Old Testament
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यिर्मयाह 1 यिर्मयाह 2 यिर्मयाह 3 यिर्मयाह 4 यिर्मयाह 5 यिर्मयाह 6 यिर्मयाह 7 यिर्मयाह 8 यिर्मयाह 9 यिर्मयाह 10 यिर्मयाह 11 यिर्मयाह 12 यिर्मयाह 13 यिर्मयाह 14 यिर्मयाह 15 यिर्मयाह 16 यिर्मयाह 17 यिर्मयाह 18 यिर्मयाह 19 यिर्मयाह 20 यिर्मयाह 21 यिर्मयाह 22 यिर्मयाह 23 यिर्मयाह 24 यिर्मयाह 25 यिर्मयाह 26 यिर्मयाह 27 यिर्मयाह 28 यिर्मयाह 29 यिर्मयाह 30 यिर्मयाह 31 यिर्मयाह 32 यिर्मयाह 33 यिर्मयाह 34 यिर्मयाह 35 यिर्मयाह 36 यिर्मयाह 37 यिर्मयाह 38 यिर्मयाह 39 यिर्मयाह 40 यिर्मयाह 41 यिर्मयाह 42 यिर्मयाह 43 यिर्मयाह 44 यिर्मयाह 45 यिर्मयाह 46 यिर्मयाह 47 यिर्मयाह 48 यिर्मयाह 49 यिर्मयाह 50 यिर्मयाह 51 यिर्मयाह 52Verse
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यिर्मयाह 7:19 पर मूल अर्थ
इस वाणी का स्पष्ट अर्थ है: परमेश्वर पूछते हैं कि क्या उन्होंने अपने लोगों के मन में ईश्वर के विरुद्ध ज्वाला जगा दी है। यहाँ चेतावनी है कि इजराय ली लोग अपने मुँह पर उदासी डालते हैं—यानी अपनी नीति और आचरण के द्वारा ईश्वर के विरुद्ध प्रतिक्रिया कर रहे हैं—परिणामस्वरूप परमेश्वर को क्रोध आता है, और वे अपने विरुद्ध प्रश्न कर उठते हैं कि क्या यह सब नश्वर कर्मों के कारण है।
पृष्ठभूमि और संदर्भ
यिर्मयाह नबी के ऊपर जूनूनी समय का यह पाठ है, जब यरूशलेम के लोगों ने उग्र आचरण, मूर्तिपूजा और विश्वासघात की गतिविधियों को बढ़ा लिया था। विरोधियों के बीच विरोध के बावजूद, ईश्वर अपने चुने हुए लोगों के पापों पर चुप नहीं रहते; वे अपने निवास स्थान—यरेक्लाशिया के मंदिर—के सामने भी पापों का प्रहार सुना देते हैं। यह पद यह सोचने के लिए जगह देता है कि बाहरी रीति-रिवाजों के बावजूद परमेश्वर के साथ भक्ति-सत्यापन का आकलन कितना आवश्यक है।
व्याख्यात्मक चित्तवृत्तियाँ
संकेत शब्द और विचार
यह संदेश उन लोगों के लिए है जो “अपने ही” स्रोतों से उदासी और दोष को ढँकते हैं—यानी अपने दिल के बुरे इरादों को सामान्य बनाने की प्रवृत्ति। ईश्वर कठिनाइयों के समय भी अपने लोगों से सच्चे परिवर्तन की मांग करते हैं, ताकि उनका आचरण यहूदियों की मानक बन सके।
संबद्ध वचनों के संक्षिप्त cross-references
- यिर्मयाह 6:20-21: फलतः यह स्पष्ट होता है कि दिखावे से भरे रवैये में वास्तविक भक्ति नहीं मिलती।
- यिर्मयाह 11:8: पाप के कारण होने वाला क्रोध और फिर से चेतावनी—आखिरकार दंड और पुनःस्थापना की मांग।
- हबक्कुक 1:12-13: ईश्वर की पवित्रता और अन्याय के बीच दृष्टि, जहाँ ईश्वर अपराधों को सहन नहीं करते।
छोटी प्रायोगिक मार्गदर्शिका
सार और निष्कर्ष
यिर्मयाह 7:19 यह स्मरण कराता है कि ईश्वर केवल बाहरी पूजा नहीं देखना चाहते, बल्कि हृदय की सच्ची भक्ति, नेकनीयत, और न्यायप्रिय आचरण भी देखते हैं। यदि हम अपने मुँह से उदासी बढ़ाते हैं—यानी अपने पापों को बनाए रखते हैं—तो परमेश्वर के क्रोध की संभावना बनी रहती है। एक सुसंगत जीवन वही है जो आचार-व्यवहार और विचारों में एकरूपता व्यक्त करता है।
उद्धरण-नोट
यहाँ Matthew Henry, Albert Barnes और Adam Clarke के संकीर्ण लेकिन उपयोगी विचारों से समन्वयित विश्लेषण संक्षेप में समेटा गया है, ताकि पाठ के अर्थ में स्पष्टता बने रहे।
उद्धरण-Essentials: Henry, Barnes, Clarke के संकलन आधारित छोटे टिप्पणियाँ, अगर उपलब्ध रहें, स्पष्ट संकेत के रूप में शामिल की जाएँगी—परंतु पाठ के संगत अर्थ में ही प्रयोग किये गए हैं; पूर्ण वाक्यों की पेशकश यहाँ नहीं है।