Old Testament
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नीति-संहित 11:25 — उदारता और परोपकार का परिणाम
पद का अपरिहार्य दृश्यावली कहती है: उदार प्राणी हष्ट-पुष्ट हो जाता है, और जो औरों की खेती सींचता है, उसकी भी सींची जाएगी। यह एक जीवंत चित्र है कि दयालुता और मदद करने से आत्मिक व सांसारिक लाभ मिलता है।
ईश्वर की पहचान और विश्वास पर इसका उद्घाटन
यह वचन ईश्वर के न्याय और कृपा की व्यवस्था को दर्शाता है: वह विरोधाभास नहीं करता—जो बीज बोएगा वही फलों को पाएगा। उदारता में डूबना—हृदय से दूसरे की जिंदगी में मदद भरना—ईश्वर की आशीष का मार्ग बन जाता है। यह दर्शाता है कि विश्वासी जीवन में परमेश्वर की नियत प्रेमपूर्ण है: वह उन्हें चतुर्दिक आशीष देता है जो दूसरों के लिए थोड़ा-सा भी कर गुजरते हैं।
कुंजी शब्द और चित्र स्पष्ट करें
अन्य पवित्र ग्रंथों से सम्बद्ध संदर्भ
– पाठक यह समझ सके कि दयालुता परमेश्वर की महाराज्ञा है, इसलिए यह अन्य संदर्भों से भी जुड़ती है: उदाहरण के लिए, भला करने पर उसके समय पर वरदान मिलना; दूसरों के लिए पसीना बहाने पर स्वयं के लिए भी आशीष मिलना।
– उद्धृत अन्य उल्लेखों से संकेत मिलते हैं कि जो निर्धनों की सहायता करता है, उसका भाग्य उज्वल रहता है और जो दयालुता से बटोरता है, उसे पूर्वकथित पुनः प्राप्ति मिलती है (सीधे वचनों का पूर्ण पाठ न दें, केवल संदर्भों का संकेत दें)।
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संक्षेप शीर्षक-उद्धरण एवं संत-मत
इस पाठ के साथ कुछ पुराण-टीकाकारों के सुझाए अर्थ-टुकड़े भी जुड़ते हैं: उदारता से जीवन में मिलने वाली आशीष प्राकृतिक नहीं, बल्कि ईश्वरिक व्यवस्था का हिस्सा है; जो बीज रोपे वह फसल पाता है।
सीधा निष्कर्ष
नीति-संहित 11:25 हमें सिखाती है कि प्रबल आंतरिक ध्येय के साथ दूसरे के लिए उद्धार और सहायता देना, ना केवल उनके लिए वरदान है, बल्कि स्वयं हमारे लिए भी आध्यात्मिक और सांसारिक पोषण लेकर आता है। उदारता की यह पथपथ पर चलकर हम ईश्वर की करूणा को उनके बीच स्पष्ट रूप से दिखाते हैं, और वही मार्ग हैं जो जीवन को भरपूर बनाते हैं।
उद्धृत-स्वरूप टिप्पणियाँ: यदि आवश्यक हो, तो आप Matthew Henry, Albert Barnes और Adam Clarke के उद्धृत शब्दों के संक्षिप्त, शाब्दिक अंश देख सकते हैं—परन्तु पूर्ण टेक्स्ट उद्धरण यहाँ नहीं दिया गया है; उनके विचार इस निष्कर्ष के लिए संरचना-आधार बनाते हैं।
क्रॉस-रेफरेंस (संदर्भ) और संक्षिप्त स्पष्टीकरण