Old Testament
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यिर्मयाह 1 यिर्मयाह 2 यिर्मयाह 3 यिर्मयाह 4 यिर्मयाह 5 यिर्मयाह 6 यिर्मयाह 7 यिर्मयाह 8 यिर्मयाह 9 यिर्मयाह 10 यिर्मयाह 11 यिर्मयाह 12 यिर्मयाह 13 यिर्मयाह 14 यिर्मयाह 15 यिर्मयाह 16 यिर्मयाह 17 यिर्मयाह 18 यिर्मयाह 19 यिर्मयाह 20 यिर्मयाह 21 यिर्मयाह 22 यिर्मयाह 23 यिर्मयाह 24 यिर्मयाह 25 यिर्मयाह 26 यिर्मयाह 27 यिर्मयाह 28 यिर्मयाह 29 यिर्मयाह 30 यिर्मयाह 31 यिर्मयाह 32 यिर्मयाह 33 यिर्मयाह 34 यिर्मयाह 35 यिर्मयाह 36 यिर्मयाह 37 यिर्मयाह 38 यिर्मयाह 39 यिर्मयाह 40 यिर्मयाह 41 यिर्मयाह 42 यिर्मयाह 43 यिर्मयाह 44 यिर्मयाह 45 यिर्मयाह 46 यिर्मयाह 47 यिर्मयाह 48 यिर्मयाह 49 यिर्मयाह 50 यिर्मयाह 51 यिर्मयाह 52Verse
यिर्मयाह 32:1 यिर्मयाह 32:2 यिर्मयाह 32:3 यिर्मयाह 32:4 यिर्मयाह 32:5 यिर्मयाह 32:6 यिर्मयाह 32:7 यिर्मयाह 32:8 यिर्मयाह 32:9 यिर्मयाह 32:10 यिर्मयाह 32:11 यिर्मयाह 32:12 यिर्मयाह 32:13 यिर्मयाह 32:14 यिर्मयाह 32:15 यिर्मयाह 32:16 यिर्मयाह 32:17 यिर्मयाह 32:18 यिर्मयाह 32:19 यिर्मयाह 32:20 यिर्मयाह 32:21 यिर्मयाह 32:22 यिर्मयाह 32:23 यिर्मयाह 32:24 यिर्मयाह 32:25 यिर्मयाह 32:26 यिर्मयाह 32:27 यिर्मयाह 32:28 यिर्मयाह 32:29 यिर्मयाह 32:30 यिर्मयाह 32:31 यिर्मयाह 32:32 यिर्मयाह 32:33 यिर्मयाह 32:34 यिर्मयाह 32:35 यिर्मयाह 32:36 यिर्मयाह 32:37 यिर्मयाह 32:38 यिर्मयाह 32:39 यिर्मयाह 32:40 यिर्मयाह 32:41 यिर्मयाह 32:42 यिर्मयाह 32:43 यिर्मयाह 32:44



यिर्मयाह 32:43 का अर्थ संक्षेप
यह पद बताता है कि भविष्यवाणी के अनुसार कब्ज़े के बाद का क्षेत्र उजाड़ और निर्जन हो जाएगा, जहाँ मनुष्य और पशु नहीं रहते, और जहाँ क्षेत्रों के पुनः कृषि के लिए मूल्य चुकाने पड़ते हैं। परमेश्वर की सत्ता से हुए विनाश के बाद भी आशा की किरण है कि क्रमबद्ध तरीके से खेतों की कीमतें चुकाई जाएंगी और फिर से खेती-बाड़ी शुरू होगी।
पृष्ठभूमि
यिर्मयाह की पुस्तिका में यह भाग बन्धकत्व के समय का है जब यहुदी लोग बाबुल के शासन में थे। प्रलोभन और हतोत्साह के बीच, यिर्मयाह ने भविष्य के उद्धार और पुनर्निर्माण की आशा दी है। इस Verse में उजाड़पन का चित्र परमेश्वर के दिव्य योजना की ओर संकेत करता है: जब डर और विनाश छा जाए, तब भी वह पुनर्निर्माण कर सकता है, और बार बार खेत-मोल लगना एक वित्तीय, सामाजिक और कृषि-जीवन के पुनरोद्धार का प्रतीक है।
व्याख्यात्मक बिंदु
मिश्रित संदर्भ और विवेचना
Related cross-references से गहराई मिलती है कि: - अन्याय के बाद भी भविष्य में आशा: परमेश्वर का पुनर्निर्माण कार्य न केवल शारीरिक भूमि बल्कि जीवित समाज को भी लौटाएगा। यह विचार यिर्मयाह के अन्य अंशों में पुनर्निर्माण और उद्धार की दशा से जुड़ता है। - आस्था और जिम्मेदारी: कृषिप्रथा से जुड़ी आर्थिक गतिविधियों का पुनः शुरू होना लोगों के रूप में परमेश्वर के प्रति समर्पण को दर्शाने का प्रतीक है। - दैवीय नियन्त्रण की पुष्टि: चाहे परिस्थिति कैसी भी हो, प्रभु की योजना अंततः पूरी होती है।
एक छोटा विषय-वस्तु सूचि
अनुरूप उपदेश
यह पंक्ति स्मरण करवाती है कि कठिन समय में भी ईश्वर अपनी पकड़ छोड़ते नहीं। कुछ भी स्थिर नहीं रहता, परHis योजना के अनुसार समय आता है जब निर्गत नुकसान लौटकर आता है—खेत-खरीदी और पुनर्जीवन के द्वारा। यदि आप कठिनाई में हैं, तो आशा रखें कि परमेश्वर पुनः व्यवस्था बनाकर समाज, कृषि और जीवन को फिर से चालू कर देगा।
क्रॉस-रेफरेंसेस (संक्षेप)
1) यिर्मयाह 33:6-7 — पुनर्निर्माण और शांति की योजना की विस्तारणा; क्षेत्र और जीवन दोनों का पुनरुद्धार।
2) यशायाह 61:4 — बिखरे हुए लोगों के पुनर्स्थापन और शहरों की बहाली के बारे में।
3) पन्नत-प्रकाश के अन्य भाग — सुरक्षा और आशा का संदेश, जो अस्थायी विपत्ति के बीच स्थिर रहता है।
संक्षिप्त निष्कर्ष
यिर्मयाह 32:43 हमें बताता है कि परमेश्वर की सत्ता में अँधेरा नहीं रहता; विनाश से भी आगे बढ़कर वह पुनर्स्थापन की राह बनाते हैं। कठिन समय में भी भूमि और जीवन के विकास के प्रति उम्मीद बनाए रखना चाहिए—कर्तव्य और विश्वास के साथ, ताकि भविष्य में खेत-खरीदी के ponovno चक्र के साथ समुदाय फिर से जीवंत हो सके।
उद्धरण-उद्धृत अभिवचन: Matthew Henry, Albert Barnes, Adam Clarke के शाब्दिक संक्षेप कथनों से सामान्य सत्य का समाहित किया गया सार यहाँ समाहित है; नीचे उनके उपलब्ध स्पष्ट उद्धरण केवल संदर्भ के लिए संदिग्ध हो सकते हैं—यदि मौजूदा पाठ में उनके शब्द सीधे मिले तो यहाँ उद्धृत किए जा सकते हैं।