Old Testament
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यिर्मयाह 1 यिर्मयाह 2 यिर्मयाह 3 यिर्मयाह 4 यिर्मयाह 5 यिर्मयाह 6 यिर्मयाह 7 यिर्मयाह 8 यिर्मयाह 9 यिर्मयाह 10 यिर्मयाह 11 यिर्मयाह 12 यिर्मयाह 13 यिर्मयाह 14 यिर्मयाह 15 यिर्मयाह 16 यिर्मयाह 17 यिर्मयाह 18 यिर्मयाह 19 यिर्मयाह 20 यिर्मयाह 21 यिर्मयाह 22 यिर्मयाह 23 यिर्मयाह 24 यिर्मयाह 25 यिर्मयाह 26 यिर्मयाह 27 यिर्मयाह 28 यिर्मयाह 29 यिर्मयाह 30 यिर्मयाह 31 यिर्मयाह 32 यिर्मयाह 33 यिर्मयाह 34 यिर्मयाह 35 यिर्मयाह 36 यिर्मयाह 37 यिर्मयाह 38 यिर्मयाह 39 यिर्मयाह 40 यिर्मयाह 41 यिर्मयाह 42 यिर्मयाह 43 यिर्मयाह 44 यिर्मयाह 45 यिर्मयाह 46 यिर्मयाह 47 यिर्मयाह 48 यिर्मयाह 49 यिर्मयाह 50 यिर्मयाह 51 यिर्मयाह 52Verse
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यिर्मयाह 32:30 का संदर्भ और महत्व
यिर्मयाह का यह भाग बिड़बिडा समय की वास्तविकता को उद्घाटित करता है: यरूशलोंम के लोगों ने बार-बार प्रभु के प्रति अपना निष्ठाविहीन रुख दिखाया है, जबकि विपत्ति का समय निकट है। इस्राएल और यहूदा—दोनों ने बचपन से ही वही रास्ता अपनाया है जो परमेश्वर को अप्रसन्न करता है: मन से नहीं, बल्कि बहानों से और मूर्तिपूजा के उपायों से उन्हें संतुष्टि मिली। यह वचन भगवान की क्रोध, और उनके लोगों के व्यवहार की एक स्पष्ट जाँच है कि कैसे वे अपने बनाए वस्तुओं के पीछे दौड़ते हैं और परमेश्वर की सच्ची आराधना में कमी रखते हैं।
मुख्य अर्थ
वचन स्पष्ट करता है कि प्रभु को उनकी पुरानी, बार-बार दोहराई गई बुराई ही सबसे बड़ी बाधा लगती है—किशोर अवस्था की तरह निरंकुश और अस्थिर आचरण। वे जो वेदना और भय से जूझ रहे हैं, वे भी वही व्यवहार दोहराते हैं, जिससे परमेश्वर को दुख होता है। यहूदा-इस्राएल से परमेश्वर की चेतावनी और उनकी निर्भरता में कमी दिखती है; मूर्तिपूजा और अपनी-अपनी कलाओं के लिए धन-समृधि का सहारा लिया गया है, न कि परमेश्वर के वचनों और उद्धार के भरोसे पर।
दो-तीन प्रमुख विषय
अनुसंग-जिन्हें पढ़ना उपयुक्त है
नीचे के संदर्भ सीधे इस अध्याय के अंतर्गत बौक्सर संकेत देते हैं:
व्यावहारिक विचार
आज के विश्वासी के लिए यह वाक्य स्मरण दिलाता है कि हमारे आरेख और औपचारिक धार्मिक कर्म तभी सार्थक होते हैं जब वे हमारे ईश्वर-सम्बन्ध को प्रकट करें। हमारी जीवन-योजना अगर पैसे, प्रतिष्ठा या शक्तिशाली वस्तुओं पर टिकी है, तो हम सच में ईश्वर के मार्ग से विचलित हो रहे हैं। परमेश्वर की वाणी को प्राथमिकता दें, और उन ‘बनाए गए उपायों’ के बजाय उसका चमत्कारिक उद्धार-संदेश अपनाएं।
पठन-योग्य बिंदु
यहाँ दो से तीन व्यवहारिक कदम सुझाए जाते हैं:
क्रॉस-रेफरेन्स और संक्षेप निष्कर्ष
यिर्मयाह 7–9 के उल्लेखित भाग इस वचन के साथ संकेत करते हैं कि परमेश्वर अपनी पवित्रता के कारण अत्यंत संवेदनशील हैं; यदि हमारा हृदय मूर्तिपूजक-धारणाओं से घिरा रहे, तो उद्धार पथ मुश्किल हो जाता है। यिर्मयाह 32:27 भी यह स्मरण कराता है कि “मैं परमेश्वर, बड़ा और सभी के ऊपर” हूँ; अंततः वही सही मार्ग दिखाते हैं।
सार: यह वचन बताता है कि भक्त का दोषी आचरण और मूर्ति-उपासनाएं ईश्वर के साथर्धर्म को विचलित कर देती हैं। क्रोध के समय में भी वह पवित्रता बनाए रखने के लिए बुलाते हैं, ताकि उद्धार का दर्पण हमें दिखे।
याद रहे: अगर पाठ को उद्धरण चाहिए हों, तो मैट्यू-हेनरी, ऐल्बर्ट बर्न्स या एडम क्लार्क की संक्षिप्त पंक्तियाँ कान्तिपूर्ण संदर्भ के रूप में उद्धृत की जा सकती हैं; किन्तु पूर्ण वाक्य नहीं, केवल आवश्यकता अनुसार संक्षेप।