Old Testament
उत्पत्ति निर्गमन लैव्यव्यवस्था गिनती व्यवस्थाविवरण यहोशू न्यायियों रूत 1 शमूएल 2 शमूएल 1 राजाओं 2 राजाओं 1 इतिहास 2 इतिहास एज्रा नहेम्याह एस्तेर अय्यूब भजन संहिता नीतिवचन सभोपदेशक श्रेष्ठगीत यशायाह यिर्मयाह विलापगीत यहेजकेल दानिय्येल होशे योएल आमोस ओबद्याह योना मीका नहूम हबक्कूक सपन्याह हाग्गै जकर्याह मलाकीChapter
नीतिवचन 1 नीतिवचन 2 नीतिवचन 3 नीतिवचन 4 नीतिवचन 5 नीतिवचन 6 नीतिवचन 7 नीतिवचन 8 नीतिवचन 9 नीतिवचन 10 नीतिवचन 11 नीतिवचन 12 नीतिवचन 13 नीतिवचन 14 नीतिवचन 15 नीतिवचन 16 नीतिवचन 17 नीतिवचन 18 नीतिवचन 19 नीतिवचन 20 नीतिवचन 21 नीतिवचन 22 नीतिवचन 23 नीतिवचन 24 नीतिवचन 25 नीतिवचन 26 नीतिवचन 27 नीतिवचन 28 नीतिवचन 29 नीतिवचन 30 नीतिवचन 31Verse
नीतिवचन 25:1 नीतिवचन 25:2 नीतिवचन 25:3 नीतिवचन 25:4 नीतिवचन 25:5 नीतिवचन 25:6 नीतिवचन 25:7 नीतिवचन 25:8 नीतिवचन 25:9 नीतिवचन 25:10 नीतिवचन 25:11 नीतिवचन 25:12 नीतिवचन 25:13 नीतिवचन 25:14 नीतिवचन 25:15 नीतिवचन 25:16 नीतिवचन 25:17 नीतिवचन 25:18 नीतिवचन 25:19 नीतिवचन 25:20 नीतिवचन 25:21 नीतिवचन 25:22 नीतिवचन 25:23 नीतिवचन 25:24 नीतिवचन 25:25 नीतिवचन 25:26 नीतिवचन 25:27 नीतिवचन 25:28



नीतिवचन 25:3 पर व्याख्या: स्वर्ग की ऊँचाई, पृथ्वी की गहराई और राजाओं का मन
यह वाक्य दर्शाता है कि परम पवित्र के अधीन, चमत्कारिक और गहराई से भरे रहस्य हमेशा मनुष्य की पहुँच से बाहर रहते हैं। उच्चताओं और गहराइयों के पीछे का ज्ञान, और राजाओं के विचारों के आंतरिक सूक्ष्म पक्ष, कुछ ऐसी चीजें हैं जिन्हें मनुष्य सरलता से नहीं समझ सकता। यह हमारे प्रमुख प्रश्नों को ठहराव देता है—हम कौन हैं, और परमेश्वर के महान क्रम में हमारा स्थान क्या है?
पौराणिक संदर्भ और मूल संदेश
नीतिवचन के इस भाग में लेखक अकसर ज्ञान, कर्तव्य और परमेश्वर के अधिकारी नियमों के बीच संतुलन दिखाते हैं। ऊपर का आकाश, नीचे की गहराई, और शासन-प्रभाव—इन तीनों की स्थितियाँ एक-दूसरे से जुड़ी रहती हैं। इसका सार यह है कि ज्ञान और समझ का वास्तविक स्रोत ऊपर वाले के हाथों में है, और मानवीय बुद्धि इन आकाश-धरती के रहस्यों को पूरी तरह नहीं खोल सकती।
प्रमुख संदेश
महत्वपूर्ण थीम्स और पाठ-संगत दृष्टिकोण
- परमेश्वर की सत्ता और ज्ञान की विशालता: आकाश और पृथ्वी की ओर इशारा करके स्पष्ट किया गया है कि परमेश्वर के विचार और योजनाएँ मनुष्यों के अनुमान से परे हैं।
- निरीह विवेक बनाम परमेश्वर का प्रकाश: मनुष्य अपने तरीके से सोच सकता है, परन्तु सच की पूरी परख केवल ईश्वर-स्रोत से मिलती है।
क्रॉस-रेफरेंस (संक्षिप्त सार और संगतता)
यहेज़केल 1:1— आकाश-देखने और vision के दृश्य में परमेश्वर की विलक्षण व्यवस्था का संकेत; यह verse इस बात की पुष्टि करता है कि परमेश्वर के उद्देश्य अनंत और गहराईन हैं।
尤शायाह 55:9— "मेरी राहें आपके रास्तों से ऊँची" कहकर उच्चता और सीमाओं के पार की योजना को प्रदर्शित करता है; यह बोध इस प्रचलित विचार के साथ संगत है कि परमेश्वर-विचार मानवीय विचारों से परे है।
रणमंच 3:19-20— राजा-प्रभाव और दिल की चालों के अभ्यास पर केंद्रित होते हुए, यह बताता है कि सत्ता और विवेक के बीच परमेश्वर का नियम सर्वोच्च है।
ग्रंथ-व्यावहारिक संकेत
- जीवन के बड़े प्रश्नों के समय नम्रता बनाए रखें: जो बातें हमारी पकड़ से बाहर हैं, उन्हें तर्क की कठोरता से नियंत्रित करना उचित नहीं।
- नैतिक निर्भीकता के साथ निर्णय लें: राजाओं जैसे सम्मान का उत्तरदायित्व अपने निर्णयों में स्पष्टता और ईमानदारी से निभायें।
स्वाध्याय के लिए एक साधारण मार्ग
कुटुम्बिक संपर्क और आत्म-चिंतन
इस वाक्य से प्रेरित होकर हम अपने जीवन में humility, संवेदना और सत्य-निष्पादन के प्रति प्रतिबद्धता को मजबूत करें। परमेश्वर के ज्ञान के सामने हमारा दायरा छोटा है, परन्तु हम अपने अवसरों और उत्तरदायित्वों को ईमानदारी से निभा सकते हैं।
एक संक्षिप्त संदर्भ-चर्चा: यह पाठ हमें यह सिखाता है कि हर बड़े रहस्य के पीछे परमेश्वर का उद्देश्य है—हम उस उद्देश्य को समझने के लिए विनम्रता और नैतिक निर्णय-स्वरूप आगे बढ़ें।