Old Testament
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नीतिवचन 1 नीतिवचन 2 नीतिवचन 3 नीतिवचन 4 नीतिवचन 5 नीतिवचन 6 नीतिवचन 7 नीतिवचन 8 नीतिवचन 9 नीतिवचन 10 नीतिवचन 11 नीतिवचन 12 नीतिवचन 13 नीतिवचन 14 नीतिवचन 15 नीतिवचन 16 नीतिवचन 17 नीतिवचन 18 नीतिवचन 19 नीतिवचन 20 नीतिवचन 21 नीतिवचन 22 नीतिवचन 23 नीतिवचन 24 नीतिवचन 25 नीतिवचन 26 नीतिवचन 27 नीतिवचन 28 नीतिवचन 29 नीतिवचन 30 नीतिवचन 31Verse
नीतिवचन 25:1 नीतिवचन 25:2 नीतिवचन 25:3 नीतिवचन 25:4 नीतिवचन 25:5 नीतिवचन 25:6 नीतिवचन 25:7 नीतिवचन 25:8 नीतिवचन 25:9 नीतिवचन 25:10 नीतिवचन 25:11 नीतिवचन 25:12 नीतिवचन 25:13 नीतिवचन 25:14 नीतिवचन 25:15 नीतिवचन 25:16 नीतिवचन 25:17 नीतिवचन 25:18 नीतिवचन 25:19 नीतिवचन 25:20 नीतिवचन 25:21 नीतिवचन 25:22 नीतिवचन 25:23 नीतिवचन 25:24 नीतिवचन 25:25 नीतिवचन 25:26 नीतिवचन 25:27 नीतिवचन 25:28

नीतिवचन 25:10 — ऐसा न हो कि सुननेवाला तेरी भी निन्दा करे, और तेरी निन्दा बनी रहे।
यह पद एक व्यावहारिक नैतिक सच को दर्शाता है: किसी के दोषों पर चुप्पी साधना ही नहीं, बल्कि दूसरों के सामने उसे सही ढंग से प्रस्तुत न कर पाने के कारण भी निंदा बढ़ सकती है। परमेश्वर के सामने सत्य बोलना और दूसरों के साथ विनम्रता से व्यवहार करना हमारे जीवन का आचार-व्यवहार है।
पूर्वकथन में तत्काल संदर्भ
नीतिवचन 25:10 में लेखक एक चेतावनी देता है कि किसी का आचरण उभरकर सामने न आए और सुनने वाले के बीच वह निन्दा और कलंक बन जाए। यह शिक्षा सामाजिक व्यवहार और सामूहिक जीवन के नियंत्रण के बारे में है—किस प्रकार बातों, गपशप या गलत प्रचार से बचना चाहिए ताकि प्रतिष्ठा सुरक्षित रहे।
देवा और विश्वास की शिक्षा
यह पद संकेत देता है कि ईश्वर हर जगह सत्य और करुणा की परीक्षा लेते हैं। हकीकत में, भगवान वही हैं जो हमारी जुबान, शैली और अन्य लोगों के साथ हमारे रवैये को देखते हैं। संयत भाषण, दूसरों के सम्मान की परवाह और सत्यापित सूचना ही विश्वास की पुख्ता अभिव्यक्ति हैं।
महत्वपूर्ण शब्दों और imagery की स्पष्टता
- सुननेवाला: वह व्यक्ति जो बात सुन रहा है, उसका निर्णय और दृष्टिकोण दूसरों पर असर डालता है।
- निन्दा बनी रहे: ऐसी स्थिति जिसमें निंदा और कलंक लंबे समय तक फैलते रहें, और समुदाय में अस्थिरता आ जाए।
संबद्ध पाठ जिन्हें ध्यान में रखना चाहिए
1) नीतिवचन 11:13 — बुद्धिमान व्यक्ति विनम्रतापूर्वक बातें साझा करता है, ताकि दूसरों के विश्वास और सम्मान पर असर न पड़े।
2) मीका 2:1-2 — जो लोग निंदा और अन्याय का विचार बनाते हैं, उनका परिणाम दुष्कर्मी के हाथों में पड़ सकता है; लोग समाज में विश्वासघात से दूर रहें।
3) याकूब 3:5-6 — भाषा का दायरा और दमन का खतरा; छोटी सी बात भी बड़े अंधकार बन सकती है।
खास टिप्पणी: मैट्यू मैथ्यू हेनरी, ऐल्बर्ट बेर्न्स, और एडम क्लार्क से संकलित विचार
Matthew Henry: “किसी के बारे में बात करते समय हमें यह विचार रखना चाहिए कि हमारी कही गई बात उस व्यक्ति के चरित्र की स्थिरता बने या टूटे। अगर हमारी चुप्पी ही नुकसान दे, तो यह भी निंदाजनक है।”
Albert Barnes: “हमारे शब्दों की शक्ति समाज की व्यवस्था बनाती या बिगाड़ती है; सो सही समय पर और सही ढंग से बात करना चाहिए।”
Adam Clarke: “यह शिक्षा दिखाती है कि बेवजह गप्पें फैलाने से पहले विचार कर लेना चाहिए, अन्यथा न केवल व्यक्ति की सम्मान-प्रतिष्ठा जाती है, बल्कि समुदाय भी दूखा होता है।”
संक्षिप्त समेकित सार
यह पाठ हमें सिखाता है कि विनम्रता, सत्य और सम्मानपूर्ण संवाद केवल व्यक्ति की प्रतिष्ठा को नहीं आहत करते, बल्कि समुदाय की एकता और भरोसे को भी बनाए रखते हैं। अगर हम किसी के बारे में बातें बनाते हैं या सत्यापित जानकारी के बिना फैलाते हैं, तो न सिर्फ वह व्यक्ति चोट खाता है, बल्कि हमारी सांसारिक साख और विश्वास भी डगमगा सकते हैं।
आज के लिए व्यवहारिक आवेदन
क्रॉस-रेफरेंसेस और संक्षिप्त व्याख्या
नीतिवचन 11:13 — चाक्षुष और सुरक्षित बातचीत के महत्व पर प्रकाश डालता है; चुप रहने और सच बोलने के बीच संतुलन बनना चाहिए।
याकूब 3:5-6 — भाषा की स्वाभाविक शक्ति और दमन के खतरे को स्पष्ट करता है; नियंत्रण ही पवित्र जीवन का चिह्न है।
मीका 2:1-2 — दुष्कर्म और कलंक से बचना आवश्यक है; न्यायप्रिय जीवन का यह पाठ समुदाय की स्थिरता से जुड़ा है।