Old Testament
उत्पत्ति निर्गमन लैव्यव्यवस्था गिनती व्यवस्थाविवरण यहोशू न्यायियों रूत 1 शमूएल 2 शमूएल 1 राजाओं 2 राजाओं 1 इतिहास 2 इतिहास एज्रा नहेम्याह एस्तेर अय्यूब भजन संहिता नीतिवचन सभोपदेशक श्रेष्ठगीत यशायाह यिर्मयाह विलापगीत यहेजकेल दानिय्येल होशे योएल आमोस ओबद्याह योना मीका नहूम हबक्कूक सपन्याह हाग्गै जकर्याह मलाकीVerse
मत्ती 20:1 मत्ती 20:2 मत्ती 20:3 मत्ती 20:4 मत्ती 20:5 मत्ती 20:6 मत्ती 20:7 मत्ती 20:8 मत्ती 20:9 मत्ती 20:10 मत्ती 20:11 मत्ती 20:12 मत्ती 20:13 मत्ती 20:14 मत्ती 20:15 मत्ती 20:16 मत्ती 20:17 मत्ती 20:18 मत्ती 20:19 मत्ती 20:20 मत्ती 20:21 मत्ती 20:22 मत्ती 20:23 मत्ती 20:24 मत्ती 20:25 मत्ती 20:26 मत्ती 20:27 मत्ती 20:28 मत्ती 20:29 मत्ती 20:30 मत्ती 20:31 मत्ती 20:32 मत्ती 20:33 मत्ती 20:34



मत्ती 20:21 के संदर्भ में व्याख्या
यह verse येसु के अन्यायी दास-प्रणाली के सामने एक आदर्श घटना को दर्शाता है। पिता-सम्राज्य की माँग के साथ दो पुत्रों के लिए उनके मां-बाप के दायित्व और सुरक्षित स्थान की चाहत न केवल उनके भीतर की 경쟁 को उजागर करती है, बल्कि उनमें मसीह के राज्य के सच्चे मूल्य—दयालुता, सेवा-भाव और आत्म-पूर्वक त्याग—केContrast भी दिखाती है। जब उनकी बहन ने माँ-प्रेरित आग्रह किया, तब वह इन सवालों को उठाती है कि राज्य के स्थान कैसे तय होते हैं और क्या प्रभु की दृष्टि में ममता और भक्तिराग को सर्वोच्च माना जाना चाहिए।
मुख्य अर्थ
यद्यपि यह बात एक व्यक्तिगत संवाद है, किन्तु यह उनके समकालीन महत्वाकांक्षाओं के साथ एक सीख पेश करती है: प्रभु के राज्य में पद-प्राप्ति के मापदंड क्या हैं? वह कहती है कि उनके पुत्र राजा के दाहिने और बाँये बैठें, पर यीशु बताता है कि यह व्यवस्था उनके चयन से नहीं, पर उनके बुलावे और परम पिता के उद्देश्य से होगी। यह दर्शाता है कि परमेश्वर के राज्य में greatness का मूल पवित्रता, सेवा और आत्म-त्याग है, न कि अधिकार या प्रशंसा।
मुख्य विषय
संयुक्त संदर्भ
1) मरकुस 10:37–40—यीशु स्पष्ट करते हैं कि विभाग और पदों की माँग क्यों गलत हो सकती है, और क्या दायित्व निभाने का वास्तविक मतलब है।
2) लूका 22:26—याद दिलाता है कि जो बड़ा होना चाहता है, उसे छोटा बनना होगा और जो सेवक बनना चाहता है, उसे प्रभु का परमेश्वर बनना होगा।
3) मत्ती 23:11—येसु बताते हैं कि महान वही है जो पहले दूसरों की सेवा करता है।
व्यावहारिक समझ
आज के पाठ के अनुसार हमें आत्म-प्रसिद्धि की जगह सेवा-भाव अपनाना चाहिए। अपने आप से पूछें: क्या मैं अपने योगदान, नाते-रिश्तों और चर्च-कार्य में दूसरों की सेवा को प्राथमिकता दे रहा/रही हूँ? प्रभु के राज में उच्च=ministry और उच्च स्थिति उसी को मिलती है जो प्रेम और विनम्रता से आगे बढ़ता है।
संक्षिप्त निष्कर्ष
यह पंक्ति उन मानवीय आकांक्षाओं को सचेत करती है जो श्रेष्ठत्व की तलाश में हैं। मसीह के राज्य में असली महानता सेवा, त्याग और प्रेम में निहित है, न कि पद-स्थान में। भगवान के उद्देश्य के अनुसार जो रास्ते चुनते हैं, वे सचमुच उस राज्य के सहभागी बनते हैं जिसमें दाहिने और बाएँ स्थान भी परमात्मा के चयन पर निर्भर रहते हैं।
एक छोटा संदर्भ-चलन
उद्धरणों के लिए उद्धृत शाब्दिक अंश केवल उपरोक्त सार्वजनिक-डोमेन टिप्पणीकारों के प्रासंगिक हिस्सों से हैं।