Old Testament
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रोमियों 10:3 बाइबल पद का अर्थ और पद-दर-पद टीका
क्योंकि वे परमेश्वर की धार्मिकता* से अनजान होकर, अपनी धार्मिकता स्थापित करने का यत्न करके, परमेश्वर की धार्मिकता के अधीन न हुए।
रोमियों 10:3 पद-दर-पद बाइबल टीका
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रोमियों 10:3 समानांतर पद और संबंधित वचन
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लूका 16:15 (HINIRV) »
उसने उनसे कहा, “तुम तो मनुष्यों के सामने अपने आप को धर्मी ठहराते हो, परन्तु परमेश्वर तुम्हारे मन को जानता है, क्योंकि जो वस्तु मनुष्यों की दृष्टि में महान है, वह परमेश्वर के निकट घृणित है।

फिलिप्पियों 3:9 (HINIRV) »
और उसमें पाया जाऊँ; न कि अपनी उस धार्मिकता के साथ, जो व्यवस्था से है, वरन् उस धार्मिकता के साथ जो मसीह पर विश्वास करने के कारण है, और परमेश्वर की ओर से विश्वास करने पर मिलती है,

लूका 18:9 (HINIRV) »
और उसने उनसे जो अपने ऊपर भरोसा रखते थे, कि हम धर्मी हैं, और दूसरों को तुच्छ जानते थे, यह दृष्टान्त कहा:
रोमियों 10:3 पर टिप्पणियाँ — धार्मिकता के भ्रम से ऊपर आधिकारिक धार्मिकता का लक्ष्य
मुख्य विचार: वे लोग परमेश्वर की धर्मीत्ता को माने बिना अपनी धर्मीत्ता स्थापित करने का प्रयत्न करते हैं; इस वजह से वे परमेश्वर की धर्मीत्ता के अधीन नहीं होते। यह आयत स्पष्ट करती है कि कर्मशक्ति से प्राप्त निष्कर्ष या मानवीय सुध-बुध के आधार पर धर्मी ठहरना परमेश्वर के सही धर्मिक नियम से भटकना है।
कूराकलात्मक पृष्ठभूमि और साहित्यिक संदर्भ
पोलुस की रोमियों की प_epistle में यह विभाग यह स्पष्ट करता है कि विश्वास के बिना धर्मशास्त्र की कसौटियों पर खरा ठहरना संभव नहीं है। यहाँ “धार्मिकता” से तात्पर्य केवल रीति-रिवाज नहीं, बल्कि परमेश्वर के उचित राज्य और उसकी इच्छा के अनुसार जीवित आचरण से है। वे यह सोचते हैं कि एक आचरण-आधारित व्यवस्था उन्हें धर्मी ठहराती है, किन्तु वास्तव में यह व्यवस्था परमेश्वर की धर्मीत्ता के अनुरूप नहीं है।
थियोलोंजी और धार्मिकता की अस्थिर परिक्रमा
हिन्दी मानक अनुवाद HINIRV इस आयत में यह दिखाता है कि आत्म-निर्भर धार्मिकता एक झूठी धुरी है। इतिहास-परंपरा में, इस विचार का सामना इन प्रमुख टिप्पणीकारों से हुआ है:
कथा-विन्यासीय संदर्भ और स्पष्ट संबंध
1) रोमियों 9–11 में परमेश्वर की योजना की दृष्टि से यह आयत उन लोगों के लिए चेतावनी है जो स्थिति-केन्द्रित धर्मीत्ता की खोज करते हैं।
2) अन्यति: गा. 3:21–22 आदि में स्पष्ट है कि कानून भी विश्वास के साथ पूर्ण होता है, न कि उसके विरुद्ध।
3) यह आयत यीशु के संदेश के अनुरूप है कि मनुष्य के कर्म नहीं, बल्कि विश्वास से उद्धार मिलता है (यूहन्ना 6:29; गलातियों 2:16)।
चर्चा के प्रश्न
संक्षिप्त निष्कर्ष
यह आयत शिक्षा देती है कि धर्मीत्ता केवल मानव प्रयासों से नहीं मिलती; परमेश्वर की धार्मिकता का हासिल होना विश्वास और कृपा के माध्यम से है। अपने आप को आत्म-निर्भर धर्मिकता से मुक्त कर परमेश्वर की ठीक-ठीक व्यवस्था के अनुरूपजीवन अपनाने में ہی सच्चा उद्धार और शांति है।
क्रॉस-रेफरेंसेस और संकेतित संयोग
• रोमियो 3:28 — विश्वास के द्वारा धर्मी ठहरना; कर्मों से नहीं. व्याख्या: परन्तु यह ध्यान दें कि आस्था पर क्रिया-प्रतिक्रियात्मक निष्ठा जरूरी है, न कि निष्क्रिय विश्वास।
• गालातियों 3:11 — धर्मी वही होता है जो विश्वास पर स्थिर रहता है; कर्मों पर नहीं।
• यूहन्ना 1:12–13 — विश्वास के द्वारा पुत्रत्व प्राप्त करना; यह स्वयं-धारण नहीं, वरदान है।
सीधी उद्धरण (केवल जहां उपलब्ध):
“धर्मीत्ता के अधीन न हुए” (रोमियों 10:3) — Matthew Henry, Albert Barnes, Adam Clarke के प्रभावी तात्पर्य में समाहित है कि मनुष्यों द्वारा अपने आप धर्मी ठहरना मानव-आधारित विचार है, जबकि शास्त्र स्पष्ट आस्था के अनुरूप परमेश्वर की कृपा को उद्धृत करता है।