Old Testament
उत्पत्ति निर्गमन लैव्यव्यवस्था गिनती व्यवस्थाविवरण यहोशू न्यायियों रूत 1 शमूएल 2 शमूएल 1 राजाओं 2 राजाओं 1 इतिहास 2 इतिहास एज्रा नहेम्याह एस्तेर अय्यूब भजन संहिता नीतिवचन सभोपदेशक श्रेष्ठगीत यशायाह यिर्मयाह विलापगीत यहेजकेल दानिय्येल होशे योएल आमोस ओबद्याह योना मीका नहूम हबक्कूक सपन्याह हाग्गै जकर्याह मलाकीVerse
मत्ती 14:1 मत्ती 14:2 मत्ती 14:3 मत्ती 14:4 मत्ती 14:5 मत्ती 14:6 मत्ती 14:7 मत्ती 14:8 मत्ती 14:9 मत्ती 14:10 मत्ती 14:11 मत्ती 14:12 मत्ती 14:13 मत्ती 14:14 मत्ती 14:15 मत्ती 14:16 मत्ती 14:17 मत्ती 14:18 मत्ती 14:19 मत्ती 14:20 मत्ती 14:21 मत्ती 14:22 मत्ती 14:23 मत्ती 14:24 मत्ती 14:25 मत्ती 14:26 मत्ती 14:27 मत्ती 14:28 मत्ती 14:29 मत्ती 14:30 मत्ती 14:31 मत्ती 14:32 मत्ती 14:33 मत्ती 14:34 मत्ती 14:35 मत्ती 14:36



मत्ती 14:7 का अर्थ स्पष्ट है
इस गीतनुमा वचन में Herodias की बेटी ने अपनी माँ के प्रेरणा से पूछे जाने पर याकूब-निष्ठा के अनुसार पिता हेरोद की इच्छाओं के अनुरूप शपथ के साथ कहा, “जो कुछ तू माँगेगी, मैं तुझे दूँगा।” यहाँ शपथ का उद्देश्य उसकी जागरूकता और निर्णय की स्पष्टता दिखाना है—लंबी योजना, तत्काल लाभ, और दोनो में से कौन-सा भीतर से कहाँ तक प्रेरित है, यह संकेत मिलता है।
प्रस्तावित पृष्ठभूमि
व्यवस्था के दौर में यह घटना तब घटती है जब यीशु ने अपने चेलों के बीच लोकसभा के बाद भोजन की व्यवस्था दी। राज-परिवार और धार्मिक नेता पंथ के साथ आकर्षक घटनाओं में व्यस्त होते हैं। यह शपथ-ग्रहण उस समय के सामंती और पारिवारिक दबाव को भी दर्शाती है जिसमें व्यक्तियों के निर्णय असल में सामाजिक दबाव से प्रेरित होते हैं।
व्याख्या के प्रमुख बिंदु
सूक्ष्म अनुवाद-देवदार्शन (मुख्य विचार)
यह वचन दिखाता है कि जब किसी को शपथ दिलवाई जाती है, वह सामान्यतः मानवीय इच्छाओं के अनुरूप निर्णय और कार्य करता है। परन्तु सच्ची बुद्धिमता वह है जो परम पिता के सम्मान और समाज के कल्याण के साथ संगत हो।
Cross-references और संक्षिप्त स्पष्टीकरण
1) मत्ती 5:33-37— शपथ के बारे में यीशु का निषेध: ईमानदारी में बेसलाइन है, परंतु शब्दों से अधिक सत्यापन पर जोर।
2) मत्ती 6:33— पहली चीज़ परमेश्वर के राज्य की खोज, तब अन्य चीजें मिलती हैं; इच्छा-शक्ति यदि परमेश्वर-प्रिय न हो तो नतीजे खराब हो सकते हैं।
3) योहन्ना 6:27— आध्यात्मिक आहार और जीवन के लिए प्रभु की आज्ञाओं के पीछे चलना, न कि भोग के लिए शपथ लेना।
निष्कर्षित व्यावहारिक पाठ
हम जो भी वचन दें या शपथ लें, उसे जीवन के वास्तविक लाभ के लिए नहीं, बल्कि परमेश्वर के मार्ग और दूसरों की भलाई के लिए निभाने की कोशिश करें। सांसारिक लाभ के लिए ली गई शपथ अंततः समाज के विश्वास और हमारी विश्वसनीयता पर प्रश्नचिह्न छोड़ देती है।
कथन-सार: शपथ एक ताकत है, पर सही दिशा के साथ उसे चलाना जीवन-परिवार, समाज और परमात्मा के अनुरूप होता है।
उद्धृत संकलन: संदेश के साथ Matthew Henry, Albert Barnes और Adam Clarke के स्पष्ट उद्धरणों के लिए नोट: “ना तो पूर्ण वचन देता हूँ, ना ही पूर्ण मानता हूँ”—यह शब्द-चिह्न वस्तुतः इन पंक्तियों के भाव के अनुरूप है।