उजागर करते हैं, जो दृश्यमान या मानवीय समझ से ऊपर है।

3) मेहात्र 3:7-9 — धार्मिक नेतृत्व और जनसमुदाय के बीच स्पष्टता का महत्व, जहाँ हृदय में humility आवश्यक है।

संक्षिप्त निष्कर्ष

यहां, यीशु एक चेतावनी देते हैं कि बाहरी धार्मिकता से नहीं, बल्कि आत्मिक दिशा-निर्देशन से परिवर्तन संभव है। प्रकटन को सुनना-देखना और मन से समझना, प्रत्यक्ष धैर्य और विनम्रता से संभव होता है। जिनके हृदय में संकल्प है कि वे सत्य को अपनाते हैं, वे उपचार पाते हैं; अन्यथा, परमेश्वर का चंगा करना भी उनके लिए असमान रहता है।

*** इस टीका में सार्वजनिक डोमेन में उपलब्ध कुछ प्राचीन और क्लासिक स्रोतों की सामग्री शामिल है। कुछ सामग्री को कृत्रिम बुद्धिमत्ता उपकरणों की सहायता से संसाधित, संक्षिप्त या अनुवादित किया गया हो सकता है। हर व्याख्या को बाइबल के पूरे पाठ और उसके संदर्भ के साथ अवश्य जाँचें। यदि आपको कोई त्रुटि या ऐसा अनुवाद मिले जिसे सुधारने की आवश्यकता हो, तो कृपया हमसे संपर्क करें।

मत्ती 13:15 समानांतर पद और संबंधित वचन

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तू इन लोगों के मन को मोटे* और उनके कानों को भारी कर, और उनकी आँखों को बन्द कर; ऐसा न हो कि वे आँखों से देखें, और कानों से सुनें, और मन से बूझें, और मन फिराएँ और चंगे हो जाएँ।” (मत्ती 13:15, यूह. 12:40, प्रेरि. 28:26,27, रोम. 11:8)

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मरकुस 4:12 (HINIRV) »
इसलिए कि “वे देखते हुए देखें और उन्हें दिखाई न पड़े और सुनते हुए सुनें भी और न समझें; ऐसा न हो कि वे फिरें, और क्षमा किए जाएँ।” (यशा. 6:9-10, यिर्म. 5:21)

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जकर्याह 7:11 (HINIRV) »
परन्तु उन्होंने चित्त लगाना न चाहा, और हठ किया, और अपने कानों को बन्द कर लिया ताकि सुन न सके।

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