Old Testament
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रोमियों 12:17 बाइबल पद का अर्थ और पद-दर-पद टीका
बुराई के बदले किसी से बुराई न करो; जो बातें सब लोगों के निकट भली हैं, उनकी चिन्ता किया करो।
रोमियों 12:17 पद-दर-पद बाइबल टीका
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रोमियों 12:17 समानांतर पद और संबंधित वचन
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नीतिवचन 20:22 (HINIRV) »
मत कह, “मैं बुराई का बदला लूँगा;” वरन् यहोवा की बाट जोहता रह, वह तुझको छुड़ाएगा। (1 थिस्सलुनीकियों. 5:15)

1 थिस्सलुनीकियों 5:15 (HINIRV) »
देखो की कोई किसी से बुराई के बदले बुराई न करे; पर सदा भलाई करने पर तत्पर रहो आपस में और सबसे भी भलाई ही की चेष्टा करो। (1 पत. 3:9)

मत्ती 5:39 (HINIRV) »
परन्तु मैं तुम से यह कहता हूँ, कि बुरे का सामना न करना; परन्तु जो कोई तेरे दाहिने गाल पर थप्पड़ मारे, उसकी ओर दूसरा भी फेर दे।
रोमियों 12:17 – बुराई का उत्तर बुराई से नहीं
स्थानीय संदर्भ में यह पद उन क्रिस्तीय जीवन-शैली के सिद्धांतों को स्पष्ट करता है जिन पर रोमियों के पाठक पहले से चल रहे थे: अच्छाई के साथ बुरा न देना, और अपने दूसरे के हित को अपने ही हित के समान मानना। पौलुस ने विश्वसनीय नैतिकता और प्रेम आधारित उत्तरदायित्व के ढांचे को बनाए रखा है, न कि बदले की भावना को मजबूत करने के लिए।
पवित्रता के दर्शन और याद दिलाने वाला संदेश
पद बताता है कि हमारे शब्दों और कर्मों में हिंसा या बदला लेने की प्रवृत्ति नहीं होनी चाहिए। “जो बातें सब लोगों के निकट भली हैं”—यही मार्ग है कि हम अपने समाज की चीजों को सही ढंग से संभालें, उनकी सुरक्षा और भलाई के लिए। इसका तात्पर्य यह है कि विश्वास में प्रगति उसी वचन से होती है जो प्रेम, नम्रता और सत्य को बनाए रखे।
महत्वपूर्ण शब्दार्थ और छायाचित्र
मूल सिद्धांतों के साथ सम्बद्ध बातें
कई प्राचीन व्याख्याकारों ने इस आयत को क्रिस्टीय आचरण का आधार माना है—ः
क्रॉस-रेफरेंसेस
1) रोमियों 12:14 — पराक्रम के बदले परोपकार; 2) रोमियों 12:21 — बुरे को न हराने के लिए भला से जीतना; 3) मत्ती 5:44 — प्रेम के जवाब में शत्रु के प्रति दया और आशीर्वाद।
स्पष्ट संकेत: भला करने और भला-चाल चलाने से दुष्टता का चक्र टूटता है; प्रेम और सात्विकता से प्रतिशोध का स्थान संतुष्टि के साथ भरता है।
आज का अनुप्रयोग
इस वचनों में दर्शाया गया आचार-धर्म—बुराई के बदले भलाई, और हर किसी के हित के अनुरूप कार्य—क्रिस्तीय जीवन की स्थिर राह है। यह न केवल व्यक्तिगत पवित्रता बल्कि समुदाय के भीतर शांति सुनिश्चित करता है, और संभव बनाता है कि ईश्वर की इच्छा संसार में प्रकट हो सके।
नोट: ऊपर के उद्धरण में Matthew Henry, Albert Barnes और Adam Clarke से संक्षिप्त विचार उद्धृत हैं; यदि किसी वाक्य के स्पष्ट शब्द मिलें, तो वही पाठक उद्धरण के रूप में उद्धृत किए जाते हैं।