यशायाह 25:2 बाइबल पद का अर्थ और पद-दर-पद टीका

तूने नगर को ढेर बना डाला, और उस गढ़वाले नगर को खण्डहर कर डाला है; तूने परदेशियों की राजपुरी को ऐसा उजाड़ा कि वह नगर नहीं रहा; वह फिर कभी बसाया न जाएगा।

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यशायाह 25:2 पद-दर-पद बाइबल टीका

यशायाह 25:2 का तत्कालीन संदर्भ और पाठ का अर्थ

यशायाह 25:2 में ईश्वरीय न्याय और महिमा का चित्र स्पष्ट रूप से प्रस्तुत है: तूने नगर को ढेर बना डाला, और उस गढ़वाले नगर को खण्डहर कर डाला है; तूने परदेशियों की राजपुरी को ऐसा उजाड़ा कि वह नगर नहीं रहा; वह फिर कभी बसाया न जाएगा। यह पाठ यूहदा-युग के विपरीत परिस्थितियों में भी ईश्वर के प्रत्यक्ष नियंत्रण और उनके स्मरणीय उद्धार के संकेत देता है। इस प्रसंग के पृष्ठभूमि में बाबेलोन के आतंक, इस्राइल के अस्थिर राजनीतिक अनुभव और प्लेना-न्याय के प्रतीक मिलते हैं, ताकि परमेश्वर की संहिता और उसकी नीति का उतार-चढ़ाव स्पष्ट हो।

ईश्वर का साहचर्य और विश्वास

यहVerse 하나님 के न्याय की चौकसी को दर्शाता है। परमेश्वर शासन कर के नगरों को उठा-फेंक सकता है ताकि उन जगहों पर अन्याय, दमन और अधर्म का परिणाम स्पष्ट हो। फिर भी यह पाठ न सिर्फ विध्वंस की बात करता है, बल्कि यह भी इंगित करता है कि परमेश्वर का उद्देश्य भूमि पर उसकी महिमा प्रकट करना है, ताकि लोग उसकी साक्षी-सत्यता को पहचानें।

महत्वपूर्ण शब्दावली और चित्र

- नगर को ढेर बनाना और गढ़वाले नगर का खण्डहर होना: यह एकदम तीखा दृश्य है जो अस्थिरता, विनाश और मानव-निर्भरता की सीमा को दर्शाता है। यह चित्र यह भी संकेत देता है कि मानव निर्मित सुरक्षा-वस्तुएँ कितनी अस्थायी हैं, जबकि परमेश्वर की सत्ता अक्षुण्ण रहती है।

- परदेशियों की राजपुरी: यह एक ऐसी जगह है जो राजनीतिक-औपनिवेशिक शक्ति का प्रतीक है, जहाँ मानव-शक्ति से स्थायित्व बन सकता हो परन्तु परमेश्वर के आदेश से वह उजाड़ बन जाती है—ताकि उसकी अस्थिरता और सीमाएँ सामने आ सकें।

अन्य आयाम और सम्बन्धित पाठ

1) यशायाह 24:23 में भी सत्य यह है कि परमेश्वर के पादशी-राज्‍य की महिमा ही उज्ज्वल है; न्याय और परमसत्ता एक साथ प्रकट होती है।

2) सूचना यह है कि अन्याय के विरुद्ध ईश्वर की कार्रवाई में उद्धार की संभावना भी है, क्योंकि 25 अध्याय के आरम्भ में ग़ैर-उद्धृत नगरों के लोप के बीच भी परमेश्वर की महान कृपा और समता उभरती है।

3) अन्य पवित्र ग्रंथों में नगर-उद्धार का विचार बार-बार आता है—जैसे मिस्र की विपत्ति के समय परमेश्वर की रक्षा, ताकि उनकी साक्षी-यात्रा टिके रहे।

कथ्य-उद्धार और आज की प्रतिध्वनि

आज के संदर्भ में यह शास्त्र हमें याद दिलाता है कि हमारे समाज की संस्थाओं, दमनकारी प्रणालियों या अपार संपत्ति के बावजूद परमेश्वर का अधिकार सर्वोपरि है। जो सत्ता-प्रधानियाँ मानव-अपेक्षाओं पर टिकती हैं, वे समय के साथ ढह सकती हैं; पर जो परमेश्वर की योजना के अनुसार सत्य, न्याय और दया पर टिके रहते हैं वे स्थिर रहते हैं। इसलिए हम अपने जीवन-निर्णयों में निष्कपट न्याय, करुणा और ईश्वर-आस्था को केंद्रित करें।

छोटी-सी क्रॉस-रेफरेंस टिप्पणियाँ

  • यशायाह 24:23 – परमेश्वर की महिमा और राष्ट्रों पर उसका न्याय। यह विस्तृत संकेत देता है कि विनाश के पीछे भी उसकी महिमा है।
  • यशायाह 27:5 – किसी कसौटी पर आने पर परमेश्वर का संरक्षण मिल सकता है; भला उसका उद्धार किस प्रकार आता है।
  • यहोशू 6:26 – नगरों के विनष्ट होने के बीच भी परमेश्वर की योजना कैसे सहज-स्वीकृत होती है।

इन संदर्भों से स्पष्ट है कि नगर-उद्धार और पतन का क्रम परमेश्वर की योजना से जुड़ा है, और विश्वासी जीवन में इसकी ध्वनि को समझना उपयोगी है।

संक्षिप्त निष्कर्ष

यशायाह 25:2 दिखाता है कि ईश्वर की सत्ता मानव-निर्मित सुरक्षा से कहीं ऊँची है। उनका न्याय निरपेक्ष और सुनिश्चित है, पर उनकी कृपा से उद्धार भी संभव है। हमारे लिए पाठ यह है: अपना भरोसा वे ही करें जो विश्व-स्तर पर स्थिर हैं, और जो दूसरों के लिए न्याय और दया का मार्ग बनाते हैं।

यह Commentary Matthew Henry, Albert Barnes और Adam Clarke के सार्वजनिक-डोमेन विचारों से संजेटित है, ताकि पाठ का गहरा अर्थ सरल भाषा में समझ में आ सके।

*** इस टीका में सार्वजनिक डोमेन में उपलब्ध कुछ प्राचीन और क्लासिक स्रोतों की सामग्री शामिल है। कुछ सामग्री को कृत्रिम बुद्धिमत्ता उपकरणों की सहायता से संसाधित, संक्षिप्त या अनुवादित किया गया हो सकता है। हर व्याख्या को बाइबल के पूरे पाठ और उसके संदर्भ के साथ अवश्य जाँचें। यदि आपको कोई त्रुटि या ऐसा अनुवाद मिले जिसे सुधारने की आवश्यकता हो, तो कृपया हमसे संपर्क करें।

यशायाह 25:2 समानांतर पद और संबंधित वचन

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