एज्रा 6:15 बाइबल पद का अर्थ और पद-दर-पद टीका

इस प्रकार वह भवन राजा दारा के राज्य के छठवें वर्ष में अदार महीने के तीसरे दिन को बनकर समाप्त हुआ।

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एज्रा 6:15 पद-दर-पद बाइबल टीका

एज्रा 6:15 का महत्व और संदर्भ

यह एक क्षणभंगुर चिह्न है कि यहोवा के लोग लौटकर पुनर्निर्माण की राह पर अग्रसर हैं। दारा के राज्य के छठे वर्ष, अदार महीने के तीसरे दिन, के साथ जहां नियुक्त भविष्य की दिशा स्पष्ट है, वहीं यह वाक्य बताता है कि यह refurbishment एक ठोस, आधिकारिक और सामाजिक-धर्म प्रभाव के साथ आरम्भ हुआ। इस वाक्य का मार्मिक बिंदु यह है कि परमेश्वर की योजना के अनुसार मंदिर का निर्माण पूरा हुआ, जो याजकों, लेवियों और पूरे इस्रायली समुदाय के लिए ईश्वर के प्रति पुनः समर्पण का प्रतीक बन गया।

पार्श्व-प्रसंग (Original Context)

इस्रायल लौटने वाले लोग बफर-समय से गुजर रहे थे—गबदेल-पथ और उत्पीड़न के बावजूद वे पर्व-उत्सवों, मंदिर-निर्माण और कर्म-उत्पादन के लिए संगठित थे। एज्रा–निरंमाण की यह घटना यह दर्शाती है कि तकदीर के अनुसार भी ईश्वर के लोग एक व्यवस्थित योजना के साथ आगे बढ़ते हैं। राजा दारा का शासन इस बात का संकेत है कि विदेशी शासक भी यह मान रहे हैं कि यह व्यवस्था परमेश्वर के संरक्षण से सम्बद्ध है, क्योंकि मंदिर-निर्माण को अनुमति देना उनके शासन के भीतर एक स्थिर तत्व बन गया है।

प्रधान संदेश

मुख्य संदेश यह है कि ईश्वर के लोग त्याग-त्यज्ञ और धीमे-धीमे परिश्रम से एक स्थायित्व प्राप्त करते हैं। मंदिर का पुनर्निर्माण, समुदाय की आध्यात्मिक जीवन-रेखा को पुनर्जीवित करता है और यहूदी समाज के धार्मिक-राजनीतिक इतिहास में एक निर्णायक क्षण के रूप में दर्ज होता है। यह भी संकेत है कि परमेश्वर के उद्देश्य में बाधाएं आ सकती हैं, पर उसकी प्रेरणा और लोगों की सामूहिक मेहनत से वह लक्ष्य प्राप्त होता है।

मुख्य थीम्स और बाइबलिक संकेत

  • परिश्रम और योजना: मंदिर निर्माण का पूरा होना एक संगठित काम की सफलता है।
  • प्रभाव और पहचान: मंदिर का पुनर्निर्माण समुदाय की पहचान और आराधना की सामूहिकता को पुनर्जीवित करता है।
  • कर्म-संयम और प्रभु-आस्था: राजा दारा की अनुमति यह दिखाती है कि न केवल आध्यात्मिक, बल्कि सांसारिक शासन भी परमेश्वर की योजना के साथ जुड़ा है।

संदर्भ-क्रॉस-रेफरेंसेज

1) हग्गे-जहानां और जकर्याह के संदर्भ से जुड़ाव बताता है कि मंदिर-निर्माण के प्रति लगातार प्रेरणा और विश्वास कैसे मजबूत होता है। क्रॉस-रेफ़रेंस: यहूदियों के भविष्य की आशा को उन्नत करता है। यह दिखाता है कि ठहराव के बाद भी परमेश्वर अपने लोगों के साथ है।

2) दानियेल 9:25–26 जैसे पाठ भी लौटे हुए लोग और मंदिर-निर्माण के महत्व को स्मरण कराते हैं कि समय-सीमा के भीतर ईश्वर की योजना कैसे पूरी होती है।

3) एज्रा 3 में मंदिर की पहली स्थापना का संतोष और तीर्थ-आविष्कार का पुनः आरंभ, यह दर्शाता है कि पुरानी विरासत की पुनर्रचना नए चरणों के साथ मिलती है।

एज्रा 6:15 के साथ सम्बन्धी विचार

यहां यह दिखता है कि किस प्रकार पथ के बीच में भी ईश्वर का निर्देश, समुदाय की एकता और अधिकारियों की अनुमति एक साथ मिलकर एक स्थायी परिणाम देते हैं। यह भी देखिए कि मंदिर-निर्माण का क्रम कितना व्यवस्थित है—राजा के अंतर्गत, महीने के अनुसार, दिन के चयन के साथ—जो यह दर्शाता है कि परमेश्वर की योजना में हर विवरण का योगदान है।

प्रेरक devotional विचार

कभी-कभी हमें बड़े बदलावों के लिए कई वर्षों की प्रतीक्षा करनी पड़ती है। परन्तु जब परमेश्वर के लोग एक साथ मिलकर फिर से आराधना-स्थल की स्थापना करते हैं, तब उनके जीवन में नया उत्साह और एक नया उद्देश्य आता है। हमें भी अपने आध्यात्मिक कार्यों—प्रायः छोटे-छोटे कदमों में—धैर्य, संगठन और समुदाय-सहयोग से आगे बढ़ना चाहिए। यह वाक्या स्मरण कराता है कि परमेश्वर का आशीर्वाद उन परियोजनाओं पर होता है जिन्हें समुदाय एकजुट होकर पूरा करता है।

टिप्पणी: इस पाठ की सार-संरचना में Matthew Henry, Albert Barnes, Adam Clarke के सार्वजनिक-डोमेन टिप्पणी-उद्धरणों से शुद्ध पंक्तियाँ सीधे उद्धृत नहीं की गईं, पर उनके विचारों का समेकित प्रभाव साफ़ दिखाई देता है—जिनमें से प्रत्येक ने मंदिर-निर्माण के आध्यात्मिक और सामाजिक दायित्व पर प्रकाश डाला है।

*** इस टीका में सार्वजनिक डोमेन में उपलब्ध कुछ प्राचीन और क्लासिक स्रोतों की सामग्री शामिल है। कुछ सामग्री को कृत्रिम बुद्धिमत्ता उपकरणों की सहायता से संसाधित, संक्षिप्त या अनुवादित किया गया हो सकता है। हर व्याख्या को बाइबल के पूरे पाठ और उसके संदर्भ के साथ अवश्य जाँचें। यदि आपको कोई त्रुटि या ऐसा अनुवाद मिले जिसे सुधारने की आवश्यकता हो, तो कृपया हमसे संपर्क करें।

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राजा क्षयर्ष के बारहवें वर्ष के नीसान नामक पहले महीने में, हामान ने अदार नामक बारहवें महीने तक के एक-एक दिन और एक-एक महीने के लिये “पूर” अर्थात् चिट्ठी अपने सामने डलवाई।

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और यह आज्ञा दी, कि अदार महीने के चौदहवें और उसी महीने के पन्द्रहवें दिन को प्रति वर्ष माना करें।

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यह अदार महीने के तेरहवें दिन को किया गया, और चौदहवें दिन को उन्होंने विश्राम करके भोज किया और आनन्द का दिन ठहराया।

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