यशायाह 58:5 बाइबल पद का अर्थ और पद-दर-पद टीका

जिस उपवास से मैं प्रसन्‍न होता हूँ अर्थात् जिसमें मनुष्य स्वयं को दीन करे, क्या तुम इस प्रकार करते हो? क्या सिर को झाऊ के समान झुकाना, अपने नीचे टाट बिछाना, और राख फैलाने ही को तुम उपवास और यहोवा को प्रसन्‍न करने का दिन कहते हो? (मत्ती 6:16, जक. 7:5)

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यशायाह 58:5 पद-दर-पद बाइबल टीका

यशायाह 58:5 — संदर्भ और तात्पर्य

इस पद में ईश्वर यह स्पष्ट करते हैं कि विनम्र उपवास केवल बाहरी क्रियाओं से नहीं मापा जाता, बल्कि दिल की अवस्था से मापा जाता है। यशायाह की ओर में यह आन्दोलन उस समय के लोगों के मिथ्या उपवास पर चोट करता है, जो आडंबर दिखाने के लिए दिन-रात तीव्र धूम-धाम के बजाय आत्म-स्वीकृति, दया और न्याय के वास्तविक जीवन-अनुसरण से दूर थे। पहचाने जाते हैं वे उपवास जो "आकर्षक" दिखते हैं परन्तु आंतरिक परिवर्तन से खाली होते हैं।

मुख्य विचार

1) उपवास का सही स्वरूप: देव का प्रसन्‍न होना न सिर्फ मौन-ध्यान या खान-पान की क्रिया है, बल्कि स्वयं को दीन-हीन, नम्र और पक्षपात से मुक्त बनाना है।

2) बाहरी अर्चन बनाम आंतरिक परिवर्तन: सिर झुकाने, राख फेरने जैसे प्रतीक उपवास-उद्धार नहीं बनते जब दिल की स्वार्थ-गति और अन्याय के प्रति चुप्पी बनी रहती है।

3) समाज के साथ कर्तव्य: वास्तविक उपवास सामाजिक दया, भूखों को भोजन देना, बंदियों को छोड़ना, अन्याय के विरुद्ध सचाई के साथ खड़ा होना है।

दो-तीन प्रमुख विषय

  • दिल की विनय: दीन-स्वीकृति, आत्म-निरीक्षण और भय-ईश्वर के साथ सच्चा संबंध स्थापित करना।
  • आंतरिक परिवर्तन बनाम दिखावे: बाहरी रीति-रिवाज़ कितने भी प्रबल हों, यदि अंतर आत्मा में परिवर्तन नहीं लाते, वे परमेश्वर के साथ मेल नहीं बैठते।
  • सामाजिक न्याय और करुणा: उपवास का परिणाम भूखमरी, प्यास और दरीद्रों की सहायता में प्रत्यक्ष होने चाहिए।

संदर्भित पाठ्यांशों के साथ संयोग

- मत्ती 6:16: उपवास के समय प्रत्यक्ष स्वार्थ-चेतना को चुनौती दी गई है—मूर्ति बनाकर नहीं, परन्तु आत्मा के सचेत परिवर्तन से।

- जेम्स 4:5-6 (छोटा-सा क्रॉस-रेफरेंस): परमेश्वर के लिए अद्भुत स्थान बनाते समय आत्म-विश्वास और विनम्रता आवश्यक है।

- यरम 7:5-9 प्रकार: बाहरी धर्म में फँसकर भी अंतरमन का सत्य उजागर करना ज़रूरी है।

व्यावहारिक सुझाव

छोटी-सी समापन रेखा

यशायाह 58:5 हमें यह याद दिलाता है कि ईश्वर के पास उपवास का सार तब है जब हमारा दिल दीन-हीन, न्यायप्रिय और दया-परक बनकर समाज के दुखों के साथ जुड़ जाए। बाहरी रीति-रिवाज़ चाहें कितने भी पुख्ता क्यों न हों, यदि वे आंतरिक परिवर्तन और सामाजिक निष्क्रियता के बिना हैं, तो वे परमेश्वर की इच्छा के अनुरूप नहीं।

संकेतित उद्धरण (पवित्र-ग्रंथ समीप)*

मत्ती 6:16 के संदर्भ में: “और जब तुम उपवास करो...” — यह दर्शाता है कि उपवास का वास्तविक उद्देश्य क्रोध-गुमान नहीं, आत्म-नियोजन और ईश्वर-प्रणीत जीवन है।

एॅलबर्ट बार्न्स, एडम क्लार्क से प्रेरित टिप्पणियाँ: बाहरी आडंबर को नहीं, दिल की विनय को महत्व दें; यह उपवास का मूल है।

नोट: नीचे दी गई उद्धरण केवल स्पष्ट तत्त्व-संकेत हेतु हैं; पूरा पाठ नहीं दिया गया है।

*** इस टीका में सार्वजनिक डोमेन में उपलब्ध कुछ प्राचीन और क्लासिक स्रोतों की सामग्री शामिल है। कुछ सामग्री को कृत्रिम बुद्धिमत्ता उपकरणों की सहायता से संसाधित, संक्षिप्त या अनुवादित किया गया हो सकता है। हर व्याख्या को बाइबल के पूरे पाठ और उसके संदर्भ के साथ अवश्य जाँचें। यदि आपको कोई त्रुटि या ऐसा अनुवाद मिले जिसे सुधारने की आवश्यकता हो, तो कृपया हमसे संपर्क करें।

यशायाह 58:5 समानांतर पद और संबंधित वचन

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“सब साधारण लोगों से और याजकों से कह, कि जब तुम इन सत्तर वर्षों के बीच पाँचवें और सातवें महीनों में उपवास और विलाप करते थे*, तब क्या तुम सचमुच मेरे ही लिये उपवास करते थे?

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तब मैं अपना मुख प्रभु परमेश्‍वर की ओर करके* गिड़गिड़ाहट के साथ प्रार्थना करने लगा, और उपवास कर, टाट पहन, राख में बैठकर विनती करने लगा।

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कि यहोवा के प्रसन्‍न रहने के वर्ष का और हमारे परमेश्‍वर के पलटा लेने के दिन का प्रचार करूँ; कि सब विलाप करनेवालों को शान्ति दूँ। (लूका 4:18,19, मत्ती 5:4)

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