Old Testament
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रोमियों 10:4 बाइबल पद का अर्थ और पद-दर-पद टीका
क्योंकि हर एक विश्वास करनेवाले के लिये धार्मिकता के निमित्त मसीह व्यवस्था का अन्त है।
रोमियों 10:4 पद-दर-पद बाइबल टीका
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रोमियों 10:4 समानांतर पद और संबंधित वचन
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गलातियों 3:24 (HINIRV) »
इसलिए व्यवस्था मसीह तक पहुँचाने के लिए हमारी शिक्षक हुई है, कि हम विश्वास से धर्मी ठहरें।

रोमियों 8:3 (HINIRV) »
क्योंकि जो काम व्यवस्था शरीर के कारण दुर्बल होकर न कर सकी*, उसको परमेश्वर ने किया, अर्थात् अपने ही पुत्र को पापमय शरीर की समानता में, और पाप के बलिदान होने के लिये भेजकर, शरीर में पाप पर दण्ड की आज्ञा दी।

मत्ती 5:17 (HINIRV) »
“यह न समझो, कि मैं व्यवस्था* या भविष्यद्वक्ताओं की शिक्षाओं को लोप करने आया हूँ, लोप करने नहीं, परन्तु पूरा करने आया हूँ। (रोम. 10:4)
रोमियों 10:4 का तात्पर्य: धार्मिकता के लिए मसीह व्यवस्था का अन्त
पद का सीधा संदर्भ रोमियों 10:4 है: “क्योंकि हर एक विश्वास करनेवाले के लिये धार्मिकता के निमित्त मसीह व्यवस्था का अन्त है।” यहाँ प्रेरित पौलुस ईश्वरीय व्यवस्था के दायरे में विश्वास की भूमिका स्पष्ट करते हैं: मसीह का आना और उनका पूरा कार्य—विश्वास से धार्मिकता प्राप्त करना—खासकर नीति-नियमों के कर्मों से नहीं, बल्कि विश्वास के द्वारा उद्धार की प्रवाहिकता को पूर्ण करता है। यह पाठ दाखिल करता है कि धार्मिकता अब नियमों के कठोर पालन से नहीं, बल्कि यीशु मसीह के प्रति विश्वास से आकर पूरी होती है।
ईश्वर、faith और मसीह के लक्ष्य के बारे में स्पष्ट व्याख्या
पौलुस बतलाते हैं कि धार्मिकता के लिए मसीह की व्यवस्था “अन्त” है—यानी पुरानी व्यवस्था के नियमों की पूर्णता नहीं, बल्कि वह व्यक्ति जो उन नियमों के पीछे प्रदान की गई उद्धारकारी व्यवस्था का लक्ष्य है। यदि धार्मिकता नियमों के पालन पर टिकी रहती, तो हर कोई अपनी योग्यता के अनुसार खुद ही परिशुद्ध हो सकता था। परन्तु मसीह का आना यह संकेत करता है कि उद्धार—आनन्द और सत्य—अब विश्वास के द्वारा प्राप्त होता है, और यह विश्वास पूर्व-गंभीरता से नहीं, बल्कि ईश्वर की कृपा के साथ जुड़ा है।
महत्वपूर्ण शब्दों की व्याख्या
संबंधित बाइबिल pasaj
—गलातियों 3:24-26: कानून का उद्देश्य हमें ईश्वर के ऊपर चढ़ाने की दिशा में मार्गदर्शक है; परन्तु आत्म-विश्वास से उद्धार पाया जाता है।
—इब्रानियों 11:6: विश्वास के बिना परमेश्वर की प्रसन्नता नहीं; विश्वास के साथ ही धार्मिकता की प्राप्ति संभव है।
—यूहन्ना 1:12-13: जो यीशु को अपनाते हैं, वे परमेश्वर की संतानों के रूप में अधिकार पाते हैं—यह विश्वास का परिणाम है, न कि कर्मों का योगफल।
इन संदर्भों के माध्यम से स्पष्ट होता है कि उद्धार और धार्मिकता अब व्यक्त व्यक्तिगत संबंध पर टिकी है, न कि केवल बाहरी नियमों के पूर्ण पालन पर।
आज के जीवन में अनुप्रयोग
1) अपने विश्वास की जाँच करें: क्या आप यीशु मसीह को अपने उद्धारकर्ता के रूप में स्वीकार करते हैं? यह विश्वास ही आपकी धार्मिकता की नींव है, न कि खुद के अच्छे कर्म।
2) कर्मों का संयोजन, न दौड़-भाग: धार्मिकता केवल विश्वास का परिणाम है; आपके व्यवहार—पवित्र जीवन के छोटे-छोटे कदम— विश्वास की प्रकृति को दर्शाते हैं।
3) आश्वस्त रहें कि उद्धार ईश्वर की कृपा से है: कोई भी मानव-योग्यता नहीं, बल्कि मसीह के प्रति समान्य आस्था पर निर्भरता।
सारांश
रोमियों 10:4 इस बात को स्पष्ट करता है कि धार्मिकता पुरुष-योग नहीं, बल्कि मसीह में विश्वास के द्वारा आती है। पुरानी व्यवस्था के नियमों का उद्देश्य भी इसी प्रमुख लक्ष्य को संकेतित करता था: उद्धार के लिए एक भगवान की कृपा-बद्ध राह। अतः आज ईश्वर की कृपा में स्थिर रहते हुए, अपने विश्वास को जीवंत बनाएं और परमेश्वर की धार्मिकता को अपने जीवन में प्रकट करें।