Old Testament
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आमोस 5:25 बाइबल पद का अर्थ और पद-दर-पद टीका
“हे इस्राएल के घराने, तुम जंगल में चालीस वर्ष तक पशुबलि और अन्नबलि क्या मुझी को चढ़ाते रहे*?
आमोस 5:25 पद-दर-पद बाइबल टीका
*** इस टीका में सार्वजनिक डोमेन में उपलब्ध कुछ प्राचीन और क्लासिक स्रोतों की सामग्री शामिल है। कुछ सामग्री को कृत्रिम बुद्धिमत्ता उपकरणों की सहायता से संसाधित, संक्षिप्त या अनुवादित किया गया हो सकता है। हर व्याख्या को बाइबल के पूरे पाठ और उसके संदर्भ के साथ अवश्य जाँचें। यदि आपको कोई त्रुटि या ऐसा अनुवाद मिले जिसे सुधारने की आवश्यकता हो, तो कृपया हमसे संपर्क करें।
आमोस 5:25 समानांतर पद और संबंधित वचन
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प्रेरितों के काम 7:42 (HINIRV) »
अतः परमेश्वर ने मुँह मोड़कर उन्हें छोड़ दिया*, कि आकाशगण पूजें, जैसा भविष्यद्वक्ताओं की पुस्तक में लिखा है, ‘हे इस्राएल के घराने, क्या तुम जंगल में चालीस वर्ष तक पशु बलि और अन्नबलि मुझ ही को चढ़ाते रहे? (यिर्म. 7:18, यिर्म. 8:2, यिर्म. 19:13)

नहेम्याह 9:21 (HINIRV) »
चालीस वर्ष तक तू जंगल में उनका ऐसा पालन-पोषण करता रहा, कि उनको कुछ घटी न हुई; न तो उनके वस्त्र पुराने हुए और न उनके पाँव में सूजन हुई।

यहोशू 24:14 (HINIRV) »
“इसलिए अब यहोवा का भय मानकर उसकी सेवा खराई और सच्चाई से करो; और जिन देवताओं की सेवा तुम्हारे पुरखा फरात के उस पार और मिस्र में करते थे, उन्हें दूर करके यहोवा की सेवा करो।
आमोस 5:25 पर टिप्पणी (हिंदी, HINIRV)
कॉन्टेक्स्ट में अमोस पवित्रस्थान के स्थल से बाहर चल रहे लोगों के बीच के चाल-चलन को संबोधित करते हुए यह कहता है कि इस्राएल ने किन्हीं भौतिक बलिदानों से मोड़कर, असल में अपने हृदय के इरादों और सामाजिक अन्याय को ढके रखा। परमेश्वर इस्राइल के लोग जो जंगल के समय में चालीस वर्ष बिताते हैं, वे उसी समय पशुबलि और अन्नबलि चढ़ाते रहे, परन्तु उसकी इच्छा के अनुसार उनका सामाजिक व्यवहार, न्याय और दया नहीं बदला। यह वाक्य दर्शाता है कि सभ्यता और धर्म के बाह्य रूप चाहे कितने भी विशिष्ट क्यों न हों, अगर भीतरी जीवन से सत्य नहीं जुड़ा है, तो ताने-बाने की पूजा निरर्थक है.
केंद्रीय अर्थ
यह वचन बताता है कि �ईसा-निष्ठा केवल बाहरी धर्म-क्रिया तक सीमित नहीं होनी चाहिए; परमेश्वर की चाहत है कि His लोग अपने व्यवहार, अन्याय-निवारण और समाज के बीच पक्षपात से मुक्त होते हुए उसकी सेवा करें। जंगल के चालीस वर्ष में भी, अगर औचित्य-अन्याय, निराश-गरीबी और शोषण जारी रहा, तो यह बलि-प्रथा सारहीन हो जाती है।
दो मुख्य विषय
संदर्भ सुझाव
• निर्गमन 23:25-26: परमेश्वर की सेवकाई और जीवन-यापन के बीच संतुलन का महत्व।
• मत्ती 6:33: पहले परमेश्वर की राज और उसकी righteousness की खोज—तब बाकी सभी चीज़ें जुड़ती चलती हैं।
• याकोब 2:14-17: विश्वास के साथ कर्म का मेल जरूरी है—नहीं तो कह कर भी कुछ नहीं बदलेगा।
क्लेमोरल और व्यवहारिक अवलोकन
आज के पाठक के लिए यह संदेश स्पष्ट करता है कि धार्मिक गतिविधियाँ सार्थक तब ही होती हैं जब उनका जीवन व्यवहार में प्रतिध्वनित होता है—यानी गरीबों की सहायता, अन्याय के विरुद्ध खड़े होना, और समाज में सद्भावना सुनिश्चित करना. अगर हम अपनी ज़बान से पवित्र बातें कहते हैं, पर अपने व्यवहार से लोगों के साथ अन्याय करते हैं, तो हमारी भक्ति अल्पविकास है।
चोटी-सीधा निष्कर्ष
आमोस 5:25 हमें याद दिलाता है कि ईश्वर की इच्छानुसार सच्चा भक्ति वह है जिसमें आस्था के साथ न्याय और करुणा साथ चलते हैं। बाह्य बलियाँ जीवन के आंतरिक परिवर्तन का संकेत नहीं बनतीं जब तक हृदय और समाज-चरित्र सुधर नहीं जाते।
छोटे संदर्भ-नोट
प्रत्येक संदर्भ, जो इस वचन से जुड़ता है, वह इस मूल विचार को मजबूत करता है कि धार्मिक क्रियाओं का मान तब है जब हम समाज के लिए सचेत और निष्पक्ष रहते हैं।
संक्षेपित सार
जंगल में चालीस वर्ष तक बलि-बलि चढ़ाते रहने से भी यदि हृदय-निरीक्षण, न्याय और दया नहीं बदली, तो यह धार्मिकता अधूरी है। परमेश्वर सत्य और न्याय के साथ एक जीवन की मांग करते हैं—यही वास्तविक आराधना है।
उद्धरण योग्य टिप्पणी: मैथ्यू हल्ली (Matthew Henry) और ऐल्बर्ट बर्न्स (Albert Barnes) तथा एडम क्लार्क (Adam Clarke) की सार्वजनिक-डोमेन टिप्पणियों में इस प्रकार के विचार मिलते हैं: बाहरी धर्म-कार्य जब तक आंतरिक परिवर्तन से समर्थित न हों, तब तक वे केवल दिखावा होते हैं। किसी भी टिप्पणी में निहित संक्षिप्त वाक्यांश—“आस्था के साथ कर्म का मेल जरूरी है”—ये विचार इन पंक्तियों के अनुरूप है।