Old Testament
उत्पत्ति निर्गमन लैव्यव्यवस्था गिनती व्यवस्थाविवरण यहोशू न्यायियों रूत 1 शमूएल 2 शमूएल 1 राजाओं 2 राजाओं 1 इतिहास 2 इतिहास एज्रा नहेम्याह एस्तेर अय्यूब भजन संहिता नीतिवचन सभोपदेशक श्रेष्ठगीत यशायाह यिर्मयाह विलापगीत यहेजकेल दानिय्येल होशे योएल आमोस ओबद्याह योना मीका नहूम हबक्कूक सपन्याह हाग्गै जकर्याह मलाकीChapter
नीतिवचन 1 नीतिवचन 2 नीतिवचन 3 नीतिवचन 4 नीतिवचन 5 नीतिवचन 6 नीतिवचन 7 नीतिवचन 8 नीतिवचन 9 नीतिवचन 10 नीतिवचन 11 नीतिवचन 12 नीतिवचन 13 नीतिवचन 14 नीतिवचन 15 नीतिवचन 16 नीतिवचन 17 नीतिवचन 18 नीतिवचन 19 नीतिवचन 20 नीतिवचन 21 नीतिवचन 22 नीतिवचन 23 नीतिवचन 24 नीतिवचन 25 नीतिवचन 26 नीतिवचन 27 नीतिवचन 28 नीतिवचन 29 नीतिवचन 30 नीतिवचन 31Verse
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नीतिवचन 11:11 (HINIRV): सीधे लोगों के आशीर्वाद से नगर की बढ़ती होती है, परन्तु दुष्टों के मुँह की बात से वह ढाया जाता है।
अवस्था का संकेत: इस पद में नगर की उन्नति और समाज की स्थिति प्रत्यक्ष रूप से लोगों के बर्ताव पर निर्भर है। सीधे (श्रद्धावान, सत्यनिष्ठ, उचित) लोग आशीर्वाद बनते हैं, और उनके कारण सामाजिक स्थिरता, समृद्धि और नैतिक परंपरा बढ़ती है; वहीं दुष्टों के मुँह से निकलने वाले निंदात्मक, छल-कपटपूर्ण वा बोल्ल-मिथ्या प्रचार से समाज तबाह होता है। यह नीति बताती है कि समाज की सुरक्षा और प्रगति दिव्य नैतिकता से जुड़ी है, न कि केवल शक्ति या धन से।
क्या यह पाठ हमें बताता है?
यह प्रार्थना-प्रधान संदेश है कि चरित्र-आधारित जीवन से नगर-जनता का लाभ होता है, जबकि सिनेमित, दुष्ट आचरण से तबाही आ सकती है। परमेश्वर भरोसेमंद रूप से आशीष देता है जब लोग सत्यनिष्ठ रहते हैं। दूसरी ओर, दुष्टों के मुँह से निकला निंदक व्यवधान बन सकता है, जिससे पारिवारिक, सामाजिक और आर्थिक क्षति होती है। यह वचन एक प्रकार की सामाजिक चेतावनी भी है कि शब्द और व्यवहार मिलकर सामुदायिक सुदृढ़ता या पतन निर्धारित करते हैं।
गहरे अर्थ के शब्दार्थ
अन्य संबंधित संदर्भ
• नीतिशास्त्र में क्या होता है जब लोग सत्य बोलते हैं और छल नहीं करते: प्रचलित सोच पर बल देता है कि ईश्वर आशीष देता है और समाज उन्नति पाता (उदा. प्रत्यक्ष आशीर्वाद और सार्वजनिक मान-सम्मान). उद्धृत संक्षेप — पुराने भिन्न-भिन्न टिप्पणीकारों के विचार एकीकृत रूप में समझे जा सकते हैं।
• प्रगति और पतन का सामाजिक सिद्धांत — सत्यवादी समुदायों में स्थिरता, वहीं मिथ्या प्रचार से विभाजन और क्षति।
पवित्र शास्त्र के साथ सम्बन्ध
1) प्रचलित कहावतों में सत्य और न्याय की महत्ता; 2) कर्म के अनुसार आशीष-श्रद्धा संबंध; 3) दुष्टों के विरोध और उसकी सामाजिक प्रतिक्रिया।
इन वर्गीकृत संदर्भों के माध्यम से दिखता है कि जीवन-चरित और भाषण का संयोजन समाज की दीर्घकालिक रक्षा बनाता है, न कि अस्थायी शक्ति या धन।
आज के संदर्भ में प्रयोग
- अपने परिवार, मित्र और सहकर्मियों के साथ ईमानदारी, संयम और सत्य पर टिके रहें; ऐसे आचरण से रिश्ते मजबूत होते हैं और समुदाय सुरक्षित होता है।
- सार्वजनिक बोलचाल में सत्य-न्याय से प्रेरित रहें; निंदक प्रचार और दुर्भावनापूर्ण शब्द समाज को विभाजित करते हैं, इसलिए सावधानी से बोलें।
कहानी के सार को समेटना
यह वचन बताता है कि नैतिकता और सत्यनिष्ठा से नगर के लिए आशीर्वाद बनता है, जबकि निर्लज्जता, छल और दुष्ट प्रचार से विनाश की स्थिति बनती है। परमेश्वर इस क्रम को ध्यान में रखते हुए हमारी जीवन-यात्रा में मार्गदर्शक हैं।
बाइबिल के एक-दो उद्धरण-सा प्रमाण (संक्षेप)
यह पाठ Matthew Henry, Albert Barnes, और Adam Clarke जैसे सार्वजनिक-डायरे के टिप्पणीकारों के भीतर मिलकर एकीकृत व्याख्या में भी माना गया है कि नैतिक आचार समाज को संरचना देता है और दुष्ट-आचरण उसे ढहाते हैं।
क्रॉस-रेफरेंसेज़:
इन क्रॉस-रेफरेंसेज़ का संक्षिप्त अर्थ यह है कि सत्य, न्याय और संयम सामाजिक प्रगति के आधार हैं, और दुष्ट बोलने से समाज में विखंडन होता है।