Old Testament
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यिर्मयाह 1 यिर्मयाह 2 यिर्मयाह 3 यिर्मयाह 4 यिर्मयाह 5 यिर्मयाह 6 यिर्मयाह 7 यिर्मयाह 8 यिर्मयाह 9 यिर्मयाह 10 यिर्मयाह 11 यिर्मयाह 12 यिर्मयाह 13 यिर्मयाह 14 यिर्मयाह 15 यिर्मयाह 16 यिर्मयाह 17 यिर्मयाह 18 यिर्मयाह 19 यिर्मयाह 20 यिर्मयाह 21 यिर्मयाह 22 यिर्मयाह 23 यिर्मयाह 24 यिर्मयाह 25 यिर्मयाह 26 यिर्मयाह 27 यिर्मयाह 28 यिर्मयाह 29 यिर्मयाह 30 यिर्मयाह 31 यिर्मयाह 32 यिर्मयाह 33 यिर्मयाह 34 यिर्मयाह 35 यिर्मयाह 36 यिर्मयाह 37 यिर्मयाह 38 यिर्मयाह 39 यिर्मयाह 40 यिर्मयाह 41 यिर्मयाह 42 यिर्मयाह 43 यिर्मयाह 44 यिर्मयाह 45 यिर्मयाह 46 यिर्मयाह 47 यिर्मयाह 48 यिर्मयाह 49 यिर्मयाह 50 यिर्मयाह 51 यिर्मयाह 52Verse
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क्यों यह वचन महत्वपूर्ण है
यिर्मयाह 46:19 मिस्र के विनाश का एक तीक्ष्ण और करुण संदेश देता है। यह वचन न सिर्फ ऐतिहासिक घटना की भविष्यवाणी है, बल्कि यह उन लोगों के लिए चेतावनी भी है जो पराभव के समय उथल-पुथल में आशा खोजते हैं। पाठ हमें सिखाता है कि राष्ट्रों की शक्ति अस्थायी है और पराधीनता, उजाड़ और निष्कासन की वास्तविकता का सामना करना पड़ सकता है।
मूल संदर्भ
यह श्लोक यिर्मयाह के उन भविष्योक्तियों का हिस्सा है जो मिस्र के विरुद्ध दिए गए हैं (अध्याय 46—51)। यिर्मयाह अपनी देशवासियों को चेतावनी देते हुए देखता है कि इज़राइल का प्रभु, यहोवा, अन्य राष्ट्रों पर न्याय लागू करेगा। विशेषकर नोप (जिसे समकालीन संदर्भों में मुमकिनतः बाइबिल का नोप/नोफ़ समझा जाता है) का उल्लेख मिस्र के प्रमुख नगरों में से एक के विनाश का संकेत देता है। यह वचन मिस्र की सामरिक और धार्मिक सुरक्षा का पतन दर्शाता है, जब अन्य शक्तियाँ—विशेषकर बबुल और उसके सहयोगी—प्रभाव दिखाते हैं।
प्रमुख संदेश
मुख्य रूप से यह आयत तीन बातों पर जोर देती है: (1) विनाश का निश्चितता—"उजाड़" और "भस्म" का शब्द उपयोग बड़े स्पष्ट प्रतीक हैं; (2) मानवीय तैयारी—"बँधुआई में जाने का सामान तैयार कर" यह कहता है कि लोग भागने और बचे रहने के उपाय करें; (3) पराधीनता की व्यथा—"क्योंकि ... ऐसा भस्म हो जाएगा कि उसमें कोई भी न रहेगा" यह अकेलेपन और सम्पूर्ण विनाश की गाथा कहता है।
समर्थक बाइबलीय विषय
प्रासंगिक पार-वचन (Cross-references)
ये छंद विषयगत संबंध दिखाते हैं और पाठ का दायरा समझने में मदद करते हैं:
मत्ते हेनरी, अल्बर्ट बार्न्स व ऐडम क्लार्क के संक्षेप उद्धरण
निम्नलिखित अल्प उद्धरण सार्वजनिक-डोमेन टिप्पणियों से लिए गए हैं:
एकीकृत व्याख्या और सत्यान्वेषी सार
यिर्मयाह 46:19 का सरल लेकिन कठोर संदेश यह है कि आंतरिक आध्यात्मिक दुर्बलता और अनैतिकता राष्ट्रीय दुर्बलता में परिणत हो सकती है। भगवान के न्याय के समय, भौतिक सुरक्षा काम नहीं आती; केवल सत्यपरक सुधार और पश्चाताप ही स्थिति बदल सकती है। भविष्यवक्ता का आह्वान—"बँधुआई में जाने का सामान तैयार कर"—न केवल निर्वासन के व्यावहारिक निर्देश की तरह है बल्कि यह चेतावनी भी है कि लोग अपनी आशाएं किस पर टिकाए हैं।
आध्यात्मिक चिंतन (Devotional reflection)
आज के पाठ में से हम यह सीख सकते हैं कि व्यक्ति और राष्ट्र दोनों को आत्मनिरीक्षण की आवश्यकता है। क्यों हम अपनी सुरक्षा केवल बाह्य साधनों पर निर्भर कर लेते हैं? क्या हम परमेश्वर के न्याय और दया दोनों को समझते हुए अपने रास्ते बदलने को तैयार हैं? इस श्लोक की करुणता हमें विनम्रता और परिवर्तन के लिए प्रेरित करती है।