यशायाह 51:7 बाइबल पद का अर्थ और पद-दर-पद टीका

“हे धर्म के जाननेवालों, जिनके मन में मेरी व्यवस्था है, तुम कान लगाकर मेरी सुनो; मनुष्यों की नामधराई से मत डरो, और उनके निन्दा करने से विस्मित न हो।

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यशायाह 51:7 पद-दर-पद बाइबल टीका

यशायाह 51:7 का हिंदी टिप्पणी (HINIRV)

योशायाह के संदर्भ में यह वाक्य उन लोगों से है जो परमेश्वर की सच्चाई और नीति से परिचित हैं—धर्मज्ञानियों, जो व्यवस्था पर स्थिर रहते हैं। वे अत्यंत कठिन समय में भी अपने विश्वास को बनाए रखें और मनुष्यों की आलोचना से विचलित न हों, क्योंकि परमेश्वर उनका संरक्षण और न्यायदाता है।

मुख्य संदेश का सार

जिस प्रकार धर्म से परिचित लोग परमेश्वर की व्यवस्था को मानते हैं, वैसे ही भगवान की अवज्ञा और मानव-भरोसे के वातावरण में भी उनकी आस्था बनी रहनी चाहिए। यह आयत उन विश्वासियों से है जो वेदना और अस्वप्न परिस्थितियों के बीच भी परमेश्वर के धार्मिक सिद्धांतों पर टिके रहते हैं, भले ही लोग उनके बारे में क्या कहते हैं या दुष्प्रचार करें।

दो–तीन प्रमुख विषय

  • विश्वास बनाम विरोध: विद्वान और धर्मज्ञ, जो व्यवस्था जानते हैं, वे अपने विश्वास के कारण दबाव में आते हैं, परन्तु उन्हें डरना नहीं चाहिए।
  • मानव आलोचना से सर्तक रहें: लोगों की निंदा से विचलित न हों; परमेश्वर के प्रति सच्चे रहते हुए उत्तरदायित्व निभाएं।
  • ईश्वर की प्रतिरक्षा: परमेश्वर के प्रति विश्वास रखने वालों के लिए वह उनकी रक्षा और न्याय का स्रोत है; मनुष्यों के दुरुपयोग से वे सुरक्षित रहते हैं।

संबंधित पवित्र ग्रंथ (cross-references) – कमीशनित संक्षेप

1) यशायाह 54:17 — किसी भी ईर्ष्या-आत्मा या आलोचना के विरुद्ध परमेश्वर का ढाल होने का आश्वासन देता है। यह इस पद्य के साथ सामंजस्य बैठाता है कि उद्धारकर्ता के अनुयायियों की सुरक्षा परमेश्वर की दीर्घकालीन सहायता है।

2) मत्ती 10:28 — परमेश्वर के भरोसे पर टिके रहने की शिक्षा देता है कि मनुष्यों द्वारा मार डाले जाने पर भी आत्मा और शरीर दोनो डरना नहीं चाहिए, क्योंकि परमेश्वर एक योग्य न्यायदाता है।

3) याकूब 1:12 — धैर्य के साथ परीक्षण सहन करने वाले को blessing प्राप्त होगी— यह विचार इस आयत के साथ जुड़ता है कि लोगों की आलोचना से डरना नहीं चाहिए जब हमारा लक्ष्य परमेश्वर के सत्य पर खड़ा होना हो।

व्यावहारिक विचार

जो धर्मशास्त्री और धर्मज्ञ इस verse का पाठ करते हैं, उन्हें अपने विवेक के साथ यह पूछना चाहिए: क्या मैं ऐसे समय में भी ईश्वर के नियमों को प्राथमिकता देता हूँ जब लोग मेरी आलोचना करें? क्या मेरा निर्णय मानव-सम्पादन से नहीं, बल्कि परमेश्वर के वचन के अनुसार है? यदि हाँ, तो मेरी आस्था, धैर्य और नम्रता चमक उठती है।

एक सम्मिलित विवेचन

यह आयत एक एकीकृत संदेश देता है: धर्मज्ञता के साथ रहने वालों को भीतर से भरोसा रखना चाहिए, बाहरी दबाव के बावजूद भी, क्योंकि परमेश्वर ही उनका एकमात्र सुरक्षित आधार है। प्रेरित पवित्र लेखनों के समानानुसार, उनके लिए आलोचना और नाम-धर्मीकरण एक सामान्य अनुभव हो सकता है, परन्तु भगवान की सन्निधि उन पर बनी रहती है।

संक्षिप्त निष्कर्ष

यशायाह 51:7 हमें याद दिलाता है कि सच्चे धर्मी वही हैं जो व्यवस्था को जानते हैं और भगवान की आवाज़ पर कान लगाकर सुनते हैं; मानव-निंदा से डरना नहीं, बल्कि ईश्वर के सिद्धांतों पर दृढ़ रहते हुए जीवन का मार्ग चलना ही आशीर्वाद है।

: नीचे उद्धृत केवल Matthew Henry, Albert Barnes या Adam Clarke के वास्तविक संक्षेप उद्धरण दिए गए हैं, यदि उपलब्ध हों—परन्तु यहाँ मूल पाठ के अनुसार ही व्यक्त विचार प्रस्तुत हैं।

*** इस टीका में सार्वजनिक डोमेन में उपलब्ध कुछ प्राचीन और क्लासिक स्रोतों की सामग्री शामिल है। कुछ सामग्री को कृत्रिम बुद्धिमत्ता उपकरणों की सहायता से संसाधित, संक्षिप्त या अनुवादित किया गया हो सकता है। हर व्याख्या को बाइबल के पूरे पाठ और उसके संदर्भ के साथ अवश्य जाँचें। यदि आपको कोई त्रुटि या ऐसा अनुवाद मिले जिसे सुधारने की आवश्यकता हो, तो कृपया हमसे संपर्क करें।

यशायाह 51:7 समानांतर पद और संबंधित वचन

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भजन संहिता 37:31 (HINIRV) »
उसके परमेश्‍वर की व्यवस्था उसके हृदय में बनी रहती है, उसके पैर नहीं फिसलते।

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मत्ती 5:11 (HINIRV) »
“धन्य हो तुम, जब मनुष्य मेरे कारण तुम्हारी निन्दा करें और सताएँ और झूठ बोल बोलकर तुम्हारे विरोध में सब प्रकार की बुरी बात कहें।

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फिर यदि मसीह के नाम के लिये तुम्हारी निन्दा की जाती है, तो धन्य हो; क्योंकि महिमा की आत्मा, जो परमेश्‍वर की आत्मा है, तुम पर छाया करती है। (मत्ती 5:11-12)

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