Old Testament
उत्पत्ति निर्गमन लैव्यव्यवस्था गिनती व्यवस्थाविवरण यहोशू न्यायियों रूत 1 शमूएल 2 शमूएल 1 राजाओं 2 राजाओं 1 इतिहास 2 इतिहास एज्रा नहेम्याह एस्तेर अय्यूब भजन संहिता नीतिवचन सभोपदेशक श्रेष्ठगीत यशायाह यिर्मयाह विलापगीत यहेजकेल दानिय्येल होशे योएल आमोस ओबद्याह योना मीका नहूम हबक्कूक सपन्याह हाग्गै जकर्याह मलाकीChapter
यशायाह 1 यशायाह 2 यशायाह 3 यशायाह 4 यशायाह 5 यशायाह 6 यशायाह 7 यशायाह 8 यशायाह 9 यशायाह 10 यशायाह 11 यशायाह 12 यशायाह 13 यशायाह 14 यशायाह 15 यशायाह 16 यशायाह 17 यशायाह 18 यशायाह 19 यशायाह 20 यशायाह 21 यशायाह 22 यशायाह 23 यशायाह 24 यशायाह 25 यशायाह 26 यशायाह 27 यशायाह 28 यशायाह 29 यशायाह 30 यशायाह 31 यशायाह 32 यशायाह 33 यशायाह 34 यशायाह 35 यशायाह 36 यशायाह 37 यशायाह 38 यशायाह 39 यशायाह 40 यशायाह 41 यशायाह 42 यशायाह 43 यशायाह 44 यशायाह 45 यशायाह 46 यशायाह 47 यशायाह 48 यशायाह 49 यशायाह 50 यशायाह 51 यशायाह 52 यशायाह 53 यशायाह 54 यशायाह 55 यशायाह 56 यशायाह 57 यशायाह 58 यशायाह 59 यशायाह 60 यशायाह 61 यशायाह 62 यशायाह 63 यशायाह 64 यशायाह 65 यशायाह 66



यशायाह 48:18 — पाठ का तात्पर्य और आत्म-चेतना
: यशायाह 48:18 में परमेश्वर अपने चेलों से बताना चाहते हैं कि अगर वे केवल मेरी आज्ञाओं को सुनते और मानते, तो उनकी शांति न rivers जैसी व्यापक होती, न समुद्र के समान उथल-पुथल। यह वाक्य ईश्वरीय इच्छा की सहज, सरल आवश्यकता पर प्रकाश डालता है—महान आराम का मार्गobedience में निहित है।
ईश्वरतः क्या बतलाता है
यह पद शेषनिखरे पापी-उत्पीड़न के बीच, उद्धारकर्ता की दृष्टि से एक आह्वान है: मेरी आज्ञाओं को मान लेना और सचमुच उनका पालन करना शांति को आमंत्रित करता है। यदि व्यक्ति परमप्रिय के आदेशों को नहीं मानता, तो शांति भीतर नहीं रहती; परन्तु यदि अनुशासन से चलते हैं, तो भीतर की शांति और स्थिरता बाहरी परिस्थितियों से अधिक स्थिर बनती है। यहाँ “शांति नदी के समान” और “धर्म समुद्र की लहरों के समान” जैसे रूपक गहरे संतोष और व्यवस्था की गारंटी का प्रतीक बनते हैं।
बोधगम्य शब्दों के अर्थ
अन्य आयतों के संदर्भ (संक्षेप)
1) यशायाह 26:3-4— एक विश्वासी की स्थिरता, जो परमेश्वर पर निर्भर होकर निर्मल शांति पाता।
2) मत्ती 7:24-27— जो शब्द पर अडिग होता है उसकी संरचना की दृढ़ता; अव्यवस्था का संघटन तब टूटता है जब आस्था अभ्यास में आती है।
3) भजन 37:37— सत्य और धैर्य के साथ जीवन बिताने पर अन्तःस्थ शांति की सुरक्षा।
पूर्ववर्ती टिप्पणीकारों के सारांश संकेत
महत्वपूर्ण विचार यह है कि परमेश्वर की आज्ञाओं की निष्ठा से जीवन में स्थिरता और शांति आती है; अधर्म में उलझकर समस्या बढ़ती है। लेखक-सम्पादन के पुरानी टिप्पणीकारों के अनुभवों के अनुसार यह संकेत करता है कि शांति और सुरक्षा एक धर्मी जीवन-चाल में निहित है, न कि पथभ्रष्टता के पल-पल बदलाव में।
आज के पाठ के लिए अनुप्रयोग
: अगर आप मेरी आज्ञाओं को मानेंगे और उन्हें जीयेंगे, तो जीवन में शांति और नैतिकता की गहराई अपार रहेगी—यही ईश्वर की इच्छा है।
छोटे cross-reference समझना
यशायाह 48:18 से जुड़ी समझ को तीन आयतों से संगति मिलती है: एक ऐसी स्थिर शांति जो परमेश्वर की आवाज़ सुनकर मिलती है, दूसरी आस्था के अभ्यास द्वारा स्थापित जीवन-शैली, तथा तीसरी नैतिक-आचरण की निरंतरता जो समाज में शांति को बढ़ाती है।