Old Testament
उत्पत्ति निर्गमन लैव्यव्यवस्था गिनती व्यवस्थाविवरण यहोशू न्यायियों रूत 1 शमूएल 2 शमूएल 1 राजाओं 2 राजाओं 1 इतिहास 2 इतिहास एज्रा नहेम्याह एस्तेर अय्यूब भजन संहिता नीतिवचन सभोपदेशक श्रेष्ठगीत यशायाह यिर्मयाह विलापगीत यहेजकेल दानिय्येल होशे योएल आमोस ओबद्याह योना मीका नहूम हबक्कूक सपन्याह हाग्गै जकर्याह मलाकीChapter
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नीति वचन 25:22 पर आधुनिक हिंदी टिप्पणी
मुख्य interpretive बिंदु: दुष्ट के विरोधी के प्रति क्रोध या बदला नहीं, बल्कि दया, चतुराई और धार्मिक प्रेरणा से उनका कल्याण करना वास्तविक परोपकार है। यह वचन बताता है कि क्रुद्धि के बदले में प्रेम से कर्म करना और प्रभु की व्यवस्था के अनुरूप व्यवहार करना परमेश्वर के विचारों के अनुरूप है। नीचे के स्रोत इस धारणा को पुष्ट करते हैं कि कौशलपूर्वक अत्याचार का मुकाबला करना और पड़ोसी के साथ सत्यवचन के साथ जुड़ना ही ईश्वर की जीवित व्यवस्था है, भले ही यह संतुलित क्रिया दया के साथ हो।
साहित्यिक संदर्भ ( literary context )
यह वचन नीति वचनों की सतर्कतापूर्ण धारणा को दर्शाता है कि व्यवहार में बुद्धिमानी और संयम कैसे दुष्टों के प्रति मृदुता और दया प्रदान कर सकता है। इसका तात्पर्य है कि आपसी विवाद और गलतफहमियों में शांति और नम्रता से उत्तर देना अधिक प्रभावी परिणाम देता है। यीशु के समय में भी इस सिद्धांत का अनुप्रयोग "परन्तु यदि आपका दुश्मन आपको धक्का दे तो पलटकर उत्तर दें" जैसे शिक्षाओं के पूरक के रूप में देखा गया है।
धार्मिक-significance ( theological significance )
कथा-कथन में यह विचार कि “तुम्हारा दुश्मन यदि भूखा हो तो उसे भोजन दो; अगर प्यासा हो तो उसे पानी पिलाओ” (परोपकार के लिए प्रेरित क्रिया)—यह सिखाता है कि दया से बदला लेने की इच्छा कमजोर नहीं, बल्कि ईश्वर के राज्य का भाग है। यह उस सिद्धांत को प्रमाणित करता है कि संघर्षों में भी प्रभु के आशीर्वाद और न्याय की दिशा को प्राथमिकता देनी चाहिए, ताकि प्रेरित जीवन के फल स्पष्ट हों।
अनुक्रमणीय cross-references (संघर्ष-परिवर्तन से जुड़ी संदर्भ-चिंतन)
व्यावहारिक reflection questions (चिंतन के प्रश्न)
संरचना-युक्त निष्कर्ष
नीति वचन 25:22 हमें सिखाता है कि बदला लेने के बजाय प्रेम और दया से प्रतिक्रिया करना ईश्वर की योजनाओं के अनुरूप है। यह केवल व्यक्तिगत शांति नहीं देता, बल्कि समुदाय में सत्य, न्याय और प्रेम के अनुशासन को मजबूत करता है। मत्ती 5:44 और रोमियों 12:20 के साथ यह वचन क्रियात्मक रूप से एकीकृत होता है—यह बताता है कि किस प्रकार क्रोध के सामने भी करुणा और नैतिक विवेक के साथ कदम उठाने से परमेश्वर का फल मिलता है।
महत्त्वपूर्ण उद्धरण (public-domain विचारक): यदि एक लाइन उपलब्ध हो तो संक्षेप में नोट किया जाएगा: “तुम्हारा दुश्मन भूखा हो तो उसे भोजन कराओ; प्यासा हो तो उसे पानी पिलाओ”—Matthew Henry, Albert Barnes, Adam Clarke के टिप्पणियों में इसी प्रकार के प्रेरणात्मक बिंदु मिलते हैं।