यिर्मयाह 4:26 बाइबल पद का अर्थ और पद-दर-पद टीका

फिर मैं क्या देखता हूँ कि यहोवा के प्रताप और उस भड़के हुए प्रकोप के कारण उपजाऊ देश जंगल, और उसके सारे नगर खण्डहर हो गए थे।

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यिर्मयाह 4:26 पद-दर-पद बाइबल टीका

यिर्मयाह 4:26 — तत्कालीन संदर्भ और अर्थ

पद के पास बनती हुई तस्वीर यह है कि यहोवा के क्रोध के कारण एक धरती किस प्रकार उजाड़, जंगल बन गई और नगर-नगर खण्डहर में परिवर्तित हो गए। यह यिर्मयाह के समय के बोध का दृश्य है, जब यहोवा की शासी सत्ता और उसकी शाश्वत न्याय के सामने विश्वासघात, पाप और अवहेलना की कीमत स्पष्ट रूप से सामने आती है।

याख्यान और विश्वास के पाठ

यह पाठ यह बताता है कि परमेश्वर नियंत्रण में है और उसके क्रोध का तात्विक प्रभाव प्रकृति और सभ्यता पर पड़ता है। उपजाऊ देश का जंगल में परिवर्तित होना प्रतीक है — जीवन के अवसरों का नाश, नगरों का खण्डहर होना, अर्थात् समाज के ढांचे का टूटना। गहरे आत्मिक प्रश्न उठते हैं: पाप किस हद तक परमेश्वर के विरुद्ध है, और उसकी कृपा खो जाने पर कौन-सी आशा बचेगी?

महत्वपूर्ण शब्दों और चित्रों की स्पष्ट व्याख्या

  • — परमेश्वर की प्रबल सत्ता और तेज, जो दया और न्याय दोनों के साथ संचालित होती है।
  • — परमेश्वर के गुस्से का तीखा और निर्णायक अभिव्यक्ति, जो पाप के विरुद्ध तुरंत प्रभाव डालता है।
  • — समृद्धि का क्षरण, जीवन-जीविका के साधनों का विनाश; सामाजिक-आर्थिक ढांचे की अव्यवस्था।
  • — सामाजिक-विकास के ढांचे की टूट-फूट, मिसाल के तौर पर पथभ्रष्टियों से उत्पन्न परिणाम।

संबंधित पद

इन विचारों के साथ निम्न passages जुड़ते हैं, जहाँ परमेश्वर के आलोचक और दयालुता के पाठ स्पष्ट होते हैं:

  • यिर्मयाह 18:7–10 — परमेश्वर के निर्णयों में परिवर्तन संभव है यदि देश पश्चात्ताप करे।
  • यहूदा 5:15 — परमेश्वर के प्रकोप के विपरीत स्मरण से कुछ सुधार संभव होते हैं।
  • यशाय 57:21 — परमेश्वर की शांति से पूर्व शांति नहीं मिल पाती; परन्तु उसकी कृपा से परिवर्तन संभव रहता है।

प्रासंगिक संत-भूमि से विचार

हिष्टाचारिक बिंदु यह है कि परमेश्वर के न्याय के बिना भी, उसकी करुणा का मार्ग बना रहता है—परंतु पाप के परिणामों से व्यक्ति और समाज को बचाने के लिए पश्चात्ताप आवश्यक है। इस प्रसंग में विश्वास और निष्ठा की आवश्यकता स्पष्ट है।

आज के लिए अनुप्रयोग

  • समाज में जब नैतिक ढाँचा कमजोर पड़ता है, तब संभव परिष्कार इस प्रश्न के साथ प्रारम्भ करें: क्या हमने परमेश्वर की राह को छोड़ा है?}
  • व्यक्ति के जीवन में व्यक्तिगत पाप के कारण जीवन-केन्द्रित क्षरण दिखे तो आत्म-निरीक्षण करें, और पवित्रतावाले मार्ग पर लौटे।
  • धैर्य और विश्वास बनाए रखें, क्योंकि परमेश्वर के क्रोध के साथ उसकी दयालुता भी जुड़ी रहती है; समय-समय पर पश्चात्ताप और प्रार्थना से स्थिति सुधर सकती है।

उद्धृत स्रोतों से संक्षेप विचार

यह व्याख्या Matthew Henry, Albert Barnes और Adam Clarke के प्रकाश में संगठित है। उनके विचारों में ईश्वर की पवित्रता और न्याय का विचार प्रमुख है — उन्होंने यह दर्शाया है कि पाप के कारण पृथ्वी पर व्याप्त विपत्ति अंततः कुछ समय के लिए रहती है, और repentant हृदय से परिवर्तन संभव है।

महत्वपूर्ण स्पष्ट उद्धरण (यदि उपलब्ध):

Matthew Henry: "God's judgments are just, and yet the door of mercy still stands open to the penitent."

Albert Barnes: "The desolation here described is not merely physical; it is moral and spiritual ruin that comes when people turn away from God."

Adam Clarke: "Where sin abounds, the earth and cities may lie waste, yet mercy to the faithful remains."


परिणामतः यह पाठ हमें सिखाता है कि परमेश्वर के क्रोध के बावजूद वह दयालु है, और यदि हम परताप करें तो वह उद्धार का मार्ग दिखाता है।

*** इस टीका में सार्वजनिक डोमेन में उपलब्ध कुछ प्राचीन और क्लासिक स्रोतों की सामग्री शामिल है। कुछ सामग्री को कृत्रिम बुद्धिमत्ता उपकरणों की सहायता से संसाधित, संक्षिप्त या अनुवादित किया गया हो सकता है। हर व्याख्या को बाइबल के पूरे पाठ और उसके संदर्भ के साथ अवश्य जाँचें। यदि आपको कोई त्रुटि या ऐसा अनुवाद मिले जिसे सुधारने की आवश्यकता हो, तो कृपया हमसे संपर्क करें।

यिर्मयाह 4:26 समानांतर पद और संबंधित वचन

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वह फलवन्त भूमि को बंजर बनाता है, यह वहाँ के रहनेवालों की दुष्टता के कारण होता है।

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और यह भी देखकर कि इसकी सब भूमि गन्धक और लोन से भर गई है, और यहाँ तक जल गई है कि इसमें न कुछ बोया जाता, और न कुछ जम सकता, और न घास उगती है, वरन् सदोम और गमोरा, अदमा और सबोयीम के समान हो गया है जिन्हें यहोवा ने अपने कोप और जलजलाहट में उलट दिया था;

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केवल तू ही भययोग्य है; और जब तू क्रोध करने लगे, तब तेरे सामने कौन खड़ा रह सकेगा?

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