Old Testament
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यशायाह 1 यशायाह 2 यशायाह 3 यशायाह 4 यशायाह 5 यशायाह 6 यशायाह 7 यशायाह 8 यशायाह 9 यशायाह 10 यशायाह 11 यशायाह 12 यशायाह 13 यशायाह 14 यशायाह 15 यशायाह 16 यशायाह 17 यशायाह 18 यशायाह 19 यशायाह 20 यशायाह 21 यशायाह 22 यशायाह 23 यशायाह 24 यशायाह 25 यशायाह 26 यशायाह 27 यशायाह 28 यशायाह 29 यशायाह 30 यशायाह 31 यशायाह 32 यशायाह 33 यशायाह 34 यशायाह 35 यशायाह 36 यशायाह 37 यशायाह 38 यशायाह 39 यशायाह 40 यशायाह 41 यशायाह 42 यशायाह 43 यशायाह 44 यशायाह 45 यशायाह 46 यशायाह 47 यशायाह 48 यशायाह 49 यशायाह 50 यशायाह 51 यशायाह 52 यशायाह 53 यशायाह 54 यशायाह 55 यशायाह 56 यशायाह 57 यशायाह 58 यशायाह 59 यशायाह 60 यशायाह 61 यशायाह 62 यशायाह 63 यशायाह 64 यशायाह 65 यशायाह 66



यशायाह 8:14 का अर्थ और संदर्भ
सीधे शब्दों में कहें तो परमेश्वर यीशु के आने से पहले इस्राइल के लिए एक शरणस्थल बनने के बजाय, उनके लिए ठोकर का पत्थर और जाल बन जाएगा। यह वाक्य यह दर्शाता है कि अलौकिक गवाही और न्याय के लिए ईश्वर के मार्ग का चयन गलत के बजाय सही दिशा में न हो तो उद्धार के मार्ग में बाधा बन सकता है।
पृष्ठभूमिसंContext
यशायाह ने आक्रामक बहिर्गमन और दासता के खतरे के बीच इस्राइल के लिए एक चेतावनीपूर्ण संदेश अच्छा-खासा दिया। 8:14 में यह ठहराव यह बताता है कि कुछ लोगों के लिए परमेश्वर का सम्मान और शरण इसका उलटा प्रत्यक्ष खतरे का कारण बन सकता है—यानी जो लोग उसे refuge मानते हैं, वही गलत निर्णयों के कारण पथभ्रमण में पड़ते हैं। रोम 9:32–33 के संदर्भ में यह उद्धरण ईश्वर के चुनाव, विश्वास और कठिनाई से भरे मार्ग पर दृढ़ता बनाये रखने के विचारों से जुड़ता है।
Interpretive observations
संक्षिप्त थीम सूची
अन्य पवित्र ग्रंथ संदर्भ (cross-references)
रोम 9:32–33 के साथ: यह संकेत देता है कि परमेश्वर के धार्मिक चयन और उनके विश्वास के मार्ग में पत्थर-टकराव कैसे आता है; यीशु के उद्धार के मार्ग पर विश्वास का महत्त्व स्पष्ट होता है। यह वचन यह भी दिखाता है कि जब लोग स्वयं के कर्म या परंपराओं को उद्धार के मार्ग के बराबर मानते हैं, तब वे चढ़ाव नहीं चढ़ पाते।
नीतिवचन में ईमानदारी और विश्वास के साथ मानने के फायदे का उल्लेख भी मिलता है—जो ठोस निर्णय बनाकर मार्ग बनाते हैं।
यशायाह 28:16 का संदर्भ भी विचार करें, जहाँ प्रभु एक निश्चित स्टेप के साथ मार्ग बनाते हैं ताकि लोग विश्वास के साथ सम्बद्ध रहें।
प्रसंग-उपयोगी टिप्पणियाँ (प्रायः उद्धरण के साथ)
Matthew Henry की टिप्पणी—“कठिनाई के बीच परमेश्वर अपनी शरण देता है, परन्तु यदि हृदय अविश्वास में डूबा हो, तो वही शरण पत्थर बन जाती है।”
Albert Barnes की टिप्पणी—“यहोवा अपने लोगों के लिए सुरक्षित स्थान बन सकता है, परन्तु इतिहास के चरित्र से यह साफ है कि वे स्वयं अपनी चेष्टा से दबाव बढ़ाते हैं।”
Adam Clarke की टिप्पणी—“यह वचन कृपण मनुष्यों के विरुद्ध चेतावनी है: जो ईश्वर के प्रस्ताव को शरण मानते हैं, परन्तु वास्तविक विश्वास के बिना—वह उद्धार के स्थान के बजाय ठोकर बन जाता है।”
व्यावहारिक takeaway (संक्षेप)
अपने जीवन के चुनावों में परमेश्वर की शरण को सच मानें, किन्तु दिखावटी धर्म या आत्म-आसक्ति से नहीं। विश्वास के साथ आना और ईश्वर के मार्ग पर चलना ही उद्धार की कुंजी है।