Old Testament
उत्पत्ति निर्गमन लैव्यव्यवस्था गिनती व्यवस्थाविवरण यहोशू न्यायियों रूत 1 शमूएल 2 शमूएल 1 राजाओं 2 राजाओं 1 इतिहास 2 इतिहास एज्रा नहेम्याह एस्तेर अय्यूब भजन संहिता नीतिवचन सभोपदेशक श्रेष्ठगीत यशायाह यिर्मयाह विलापगीत यहेजकेल दानिय्येल होशे योएल आमोस ओबद्याह योना मीका नहूम हबक्कूक सपन्याह हाग्गै जकर्याह मलाकीChapter
नीतिवचन 1 नीतिवचन 2 नीतिवचन 3 नीतिवचन 4 नीतिवचन 5 नीतिवचन 6 नीतिवचन 7 नीतिवचन 8 नीतिवचन 9 नीतिवचन 10 नीतिवचन 11 नीतिवचन 12 नीतिवचन 13 नीतिवचन 14 नीतिवचन 15 नीतिवचन 16 नीतिवचन 17 नीतिवचन 18 नीतिवचन 19 नीतिवचन 20 नीतिवचन 21 नीतिवचन 22 नीतिवचन 23 नीतिवचन 24 नीतिवचन 25 नीतिवचन 26 नीतिवचन 27 नीतिवचन 28 नीतिवचन 29 नीतिवचन 30 नीतिवचन 31Verse
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मुख्य व्याख्या केंद्र
नीतिवचन 11:17 कहता है कि कृपालुता अपनाने वाला व्यक्ति अपने ही भले के लिए काम करता है, जबकि क्रूर व्यक्ति अपनी ही देह को दुख पहुँचाता है। यहाँ भले का उद्देश्य न केवल सामाजिक अच्छाई है, बल्कि आंतरिक चरित्र का उत्कर्ष है। प्रभावी आचरण से व्यक्त हुआ प्रेम आत्म-उन्नति और स्वास्थ्य का मार्ग बनता है; हिंसा या कठोरता से व्यक्ति अपने ही जीवन के कल्याण को खतरे में डालता है।
पाण्डुलिपिक संदर्भ (साहित्यिक परिप्रेक्ष्य)
यह संकेतन स्पष्ट करता है कि कर्मों के परिणाम सीधे रूप से व्यक्ति के भीतर और स्वास्थ्य पर पड़ते हैं। कृपालुता के फल में दयालु व्यवहार, सहनशीलता और न्याय सम्मिलित हैं, जो सामाजिक तालमेल और आंतरिक शांति बनाते हैं। दूसरी ओर क्रूरता, जो दूसरों पर दबाव डालती है, अंततः अपने ही मन और शरीर के लिए नुकसानदेह सिद्ध होती है।
धार्मिक-वैचारिक महत्व
यह पंक्ति दरसाल यह बताती है कि नैतिक आचरण का मूल प्रेरक प्रेम है—ईश्वर के आदेश के अनुरूप कृपा दिखाना और दूसरों के साथ सहानुभूति रखना। यह नीतियों के नियम से आगे बढ़कर जीवन के स्वास्थ्य, परिवार और समुदाय के लिए लाभकारी बनता है।
शास्त्रीय संदर्भ-आंतरिक सम्बन्ध
1) करुणा और दया का न्यायपूर्ण संयोजन जीवन के स्वास्थ्य में सहायक है। 2) क्रूरता से स्वयं की देह में तनाव, अवरोध और मानसिक आघात संभव है, जिससे व्यवहारिक क्षमता घटती है। 3) परोपकार और उदारता से सामाजिक रिश्ते मजबूत होते हैं, जो व्यक्तिगत सुरक्षा और शांति को गहरा करते हैं।
क्रॉस-रेफरेंसेस (संक्षिप्त चर्चा)
• नीतिवचन 14:21— दयालुता का सामाजिक लाभ; विरुद्ध में तुच्छ क्रूरता से समाजिक संकट।
• हब 12:11— शांति के लिए विवेकपूर्ण प्रशिक्षण; कठोरता से नहीं, बल्कि अनुशासन से आंतरिक स्वास्थ्य बनता है।
• मत्ती 7:12— जिसे जो मिलता है, उसे वैसा ही दें; कृपा का प्रभाव स्वयं पर परिलक्षित होता है।
चिंतन के प्रश्न
संक्षिप्त निष्कर्ष
यह शास्त्रीक वचन हमारे लिए स्पष्ट करता है कि कृपालुता ही वास्तविक स्वास्थ्य और आत्म-कल्याण की कुंजी है। जो लोग दूसरों पर दया और सम्मान देखते हैं, वे न केवल समाज में समृद्धि बनाते हैं, बल्कि अपने अंतःकरण और देह को भी सुरक्षित रखते हैं। क्रूरता आत्म-हानि का रास्ता है, वह अंततः हर स्तर पर खण्डित करती है।
नोट्स (एतिहासिक-व्याख्यात्मक)
मिथक-हीन संतुलित दृष्टिकोण में, मैथ्यू हेनरी औरAlbert Barnes तथा Adam Clarke के टिप्पणी-हवाले छोटे उद्धरण आवश्यक उपलब्ध हों तो वे नीचे निहित हो सकते हैं; यहाँ सार यह है कि कृपालु व्यवहार का लाभ स्वयं पर अधिक है, और क्रूरता का दुष्परिणाम स्वयं पर होता है।
पंक्ति-संदेश का सार
कृपालुता से जो भला बनता है, वह जीवन के हर क्षेत्र में लाभ देता है; क्रूरता से अपने ही स्वास्थ्य और खुशी को नुकसान पहुँचता है।