Old Testament
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एज्रा 6:20 बाइबल पद का अर्थ और पद-दर-पद टीका
क्योंकि याजकों और लेवियों ने एक मन होकर, अपने-अपने को शुद्ध किया था; इसलिए वे सब के सब शुद्ध थे। उन्होंने बँधुआई से आए हुए सब लोगों और अपने भाई याजकों के लिये और अपने-अपने लिये फसह के पशु बलि किए।
एज्रा 6:20 पद-दर-पद बाइबल टीका
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एज्रा 6:20 समानांतर पद और संबंधित वचन
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2 इतिहास 35:11 (HINIRV) »
तब फसह के पशु बलि किए गए, और याजक बलि करनेवालों के हाथ से लहू को लेकर छिड़क देते और लेवीय उनकी खाल उतारते गए।

2 इतिहास 29:34 (HINIRV) »
परन्तु याजक ऐसे थोड़े थे, कि वे सब होमबलि पशुओं की खालें न उतार सके, तब उनके भाई लेवीय उस समय तक उनकी सहायता करते रहे जब तक वह काम पूरा न हो गया; और याजकों ने अपने को पवित्र न किया; क्योंकि लेवीय अपने को पवित्र करने के लिये पवित्र याजकों से अधिक सीधे मन के थे।

इब्रानियों 7:27 (HINIRV) »
और उन महायाजकों के समान उसे आवश्यक नहीं कि प्रतिदिन पहले अपने पापों और फिर लोगों के पापों के लिये बलिदान चढ़ाए; क्योंकि उसने अपने आप को बलिदान चढ़ाकर उसे एक ही बार निपटा दिया। (लैव्य. 16:6, इब्रा. 10:10,12,14)
अर्थ का संक्षेप
एज्रा 6:20 में कहा गया है कि याजकों और लेवियों ने एक मन होकर शुद्ध होकर फसह की अगली तैयारी के लिए पशु बलि की—इससे स्पष्ट है कि पवित्रता और आस्था की एकता ने उनकी धार्मिक क्रिया को सुगठित किया। यह वाक्य बताता है कि तब के मंदिर-कार्य और पवित्रता मापा गया एक संयुक्त व्यापक समुदाय का परिणाम था.
पृष्ठभूमि और संदर्भ
बाईबिल का यह भाग एजरा के समय का है जब बंधुआई से लौटे यहूदी येरुशलेम में देवालय की व्यवस्था बहाल कर रहे थे। क्योंकि शाब्दिक और आध्यात्मिक पुनर्स्थापना शुरू हो चुकी थी, इसलिए याजकों, लेवियों और पूरे सामुदायिक निकाय ने मिलकर माना कि पवित्रता न सिर्फ व्यक्तिगत बल्कि सामुदायिक जिम्मेदारी है। फसह की યाग्या एकता की पहचान है—वंश, स्थान, और कर्मों के बीच एक साझा अनुशासन।
व्याख्यात्मक अवलोकन
मुख्य विषय-वस्तु
अन्य पाठ-सम्बन्ध (cross-references)
1) Հयापोद (यही प्रकार): पुराने नियम में समुदायिक पवित्रता और पवित्र कार्यों के लिए एकता जरूरी बताती है; यह संदर्भ परमेश्वर के मानक के अनुरूप है।
2) नहर-आदेश के अनुपात: मंदिर सेवा के लिए चयनित और शुद्ध कर्मियों की आवश्यकता पर बल देता है; यह दिखाता है कि पवित्रता के साथ सेवा कितनी महत्त्वपूर्ण है।
3) पवित्रता और आस्था का संयोजन: यह एक जैसे उद्देश्य के साथ पूर्वव्यापक धार्मिक-समुदाय की स्थिरता का संकेत देता है।
व्याख्या से अपेक्षित व्यवहार
आज के पाठक के लिए यह संदेश है कि हम अपनी आस्था की शुद्धता और समुदाय के प्रति जवाबदेही को एक साथ रखें। ईश्वर के सामने उनके द्वारा निर्धारित पवित्र रीति-रिवाज और जीवन-उद्धार के अनुभव एक साथ चलें, ताकि हमारी पूजा और सेवा में एकता बनी रहे।