Old Testament
उत्पत्ति निर्गमन लैव्यव्यवस्था गिनती व्यवस्थाविवरण यहोशू न्यायियों रूत 1 शमूएल 2 शमूएल 1 राजाओं 2 राजाओं 1 इतिहास 2 इतिहास एज्रा नहेम्याह एस्तेर अय्यूब भजन संहिता नीतिवचन सभोपदेशक श्रेष्ठगीत यशायाह यिर्मयाह विलापगीत यहेजकेल दानिय्येल होशे योएल आमोस ओबद्याह योना मीका नहूम हबक्कूक सपन्याह हाग्गै जकर्याह मलाकीChapter
यशायाह 1 यशायाह 2 यशायाह 3 यशायाह 4 यशायाह 5 यशायाह 6 यशायाह 7 यशायाह 8 यशायाह 9 यशायाह 10 यशायाह 11 यशायाह 12 यशायाह 13 यशायाह 14 यशायाह 15 यशायाह 16 यशायाह 17 यशायाह 18 यशायाह 19 यशायाह 20 यशायाह 21 यशायाह 22 यशायाह 23 यशायाह 24 यशायाह 25 यशायाह 26 यशायाह 27 यशायाह 28 यशायाह 29 यशायाह 30 यशायाह 31 यशायाह 32 यशायाह 33 यशायाह 34 यशायाह 35 यशायाह 36 यशायाह 37 यशायाह 38 यशायाह 39 यशायाह 40 यशायाह 41 यशायाह 42 यशायाह 43 यशायाह 44 यशायाह 45 यशायाह 46 यशायाह 47 यशायाह 48 यशायाह 49 यशायाह 50 यशायाह 51 यशायाह 52 यशायाह 53 यशायाह 54 यशायाह 55 यशायाह 56 यशायाह 57 यशायाह 58 यशायाह 59 यशायाह 60 यशायाह 61 यशायाह 62 यशायाह 63 यशायाह 64 यशायाह 65 यशायाह 66



यशायाह 32:15 का संदर्भ और अभिप्राय
पद 32:15 में भविष्य की दृष्टि से परमेश्वर की आत्मा के प्रचंड प्राण-प्रवाह का उल्लेख किया गया है जो पृथ्वी पर पूर्ववत रूप से पुनः जीवन और उपज लेकर आता है। संदर्भ में यह उद्धारात्मक काल तब आता है जब प्रभु अपने लोगों पर आत्मा टपकाते हैं और आकाश से वर्षा की मात्रा बढ़ती है, जिससे निर्बल जंगल फलदार बन जाते हैं। यह एक प्रतीक है कि परमेश्वर के भक्तों के जीवन में परिवर्तन तब संभव होता है जब आत्मा ऊपर से प्रभावशाली ढंग से कार्य करे।
केंद्रीय अर्थ
इस Verse का केंद्रीय अर्थ है—परमेश्वर की आत्मा का अवतरण, जो दुर्गम परिस्थिति में भी जीवन और उद्यान बनाती है। जब आत्मा ऊपर से उण्डेला जाए, तब निर्जन और बंजर स्थानों में भी हरियाली आ जाती है। जीवन की उत्पादकता, न्याय-नीति और सामाजिक-सामंजस्य का पुनः आगमन इस संदर्भ का मूल उद्देश्य है।
दो-तीन प्रमुख विषय
संदर्भित पंक्तियाँ एवं उनका सम्बन्ध
यह अनुभाग अन्य समान प्रेषितियों से जुड़ता है जो आत्मा के आुवाज से जीवन-परिवर्तन का वर्णन करते हैं।
व्यावहारिक चिंतन
हम अपनी अवस्था में आत्म-परख करें: कहां जंगल अभी भी सूना है, कहाँ नहीं हो रहा फल?pray कि परमेश्वर की आत्मा हमारी घरेलू, कार्यस्थल और समुदायों को नई उर्जा दे और विशाल वृक्ष बनकर दूसरों को भी आशा दे। यह प्रार्थना करें कि सामाजिक-नैतिक निर्णयों में प्रामाणिक न्याय और करुणा बढ़े, ताकि हमारे रिश्ते फलदायी बनें।
संक्षिप्त समापन
यशायाह 32:15 हमें स्मरण कराता है कि जीवन में वास्तविक परिवर्तन तब आता है जब ऊपर से आत्मा अवतरित होती है। तब निर्जन स्थान भी उर्वर बनते हैं, और लोग एक दूसरे के प्रति न्यायपूर्ण और दयालु बनते हैं। यह दृष्टांत समय के साथ सदा नई आशाओं का स्रोत रहता है।
क्रॉस-रेफरेंस (संक्षेप समझ के साथ)
यशायाह 11:2— आत्मा के विभिन्न गुण समाज में परिवर्तन का कारण बनते हैं। योएल 2:28-29— आत्मा का प्रसार सभी को प्रभावित करता है। योहन्ना 7:37-38— आत्मा से जीवन और आंतरिक प्यास का संतोष मिलता है।
नोट: नीचे दिए गए उद्धरण हैं जो इस प्रकार के टिप्पणी-पन्नों में प्रचलित हैं—Matthew Henry, Albert Barnes, Adam Clarke से संक्षिप्त और परंपरागत विचारसूत्र के अनुरूप शब्द। अगर ठोस उद्धरण मिलें तो उन्हें यहाँ चिह्नित किया गया है।