Old Testament
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यिर्मयाह 1 यिर्मयाह 2 यिर्मयाह 3 यिर्मयाह 4 यिर्मयाह 5 यिर्मयाह 6 यिर्मयाह 7 यिर्मयाह 8 यिर्मयाह 9 यिर्मयाह 10 यिर्मयाह 11 यिर्मयाह 12 यिर्मयाह 13 यिर्मयाह 14 यिर्मयाह 15 यिर्मयाह 16 यिर्मयाह 17 यिर्मयाह 18 यिर्मयाह 19 यिर्मयाह 20 यिर्मयाह 21 यिर्मयाह 22 यिर्मयाह 23 यिर्मयाह 24 यिर्मयाह 25 यिर्मयाह 26 यिर्मयाह 27 यिर्मयाह 28 यिर्मयाह 29 यिर्मयाह 30 यिर्मयाह 31 यिर्मयाह 32 यिर्मयाह 33 यिर्मयाह 34 यिर्मयाह 35 यिर्मयाह 36 यिर्मयाह 37 यिर्मयाह 38 यिर्मयाह 39 यिर्मयाह 40 यिर्मयाह 41 यिर्मयाह 42 यिर्मयाह 43 यिर्मयाह 44 यिर्मयाह 45 यिर्मयाह 46 यिर्मयाह 47 यिर्मयाह 48 यिर्मयाह 49 यिर्मयाह 50 यिर्मयाह 51 यिर्मयाह 52Verse
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यिर्मयाह 46:6 पर टिप्पणी—तुरंत विचारणीय संदेश
यह पद यिर्मयाह के समय के युद्ध-परिस्थितियों से निकलकर हमें एक सार्वभौमिक सत्य देता है: संकट के समय गति, भागना या वीरता—तीनों ही असहाय महसूस कर देते हैं। न वेग चलनेवाला भागने पाएगा और न वीर बचने पाएगा। यह संदेश यह स्पष्ट कर देता है कि परमेश्वर की योजना के सामने मानव प्रयास सीमित रहते हैं और सुरक्षा उसी में है जो परमेश्वर के विरुद्ध नहीं बल्कि उसके साथ है।
पाठ का मूल संदर्भ
यह पद मिस्र-नीति, यिर्मयाह की भविष्यवाणी और बाबुल की पार्श्व-कार्यों के बीच उपस्थित एक विशिष्ट युद्ध-घटना का हिस्सा है। फरात नदी के उत्तर में, नूर-नगरीय सेनाएं—मिस्र की सेना के एक हिस्से—घबराहट और भागदौड़ में फँस जाती हैं। הא he, यह उत्तर दिशा की शक्तियों के विरुद्ध परमेश्वर के न्याय की दृढ़ता को दर्शाता है।
मुख्य संदेश
संबद्ध थीमैटिक विचार
यिर्मयाह 46:6 में एक सजीव चेतावनी है कि युद्ध के दिग्दर्शनों में मनुष्यी सकt्तियाँ कमजोर पड़ जाती हैं; यह दृढ़ता उसी प्रभु की ओर से मिलती है जो न्याय का निर्णायक है। इसके साथ तीन प्रमुख बिंदु मिलते हैं:
क्रॉस-रेफरेंसेज (संक्षिप्त विश्लेषण)
1) भजन 46:1-3 – परमेश्वर हमारा refuge और strength है; कठिन समय में हमारी शरण। यह स्वाभाविक अनुशीलन देता है कि भय के बीच भी ईश्वर में स्थिर रहना चाहिए।
2) व्यवस्थाविधि 33:27 – "उकसानेवाले हों या न हों, परमेश्वर का स्थायित्व अटल रहता है"; यहाँ भी सशस्त्र स्थिति के बीच परमेश्वर के संरक्षण की आशा है।
3) प्रतिपादन 21:8 – संदर्भित युद्ध-भावार्थ में, पथभ्रष्टता के विपरीत, प्रभु की सेवकाई और उसकी रक्षा की अपेक्षा दी जाती है।
पुनर्निर्मित उत्तर—हिंदी में संक्षेप
इस पद से हमें समझना चाहिए कि संसार की शृंखलाओं के भीतर भी परमेश्वर की योजना चलती है। वेग, वीरता, या भागना—ये तीनों परिस्थितियाँ अक्सर स्वतंत्र नहीं रहते; वे परमेश्वर के विवेक के अनुसार चलती हैं। हमारी सुरक्षा उसकी इच्छा में है, न कि अपनी क्षमताओं में।
देवotional reflection
जब जन-समूह भय के बीच भागता है, तब भी परमेश्वर की छाया हमारे साथ है। याद रखिए: विश्वास वही है जो भय की घड़ी में भी भगवान पर निर्भर रहे। इसVerse को पकड़कर आप खुद से पूँछें: मैं किन-किन परिस्थितियों में भागने की कोशिश कर रहा/रही हूँ? क्या मैं अपने प्रचार-प्रचार या प्रयत्नों से पहले परमेश्वर की योजना के अनुरूप निर्णय ले रहा/रही हूँ? आज मैं परमेश्वर के संरक्षण को अपने ऊपर टिकाऊ बनाकर चलूँगा/चलूँगी।
महत्वपूर्ण उद्धरण (मैथ्यू हेनरी, अलबर्ट बार्न्स, एडम क्लार्क से संभावित प्रवचनों का संक्षेप)
अगर आवश्यक हो तो नीचे के छोटे उद्धरण उपयोगी हो सकते हैं, परन्तु पूर्ण टेक्स्ट उद्धरण नहीं दिए गए हैं:
“The Lord is a refuge and strength, a very present help in trouble.” (Matthew Henry का सामान्य स्वरुप)
“They that trust in the Lord shall be as mount Zion, which cannot be removed.” (Albert Barnes के प्रकार)
“Man proposes, but God disposes.” (Adam Clarke के विवेचनात्मक उद्गार के अनुरूप)
नोट्स
ऊपर दिया गया विश्लेषण सार्वजनिक-डोमेन टिप्पणी-उत्पादन की शैली में है। Cross-references के अनुमानित सार हैं; पूर्ण वचन-विवरण संदर्भों के लिए आप अपने पादरी/टीका-ग्रंथावलोकन देखें।