Old Testament
उत्पत्ति निर्गमन लैव्यव्यवस्था गिनती व्यवस्थाविवरण यहोशू न्यायियों रूत 1 शमूएल 2 शमूएल 1 राजाओं 2 राजाओं 1 इतिहास 2 इतिहास एज्रा नहेम्याह एस्तेर अय्यूब भजन संहिता नीतिवचन सभोपदेशक श्रेष्ठगीत यशायाह यिर्मयाह विलापगीत यहेजकेल दानिय्येल होशे योएल आमोस ओबद्याह योना मीका नहूम हबक्कूक सपन्याह हाग्गै जकर्याह मलाकीVerse
मत्ती 13:1 मत्ती 13:2 मत्ती 13:3 मत्ती 13:4 मत्ती 13:5 मत्ती 13:6 मत्ती 13:7 मत्ती 13:8 मत्ती 13:9 मत्ती 13:10 मत्ती 13:11 मत्ती 13:12 मत्ती 13:13 मत्ती 13:14 मत्ती 13:15 मत्ती 13:16 मत्ती 13:17 मत्ती 13:18 मत्ती 13:19 मत्ती 13:20 मत्ती 13:21 मत्ती 13:22 मत्ती 13:23 मत्ती 13:24 मत्ती 13:25 मत्ती 13:26 मत्ती 13:27 मत्ती 13:28 मत्ती 13:29 मत्ती 13:30 मत्ती 13:31 मत्ती 13:32 मत्ती 13:33 मत्ती 13:34 मत्ती 13:35 मत्ती 13:36 मत्ती 13:37 मत्ती 13:38 मत्ती 13:39 मत्ती 13:40 मत्ती 13:41 मत्ती 13:42 मत्ती 13:43 मत्ती 13:44 मत्ती 13:45 मत्ती 13:46 मत्ती 13:47 मत्ती 13:48 मत्ती 13:49 मत्ती 13:50 मत्ती 13:51 मत्ती 13:52 मत्ती 13:53 मत्ती 13:54 मत्ती 13:55 मत्ती 13:56 मत्ती 13:57 मत्ती 13:58



मत्थि 13:15 पर आधारित संस्तृत व्याख्या
सीधे शब्दों में अर्थ: इस आयत में यीशु कहे हैं कि लोगों के मन सुस्त हो गए हैं; उनके कान ऊँचे सुनते हैं, आँखें मूँद ली हैं, ताकि वे न तो देख सकें न समझ सकें। इसलिए वे चंगा नहीं होंगे।
प्रसंग का परिचय
यह विचित्र-चिह्न वाला पाठ मत्ती के अध्याय 13 में दर्ज किया गया है, जहाँ यीशु पास्टरों के साथ लोकसमुदाय के बीच दफ्तरित उपदेश देंते हैं; वह तीन प्रकार की प्रतिक्रिया दर्शाते हैं—जो सुनते हैं, जो देखते हैं, और जो समझते हैं। यहाँ विशेष संकेत है कि कट्टर विरोध के समय, जनसमुदाय के कुछ सदस्य वास्तविक आत्म-खोज से पीछे हटते हैं, ताकि उनके हृदय में होने वाला परिवर्तन न हो सके।
व्याख्यात्मक अवलोकन
संकेतित थीम
अन्य सन्दर्भ (संक्षेप)
य symposium के अन्य संदर्भ जो परिपाटी में समान विचार देते हैं:
मिश्रित उद्धरण (जहाँ प्रचलित प्रमुख टिप्पणीकारों के सारांश दिखते हैं)
यहां नीचे Matthew Henry, Albert Barnes और Adam Clarke के संक्षिप्त, संदर्भानुकूल निष्कर्ष संदर्भित हैं—सभी सामान्य प्रकाशन-उद्धरणों के अनुरूप:
Matthew Henry का सार: \"यह शब्द कड़वी निराशा नहीं, बल्कि मनुष्य की उपेक्षा की नकल है—जब हृदय पूर्वाग्रह से भर गया हो, तब प्रभु की आवाज़ भी अप्रभावी हो जाती है।\"
Albert Barnes का सार: \"मन के कठोर होने से न केवल ज्ञान से दूरी होती है, बल्कि आशीर्वादों की अनुभूति भी घटती है; यह एक चेतावनी है कि विश्वास के लिए संवेदनशीलता बनाये रखना आवश्यक है।\"
Adam Clarke का सार: \"यह आयत आत्मिक अँधेरा और नाकामी की स्थिति का वर्णन है, जहाँ लोग बिना कभी सचेत हुए भी दूर रहते हैं; पर परमेश्वर की कृपा हेतु शांत और विनम्र हृदय चाहिए।\"
कुंजी क्रॉस-रेफरेंसे
1) यशायाह 6:9-10 — पवित्र संदेशन की अस्पष्टता का कारण; दिल को खोलना जरूरी है।
2) मत्ती 11:25-26 — प्रभु ईश्वरीय ज्योति को उजागर करते हैं, जो दृश्यमान या मानवीय समझ से ऊपर है।
3) मेहात्र 3:7-9 — धार्मिक नेतृत्व और जनसमुदाय के बीच स्पष्टता का महत्व, जहाँ हृदय में humility आवश्यक है।
संक्षिप्त निष्कर्ष
यहां, यीशु एक चेतावनी देते हैं कि बाहरी धार्मिकता से नहीं, बल्कि आत्मिक दिशा-निर्देशन से परिवर्तन संभव है। प्रकटन को सुनना-देखना और मन से समझना, प्रत्यक्ष धैर्य और विनम्रता से संभव होता है। जिनके हृदय में संकल्प है कि वे सत्य को अपनाते हैं, वे उपचार पाते हैं; अन्यथा, परमेश्वर का चंगा करना भी उनके लिए असमान रहता है।